प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल पर बात

(आज हिंदुस्तानी परिवेश और ज़ुबान में ख़ूब ख़ूब ग़ज़लें कही/लिखी जा रही हैं। अब तो हम यह भी कह सकते हैं कि इस विधा में हमारे पास ढेरों मुकम्मल ग़ज़लकार भी हैं। लेकिन फिर भी इस विधा में आलोचनात्मक कार्य और बड़े आलोचक का अभाव अखरता है। इस बात को ख़्याल में रखते हुए 'हस्ताक्षर' के माध्यम से एक हिमाकत करने जा रहा हूँ। यह बहुत अच्छे से जानते हुए कि अभी ग़ज़ल या ग़ज़ल के सृजन पर बोलने की हैसियत कतई नहीं रखता, फिर भी यह सोचते हुए कि कोशिश तो करनी ही होगी।
कॉलम 'ग़ज़ल पर बात' में किसी एक समकालीन ग़ज़लकार की ग़ज़ल पर बात करने की कोशिश करूँगा। आप सबसे, ख़ासकर ग़ज़ल से जुड़े मनीषियों से सहयोग की अपेक्षा रखता हूँ।)

 

बहुत ही ज़रूरी बातों पर विचार करती, सवाल उठाती, आह भरती, उम्मीद जताती एक ग़ज़ल: के. पी. अनमोल


अभी कुछ दिन पहले 'पूर्वाभास' पर डॉ. राकेश जोशी की कुछ ग़ज़लें पढ़ने में आयीं। राकेश जोशी सर को यूँ ही गाहे-बगाहे पढ़ता रहा हूँ और सच कहूँ तो मैं इन्हें पढ़ना पसंद करता हूँ। देहरादून के डोईवाला में एक राजकीय महाविद्यालय में अंग्रेज़ी प्राध्यापक के रूप में सेवारत डॉ. जोशी हिन्दुस्तानी भाषा और परिवेश की ग़ज़लें कहना पसंद करते हैं। इनकी ग़ज़लों में साधारण-सी भाषा और सहज-सरल शैली में हमारे आसपास के परिवेश की ढेरों बातें अशआर के रूप में जगह पाती हैं। 'पूर्वाभास' पर इनकी कुल 9 ग़ज़लों में एक ग़ज़ल पर नज़र अचानक रुक गयी, और अंतस से उसी वक़्त आवाज़ आई कि यही वो ग़ज़ल है, जिस पर मैं बात करना चाहता हूँ।
जी, तो 'ग़ज़ल पर बात' के लिए आज प्रस्तुत हूँ डॉ. राकेश जोशी की एक ग़ज़ल लेकर, जिसका रदीफ़ ही बहुत कुछ बयान करने में सक्षम है। ग़ज़ल का रदीफ़ 'ये कचरा बीनते बच्चे' एक तरह से इस ग़ज़ल का शीर्षक भी है और संकेत भी, कि इस ग़ज़ल में क्या-क्या होगा। रदीफ़ तो अपने आप में बिल्कुल अलग है ही, साथ ही बहुत मार्मिकता भी लिए हुए है। आज़ादी के 70 साल बाद भी जिस देश का भविष्य यानि बचपन कचरा बीनने पर मजबूर हो, वहाँ के तमाम हालात का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।
मुफ़ाईलुन की चार कड़ियों यानि 1222 x 4 में लिखी यह ग़ज़ल एक मुसल्सल ग़ज़ल कही जा सकती है। साथ ही यह भी बता दूँ कि ग़ज़ल का मतला 'जाएँ' काफ़िये के साथ बंधा हुआ है, जो ग़ज़ल के व्याकरण के ऐतबार से कतई उचित नहीं है और हो सकता है इसी वजह से 'जानकार' साथी इसे ग़ज़ल न कहकर ख़ारिज कर दें, लेकिन महज़ इसी वजह से इस रचना पर बात करने से रुका नहीं जा सकता।
मतला बंधने के सिल्सिले में डॉ. जोशी कुछ अलग ख़याल रखते हैं और इसे प्रयोग का नाम देते हैं लेकिन यह प्रयोग न होकर कुछ और ही है, बहरहाल ये बड़ी बहस का विषय है। मैं इसके बाबत यही कहूँगा कि ज़रा-सी कोशिश से मतला खुल सकता है और अभी यह इस ग़ज़ल में दोष है। लेकिन यह एक ग़ज़ल है और आज के दौर की सशक्त अभिव्यक्ति है।


ग़ज़ल का मतला देखें-

हमें हर ओर दिख जाएँ, ये' कचरा बीनते बच्चे
भुलाए किस तरह जाएँ, ये' कचरा बीनते बच्चे


