प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -48

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कुँवर नारायण की ऐतिहासिक कविताओं में सामान्यजन: अमरनाथ प्रजापति


जब कोई रचनाकार अतीत की घटनाओं या ऐतिहासिक विषय-वस्तु को रचनात्मक कैनवास पर रखता है तो वह वर्तमान और भविष्य में उसकी प्रासंगिकता, उसकी वैचारिक ऊर्जा तथा उसके मर्म को ढूँढने की कोशिश करता है। वह इतिहास की गहराई में पैठकर अपनी विचारधारा और अपने अनुभव के अनुरूप सामग्री को टटोलकर नए कलेवर में प्रस्तुत करता है। वह केवल इतिहास की घटनाओं और युद्धों का विवरण ही प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसकी संस्कृति, सभ्यता और संवेदना को भी शिद्दत से महसूस करता है।
प्रत्येक रचनाकार का इतिहास-बोध, पर्यवेक्षण-क्षमता, दृष्टिकोण एवं प्रस्तुतीकरण भिन्न-भिन्न होता है। समकालीन कवि श्रीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही और कुँवर नारायण की ऐतिहासिक रचनाओं में पर्याप्त भिन्नता दिखाई पड़ती है। इसे स्पष्ट करते हुए श्रीराम वर्मा लिखते हैं- "श्रीकांत वर्मा, साही जी और कुँवर नारायण तीनों युद्ध की स्थितियों में मनुष्य को पाते हैं। श्रीकांत वर्मा का तेवर आक्रामक का, विजेता का रहता है, उनका युद्ध शायद अस्तित्वपरक है, भौतिक है। साही के युद्ध में हवाले नहीं, विवरण नहीं, तथ्य और सत्य है। वह युद्ध भौतिक-अभौतिक दोनों के बीच से, संधि से, धुंधलके से उठता है, दरअस्ल वह युद्ध भी आधा यथार्थ आधा स्वप्न है, अतिरंजना है, उसमें जादू है, वह बहा ले जाता है। कुँवरनारायण का युद्ध मनोवैज्ञानिक है, वैचारिक है।"1
इस कथन से स्पष्ट है कि कुँवरनारायण ने इतिहास-बोध को बिल्कुल नए तरीके से ग्रहण किया है। उनकी कविताओं में घटनाओं के ब्यौरों की बजाय इतिहास को गहराई से देखने की कोशिश की गयी है। उसमें वैचारिक एवं मार्मिक संवाद दिखाई पड़ता है।


कुँवरनारायण के यहाँ इतिहास माहिमा मंडित, मोहक, रोमांचित तथा रूमानी नहीं बल्कि सामान्य जन की पीड़ा, अत्याचार, हत्या, पराधीनता आदि को मर्मान्तक ढंग से प्रस्तुत करता है। उनके यहाँ चारण कवियों की तरह राजाओं, योद्धाओं और वीर पुरुषों के शौर्य गाथा का न तो बखान है, न उसमें कोई दिलचस्पी ही। वे सबसे अलग, सदियों से पिसते आ रहे सामान्य लोगों के साथ खड़े होते हैं। विष्णु खरे के शब्दों में– "कुँवर नारायण इतिहास के धीरोदात्त विजयी या पराजित नायकों में न हैं और न उनके साथ हैं– वे उस सामान्य जन के साथ हैं, जो हमेशा ही पिसता है।"2
'गोलकुंडा की एक शाम' कविता में वे कहते हैं–

बारूद में आग लगाने के इतिहासों से अलग
एक तीसरा इतिहास भी है
रहमतशाह की बीड़ियों और
मत्सराज की माचिस के बीच सुलहों का। 3


कुँवर नारायण इतिहास के भीतर मानवीय संवेदना की तलाश करते हैं, जो युद्धों, संघर्षों और बर्बरताओं से इतर हैं। जो हमेशा से बादशाहों की आक्रान्ताओं और महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ता आया है। सत्ता के संघर्षों में कितनी चीखें अँधेरी गलियों में गुमनाम हो गयीं? किसी रचनाकार ने आज तक ऐसे इतिहास की टोह नहीं ली। कुँवरनारायण ऐसी हत्याओं और चीखों को अपनी कविताओं में उतारते हैं-
किसी टूटे हुए खंजर की मूठ हाथों में लिए
सोच रहा हूँ–
खंजरों के बारे में
उन्हें चलने वाले हाथों के बारे में
कातिलों और हमलों के बारे में
हजारों वर्षों के बारे में
और एक पल में अचानक
किसी अंधी गली में खो जाने वाली
चीख के बारे में ....4


