प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2015
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उम्मीद की लौ
'शब्द' माध्यम हैं, हमारे ह्रदय में उठते उद्गारों को जनमानस तक पहुंचाने का। प्रत्येक लेखक की अपनी एक निश्चित विधा एवं लेखन-शैली होती है, जिसमें वह सहज रूप से स्वयं को अभिव्यक्त कर सकता है। गीत, ग़ज़ल, कविता, कहानी, संस्मरण, दोहे, चौपाई, हाइकु और न जाने ऐसी कितनी ही विधाओं का सम्मिलन एक उन्नत साहित्य का निर्माण करने में सहायक सिद्ध होता है। कहते हैं कवि मन अत्यधिक भावुक व संवेदनशील होता है, उसकी लेखनी में उसकी रूह घुली होती है, तभी तो भावों की गहराई से लिखी कोई रचना आपके अंत:करण को स्पर्श कर कभी नि:शब्द कर दिया करती है, कभी मन उद्वेलित हो उठता है तो कभी आप उसे पढ़ अपना हर दुःख-दर्द भूल खिलखिलाने को विवश हो जाते हैं। यही शक्ति है एक रचनाकार की, यही धर्म है, यही पूँजी है उसकी। इसकी भावनात्मक कीमत नहीं आंकी जा सकती, पर यह एक माँ का अपने नवजात शिशु के प्रति अगाध स्नेह जैसा अनमोल अहसास है
 
'साहित्य समाज का दर्पण होता है'  इस विषय पर हम सभी ने अपने विद्यालय के दिनों में कभी-न-कभी निबंध अवश्य ही लिखा होगा और अच्छे अंक प्राप्त कर गौरवान्वित भी हुए होंगें। होना चाहिए भी, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो क्यों न बेबाकी से लिखा जाए सत्य और असत्य के संघर्ष में बिना भय के क्यों न सत्य का समर्थन किया जाए। समाज की अच्छाईयों को बताकर एक सकारात्मक वातावरण तैयार हो, साथ ही बुराइयों को भी सरेआम बेनक़ाब करने में ख़ौफ़ कैसा? दु:खद है कि बस यहीं आकर डर या स्वार्थवश कइयों के कदम लड़खड़ाकर पीछे हो उठते हैं
 
अंतरजाल की दुनिया में प्रवेश करने के बाद आपको इसकी वीभत्सता का ज्ञान शीघ्र ही होने लगता है। यहाँ आगे बढ़ने के लिए मात्र प्रतिभा ही नहीं, 'जुगाड़ू-प्रथा' में पारंगत होना भी पहली शर्त है। इसके अंतर्गत आपको कुछ स्वघोषित 'महान' लोगों के इनबॉक्स में जाकर उनकी सच्ची-झूठी स्तुति करनी होती है, कि वो या तो आपको प्रकाशित करवा दें या फिर तथाकथित 'राष्ट्रीय पुरस्कार' आपकी झोली में डालकर आपको धन्य कर दे। न जाने ऐसी कितनी ही संस्थाएँ और उनके संस्थापक आपसे अनुदान की मांग कर, प्रकाशन या पुरस्कार का वायदा कर फरार हो उठते हैं, क्योंकि हक़ीक़त के धरातल पर उनका अस्तित्व कहीं था ही नहीं। ईनामों की बन्दर-बाँट और मंचीय गुटबाज़ी अब परदे के पीछे की बात नहीं रही, सब कुछ खुलेआम हो रहा है। कहीं प्रतिभा, हताश-कुंठित हो खिसिया रही है तो कहीं इस बात का अफ़सोस भी है कि स्वार्थी सोच या उससे जुड़े लोग, उन सभी ईमानदार संस्थाओं और बुद्धिजनों की साख पर बट्टा लगा रहे हैं जो आज भी छल-कपट और इन प्रपंचनाओं से दूर आपकी योग्यता के आधार पर ही आपका चयन कर रहे हैं
 
