प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- सौगंध

माताजी के श्राद्ध के दिन, सुधा के दिल में उनके लिए नफ़रत और भर जाती लेकिन समाज में परिवार की लाज बनाये रखने हेतु बड़ी बहू के कर्तव्य से भी मुँह नहीं मोड़ सकती थी।
अपराध क्या था अबोध बच्ची का! माता के जागरण में शोरगुल का फायदा उठा, घर में चाचा द्वारा शारीरिक छेड़ख़ानी की शिकार बनी और आप इक औरत होकर भी मेरा व मेरी बच्ची का दर्द न समझी, उलटा किसी को ना बताने के लिए मुझे ही, मेरे सुहाग की सौगंध में बाँध दिया।
"सुधा, ध्यान कहाँ हैं तुम्हारा? देखो तो माताजी की पंसद के मीठे पुए जल गए।" पति सुरेश की आवाज़ सुनकर सुधा चौंकी और बुदबुदाई,
"पुए ही तो जले हैं, जब मेरी फूल-सी बच्ची की ज़िंदगी में काला दाग़ लगा तब तो मेरा दिल जला था।"


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लघुकथा- फ़र्ज़

छोटे भाई का शरीर चिता पर रखा अग्नि की प्रतीक्षा कर रहा था, लेकिन बहन ज़ायदाद में हिस्सा लेने की ज़िद पर अड़ी थी, सभी थू-थू कर रहे थे कि हे भगवान! ऐसी बहन किसी को न दे।
आखिरकार उसकी ज़िद के आगे घुटने टेक वकील को बुलाया गया, ज़ायदाद में उसका हिस्सा होने के बाद ही चिता को अग्नि नसीब हुई।

क्रिया कर्म की सारी प्रक्रिया समाप्त होने पर पिताजी और भाई बरस पड़े, "यही संस्कार दिए थे हमने कि शादी के बाद ज़ायदाद में हिस्सा ले और अब हिस्सा मिल गया है तो तुझसे हमारा जीवन भर का नाता ख़त्म।"
इतना सुन नम आँखों से बोली, "जीते जी छोटे भाई-भाभी के साथ ग़ैरों की तरह व्यवहार कर सकते हो आप सभी, तो उसके मरने के बाद भाभी और दो छोटे बच्चों के साथ न जाने कैसा व्यवहार......और रही बात ज़ायदाद की, तो वो छोटी भाभी के नाम लिख दी है। और कागजात भाभी को दे चल दी, मुडकर देखा छोटा भाई फूलमाला पहनी तस्वीर में से मुस्कुराकर कह रहा हो,
"बहन हमारे दिये संस्कारों का अनुकरण तूने कर लिया, मेरे तिनके जैसे बच्चों के लिए सहारा बन जो फर्ज निभाया है, वैसे तो खुद भगवान भी नहीं!!"


- संयोगिता शर्मा
 
रचनाकार परिचय
संयोगिता शर्मा

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कथा-कुसुम (1)