सत्ता और साम्राज्य के स्याह अंधेर, हत्या और दुराचार से पीड़ित बच्चे, बूढ़े, औरतों के दर्द को कवि ने 'इब्नेबतूता' कविता में गहराई और सूक्ष्म ढंग से देखने की कोशिश की है। इब्नेबतूता की इतिहास दृष्टि के माध्यम से कवि ने एक साम्राज्य के खूनी दस्तावेज को उघाड़कर रख दिया है। उस इतिहास का पन्ना रक्तरंजित और सुल्तान के अंधे रवैयों के परिणामों से पटा हुआ है, जो मशाल की फीकी रौशनी में छटपटाता हुआ प्रतीत होता है। हर एक पन्ना बर्बर हत्याओं से सना हुआ है-
इस बर्बर समारोह में

कौन हैं ये अधमरे बच्चे, औरतें जिनके बेदम शरीरों में
हाथ-पाँव एक-एक कर अलग किये जा रहे हैं?5


कुँवर नारायण ऐतिहासिक विरासत और शाही साम्राज्य के वर्तमान वस्तुस्थितियों का ब्यौरा प्रस्तुत करते हैं तथा वर्त्तमान समय में उसकी अनुपयोगिता और महत्त्वहीनता को रेखांकित करते हैं। उसके खँडहर में अनेक बादशाहों के साम्राज्यों के विध्वंस, उत्थान-पतन, हिंसात्मक रवैया, विश्वासघात, युद्ध, हार-जीत, शोक-संताप आदि दफ़न हो गए हैं। 'गोलकुंडा की एक शाम', 'लखनऊ' और 'विजयनगर' जैसी कविताओं में इसे देखा जा सकता है। गोलकुंडा का किला किसी ज़माने में शाही गढ़ हुआ करता था किन्तु आज वह खँडहर में तब्दील हो गया है तथा आम आदमी के लिए मात्र पर्यटन स्थल और जीवन यापन का साधन रह गया है-
जो टैक्सी चलाता
जो रोज उन्हें खँडहर दिखाकर घर पहुँचाता,
जिसकी कोई वाबस्तगी नहीं
पर्यटकों या खंडहरों से, उसके लिए वक्त
वह वक्त है जो मीटर की रफ़्तार से
नगद गुजर रहा।6


लखनऊ के अतीत की शान-शौकत किस तरह वर्तमान में अपनी पहचान के लिए भी संकटग्रस्त है, उसका सजीव चित्र 'लखनऊ' कविता में उभरकर सामने आता है। लखनऊ जो कभी 'शामे अवध' की नवाबी रौनक में डूबा रहता था, आज वहाँ उदासी, बे-रौनक और दमघोटू भागमभाग है। आज वह अधमरे बूढ़े-सा खाँसता प्रतीत होता है-
किसी नौजवान के जवान तरीकों पर त्योरियाँ चढ़ाये
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे
अधमरे बूढ़े-सा खाँसता हुआ लखनऊ। 7


इसी तरह वे 'रास्ते' (फतेहपुर सीकरी) कविता में यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि इतिहास में फतेहपुर सीकरी को बादशाहों की शान-शौकत के लिए जाना जाता है। शाही लोगों के आवागमन, चकाचौंध से हर समय दरबार मशगूल रहता था। वह आज पूरी तरह से वीरान और निर्जन हो चुका है। इतना भव्य इमारत का सौन्दर्य फीका पड़ चुका है। उसके पत्थर भी ऊब रहे हैं। जिस रास्ते से कभी बादशाहों का आना-जाना रहता था, उधर अब आम लोगों  का आना-जाना भी नहीं होता–
ये रास्ते, जो कभी खास रास्ते थे
अब आम रास्ते नहीं।
ये महल, जो बादशाहों के लिए थे
अब किसी के वास्ते नहीं।
आश्चर्य कि उन बेताब ज़िंदगियों में
सब्र की गुंजाइश थी!
और ऐसा सब्र कि अब ये पत्थर भी उब रहे हैं। 8


भौतिक उत्थान और सत्तात्मक शिखरों को कुँवरनारायण बार-बार ध्वस्त करते हैं। उसकी नश्वरता को वे भली-भांति पहचानते हैं। वे सामान्य जीवन और मानवीयता के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। सत्तात्मक महत्वाकांक्षा और सांसारिक ऊचाइयाँ सिर्फ मृगजल ही साबित हो सकती हैं, जिसका कोई अंत नहीं होता है | 'कुतुबमीनार' कविता में व्यंग्य के माध्यम से कहते हैं-
क्या ये सीढियाँ हमें
उस सबसे ऊँची वाली जगह पर पहुँचा सकती हैं
जहाँ मीनारे ख़त्म हो जातीं
और एक मस्तक शुरू होता
ताजपोशी के लिए?9