पर ग़लत राह पकड़ या ज़मीर को बेचकर, आगे बढ़ने वाले ही दोषी नहीं। दोषी वे भी हैं जो ऐसा होने दे रहे हैं। मंच पर जाने और छाने की तीव्र लालसा ने इन्हें स्थायी मौन व्रत दे दिया है। कुछ इस वजह से भी चुप रह जाते हैं कि हमें क्या करना! जिसकी जो मर्ज़ी हो करता रहे। पर जब स्वयं पर बीतती है तो सबसे ज्यादा शोर इसी श्रेणी में आने वाले लोग मचाते हैं। 'सत्य का समर्थन हमेशा करें, सिर्फ़ अपनी मुसीबत के समय ही औरों से यह अपेक्षा न रखें', तभी कुछ उपाय निकलेगा। साहित्य चोरी अब एक सामान्य घटना मानकर, हँसते हुए टाल दी जाती है। परिणामत: 'अब चोरों का विकास, जोरों पर है' और मूल रचनाकार अपनी रचना की चोरी के डर से उसे छुपाता फिर रहा है। हर बात में लेखकों को खरी-खोटी सुनाने वाले और काव्य का क,ख, ग समझाने वाले आलोचक इन मुद्दों पर न जाने क्यों आक्रांत हो चुप्पी साध लिया करते हैं
 
'दुर्भाग्यपूर्ण है, कि हम समाज के उस दौर में जी रहे हैं, जहाँ अपराधी को अपराधी कहना ही अपराध सिद्ध कर दिया जाता है और हम हैं कि फिर भी परिवर्तन की उम्मीद लगाए बैठे हैं' संभवत: इस उम्मीद की लौ उन संस्थानों और उनसे जुड़े जुझारू व्यक्तियों के कारण जगमगा रही है, जो तमाम राजनीतिक, धार्मिक और प्रांतीय प्राथमिकताओं से दूर रह पूरी मेहनत और लगन के साथ पारदर्शिता बना अपनी कर्मभूमि में डटे हुए हैं। मैं उन सभी से आह्वान करती हूँ कि साहित्य को मलीन न होने दें, इसमें चल रही अनियमितता और घृणित चालों के प्रति अपनी आवाज बुलंद करें, इसे उपहास और सौदेबाजी का अड्डा बनने से रोकें और वही शीर्षस्थ स्थान व सम्मान दिलवाएं, जिसका यह सदियों से पात्र रहा है
 
आमीन!!
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कुछ क़दम और-
इस अंक से पत्रिका में दो नये स्तंभ 'बाल-वाटिका' और 'संदेश-पत्र' प्रारंभ किए जा रहे हैं। 'बाल-वाटिका', आधुनिक जीवन की चकाचौंध और वीडियो गेम्स की दुनिया में कहीं खोते हुए बाल-साहित्य को पुनर्जीवित करने की छोटी-सी कोशिश है। 'संदेश-पत्र', समाज में व्याप्त समस्याओं, कुरीतियों या आपके हृदय में उठे मनोभावों को हमारे पाठकों तक पहुँचाने का माध्यम और 'पत्र-विधा' के संरक्षण की मूल भावना के साथ प्रारंभ किया गया स्तंभ है। सकारात्मक वातावरण की उम्मीद लिए, आशा की यह किरण कुछ हृदयों को अवश्य रोशन कर देगी, यही हमारा प्रयास  है। जिसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आप सभी के स्नेह व सहयोग की अपेक्षा रहेगी
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- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

पत्रिका में आपका योगदान . . .
हस्ताक्षर (43)कविता-कानन (1)ख़ास-मुलाक़ात (9)मूल्यांकन (2)ग़ज़ल पर बात (1)ख़बरनामा (12)व्यंग्य (1)संदेश-पत्र (1)विशेष (2)'अच्छा' भी होता है! (2)फिल्म समीक्षा (1)