प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

छंद-संसार

दोहे


पलकों में उमड़ा सखी!, यादों का सैलाब।
लगी बरसने आँख फिर, भीगे सारे ख्वाब।।


जब जब तेरी याद की, जलती है कंदील।
तब मन परवाना वहाँ, उड़ पहुँचे सौ मील।।


चौखट तेरी चूमते, ही होता मदहोश।
रे यादों की अप्सरा, मुझे न दे तू दोष।।


आँखों से ओझल हुआ, जबसे तेरा रूप।
उस दिन से यादें बनी, सखी श्रावणी धूप।।


यादों के मन में खिले, सुंदर सेमल फूल।
देख देख खुश होत मैं, बिना गंध क्या मूल?।।


पहले चौखट चूमकर, फिर पकडूँगा पाँव।
सुन ले बुढिया याद की, आउँगा जब गाँव।।


बँटवारे में है मिली, यादों की जागीर।
तुझको उसने छीनकर, मुझको किया अमीर।।


जब से तेरी याद के, मन में खिले पलाश।
उस दिन से छाया सखी, जीवन में मधुमास।।


हर पल तेरी याद का, पहने भगवा भेस।
दस्तक देता भाव-घर,कविता का दरवेस।।


जब तू मिलने आ गई, लगा याद के पंख।
मन मंदिर बजने लगे, ढोल नगाड़े शंख।।


- नरपत वैतालिक
 
रचनाकार परिचय
नरपत वैतालिक

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