कुँवर नारायण इतिहास और वर्तमान में लगातार आवा-जाही करते हुए हिंसा और आतंक के ख़िलाफ़ एक सुधारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। वे हिंसा और आतंक का विरोध संयमित और वैचारिक ढंग से करते हैं, कभी सीधे-सीधे तो कभी व्यंग्य से। वे सामान्य जन-जीवन के पक्षधर हैं। उनकी संवेदना, शोषित, उपेक्षित लोगों से अधिक जुड़ती है। वे आम लोगों की पीड़ाओं, दुखों एवं दर्दों को गहराई से महसूस करते हैं। इस सन्दर्भ में अनंत विजय पालीवाल कहते हैं– "इतिहास और आज में दखल देती कुँवर नारायण की ये कविताएँ किसी भी समय पर एक मार्मिक दस्तक हैं। ये दखल देती हैं आक्रान्ताओं की बर्बरता पर-कभी सुधारक के रूप में, तो कभी व्यंग्य और कभी-कभी सीधे आगाह और चेतावनी देते हुए। कुँवरनारायण किसी भी हिंसा के ख़िलाफ़ हैं, अतः वे आततायियों के ख़िलाफ़ भी हिंसात्मक स्वर मुखर नहीं कर पाते। लेकिन कविता में व्यंग्य और प्रतीकों के वे महारथी हैं।... अतीत के सारे परदे वे परत दर परत खोलते चले जाते हैं। जहाँ कई चेहरे बेनकाब होते हैं तो कई नकाबों से मुक्त भी होते हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उनका अंतिम लक्ष्य कोई है तो वह है, आम आदमी।"10
उन्हें बादशाहों का राजनीतिक दाव-पेंच और छल-छद्म का जीवन दमघोटू लगता है। 'अमीर खुसरो' कविता में इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। जहाँ खुसरो दिल्ली में अनेक बादशाहों को बनते-उजड़ते देख स्वतन्त्र और सामान्य तरह का जीवन जीने के लिए बेताब होता है-

ऊब गया हूँ इस खेल तमाशे से
यह 'तुगलकनामा'– बस, अब और नहीं।
बाकी ज़िंदगी जीने दो
सुल्तानों के हुक्म की तरह नहीं
एक कवि के ख़यालात की तरह आजाद 11


इस तरह हम देखते हैं कि कुँवर नारायण का इतिहासबोध बिल्कुल नए तरीके से उभरकर सामने आता है। उनकी कविताओं में बादशाहों और योद्धाओं के गुणगान की बजाय उनके अत्याचार, हिंसा, अनैतिक और अमानवीय रवैयों का विरोध है। सत्ता की लालच, भौतिक और सांसारिक भूख, साम्राज्यों का विस्तारीकरण आदि के प्रति सहज असहमति है। उसमें सामान्य जन के प्रति गहरी सहानुभूति और संवेदना दिखाई पड़ती है। उनके दुखों, पीड़ाओं, शोषण और हत्याओं के ख़िलाफ़ वे  खड़े होते हैं। वे अहिंसा, मानवीयता और प्रेम-सौहार्द के पक्षधर हैं। ये उनकी ऐतिहासिक कविताओं का वैशिष्ट्य है, जो अन्य रचनाकारों में नहीं दिखाई पड़ती।




सन्दर्भ-
1. कुँवर नारायण: उपस्थिति, सं. यतीन्द्र मिश्र, पृष्ठ संख्या- 316
2. कुँवर नारायण: उपस्थिति, सं. यतीन्द्र मिश्र, पृष्ठ संख्या- 139
3. कोई दूसरा नहीं, कुँवर नारायण, पृष्ठ संख्या- 58
4. वही, पृष्ठ संख्या- 60
5. अपने सामने, कुँवर नारायण, पृष्ठ संख्या- 89
6. कोई दूसरा नहीं, कुँवर नारायण, पृष्ठ संख्या- 58
7. अपने सामने, कुँवरनारायण, पृष्ठ संख्या- 54
8. वही, पृष्ठ संख्या- 81
9. वही, पृष्ठ संख्या- 88
10. पूर्वाग्रह, सं. प्रेमशंकर शुक्ल, जुलाई-सितम्बर, 2015, पृष्ठ संख्या- 198
11. इन दिनों,कुँवर नारायण, पृष्ठ संख्या- 135


- अमरनाथ प्रजापति
 
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अमरनाथ प्रजापति

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