ये हक़ीक़त है, आपको, मुझे, हर किसी को अमूमन हर रोज़ इस तरह के मंज़र न चाहते हुए भी देखने पड़ते हैं।
पहले शेर में रचनाकार हम सबसे प्रश्न कर रहा है कि क्या ये वही आज़ादी है, जिसके हमने ख़ाब सजाए थे? जिसके लिए माँ भारती के हज़ारों लाल क़ुर्बान हुए थे। जिसके लिए हमारे पुरखों ने अनगिनत यातनाएँ सही थीं। नहीं, लेकिन यह आज का सत्य है कि इतना लम्बा अरसा बीत जाने के बावजूद भी ज़मीनी हालात कुछ ऐसे ही हैं, जैसा शेर के सानी मिसरे में कहा गया है-

यही है क्या वो आज़ादी कि जिसके ख़्वाब देखे थे
ये कूड़ा ढूँढती माएँ, ये कचरा बीनते बच्चे


तरक्क़ी की कहानी तो हम सालों से सुनते आ रहे हैं। हाँ, ये अलग बात है कि इन दिनों कुछ ज़बरदस्ती ही 'ठूँसी; जा रही है तरक्क़ी की गाथाएँ। लेकिन ठहर कर विचार करने पर यही इक प्रश्न उठता है ज़हन में कि तरक्क़ी हो कहाँ रही है?
तरक्की की कहानी तो सुनाई जा रही है पर
न इसमें क्यों जगह पाएँ, ये कचरा बीनते बच्चे


अभावग्रस्त बच्चे अपना बचपन जी ही कब पाते हैं! ये अपना बचपन इसी कूड़े के ढेर में, बीड़ी के कस के बीच ही कहीं ढूँढ निकाल लेते हैं और कुछ पल के सही, ख़ाब सजा लेते है और ललचा भर लेते हैं-
ये' बचपन ढूँढते अपना, इन्हीं कचरे के' ढेरों में
खिलौने देख ललचाएँ, ये' कचरा बीनते बच्चे


विडम्बना ये है कि हर साल घोषित होने वाली करोड़ों की योजनाओं की हवा भी इन बच्चों को नहीं छू पाती, भले वो उनके नाम पर खर्च हो जाती रही हो। ग़ज़लकार यह उम्मीद कर रहा है कि किसी दिन ऐसा हो कि इन योजनाओं को अमली जामा पहनाने वालों में से किसी की नज़र इन पर भी पड़ जाए-
वो' जिनके हाथ में लाखों-करोड़ों योजनाएँ हैं
उन्हें भी तो नज़र आएँ, ये' कचरा बीनते बच्चे


खैर, ये बात रही इंसानों की, कई बार तो ऐसा लगता है कि ख़ुद ईश्वर ने इन्हें नज़रअंदाज़ कर रखा है, तभी इन मासूमों पर अपने क़ुदरती कहर भी ढाता रहता है। लेकिन यहाँ ग़ज़लकार एक उम्मीद जागा रहा है कि काश ये बच्चे उसी क़ुदरत को अपने कारनामों से जवाब दें कि हम भी कुछ करने की ताब रखते हैं। इस हौसले को सलाम और इस उम्मीद के लिए आमीन!
वो' जिस आकाश से बरसा है' इन पर आग और पानी
उसी आकाश पर छाएँ, ये' कचरा बीनते बच्चे


अगला शेर भी एक उम्मीद जगाता हुआ शेर है। यह उम्मीद हमेशा बची रहनी चाहिए-
वो' तितली जिसके' पंखों में, मैं' सच्चे रंग भरता हूँ
कहीं उसको भी' मिल जाएँ, ये' कचरा बीनते बच्चे


ग़ज़ल का आख़िरी शेर ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर कहा जा सकता है। काश ऐसा हो!
कभी ऐसा भी' दिन आए, अँधेरों से निकलकर फिर
किताबें ढूँढने जाएँ, ये' कचरा बीनते बच्चे


एक बहुत ही ज़मीनी विषय पर बहुत ही ज़रूरी बातों पर विचार करती, सवाल उठाती, आह भरती, उम्मीद जताती इस ग़ज़ल में पढ़ने, सुनने, गुनने, समझने और करने के लिए बहुत कुछ है, काश इस परिदृश्य को अपनी आँखों से ग़ायब करने के लिए हम कुछ करने की ठान लें। इसी उम्मीद के साथ एक अच्छी रचना के लिए डॉ. राकेश जोशी को साधुवाद।


- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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