प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फिल्म समीक्षा

दिव्यांग की काबिलियत को प्रस्तुत करती फिल्म काबिल: तेजस पूनिया
 

 


फिल्मों में विलेन और हीरो की टक्कर और अंत में हीरो की जीत सुनिश्वित होती है। हिंदी फिल्मों के दर्शकों का बड़ा समूह ऐसी फिल्में खूब पसंद करता है, जिसमें हीरो अपने साथ हुए अन्याय का बदला ले। चूंकि भारतीय समाज में पुलिस और प्रशासन की पंगुता स्पष्‍ट है, इसलिए असंभव होते हुए भी पर्दे पर हीरो की जीत अच्छी लगती है। राकेश रोशन की नयी फिल्म 'काबिल' इसी परंपरा की फॉर्मूला फिल्म है।
संजय गुप्ता के डायरेक्शन में पहली बार रितिक रोशन की फिल्म रिलीज हुई है, जिसके प्रोड्यूसर राकेश रोशन हैं। राकेश रोशन ने अपने बेटे रितिक के लिए 'कहो ना प्यार है', 'कोई मिल गया', 'कृष', 'काइट्स' जैसी फिल्में बनाई हैं। दो नेत्रहीन व्यक्तियों के रिश्तों की संवेदनाएं इस फिल्म के स्तर को बहुत ऊँचा ले जाती है। 'काबिल' की कहानी दो प्रमियों की है, जिनकी आँखों की रोशनी नहीं है।
रोहन और सुप्रिया भले ही एक-दूसरे को देख नहीं सकते, मगर एक-दूजे से बेइंतहा मोहब्बत करते हैं। दिव्यांग सुप्रिया (यामी गौतम) और रोहन (ऋतिक रोशन) की। डबिंग आर्टिस्ट रोहन भटनागर (रितिक रोशन) जिसकी जिंदगी दिन में डबिंग स्टूडियो और रात को घर पर गुज़रती है। रोहन की एक ही तमन्ना है कि उसको एक ऐसा हमसफ़र मिले, जिसके साथ वो अपनी सारी ज़िंदगी गुजार सके। तभी रोहन की ज़िंदगी में सुप्रिया (यामी गौतम) की एंट्री होती है और रोहन के व्यक्तित्व को देखकर सुप्रिया काफी इंप्रेस होती है और दोनों शादी कर लेते हैं। लेकिन सुप्रिया शुरुआत में रोहन से शादी करने के लिए संकोच करती है। रोहन उसे विश्वास दिलाता है कि वो उसके साथ खुश रहेगी।
रोहन पेशे से एक व्यॉइस आर्टिस्ट है और सुप्रिया एक एन.जी.ओ. में काम करती है। जहाँ रोहन को ज़िंदगी में कोई भी निराशा तोड़ नहीं सकती, वहीं दूसरी ओर सुप्रिया एक ज़िन्दादिल लड़की है। रोहन और सुप्रिया साथ-साथ ज़िंदगी के सपने देखते हैं और दोनों इस सपने को पूरा करने के लिए शादी करते हैं।


अचानक एक दिन ऐसा आता है जब कॉर्पोरेटर माधवराव शेल्लार (रोनित रॉय) और अमित शेल्लार (रोहित रॉय) की वजह से रोहन की ज़िंदगी से सुप्रिया हमेशा के लिए चली जाती है और इसका कारण है सुप्रिया का बलात्कार होना और यह घटना तब घटित होती है जब एक दिन जब रोहन और सुप्रिया रात को घर लौट रहे होते हैं। शकील और अमित उन दोनों को छेड़ने लगते हैं और गुस्से में आकर रोहन अमित को मार देता है लेकिन अमित यहीं नहीं रुकता है वो मौका देखकर शकील के साथ मिलकर सुप्रिया का बलात्कार करता है और दूसरी तरफ उन्हें पुलिस से भी कोई मदद नहीं मिलती। उल्टा पुलिस रोहन के इर्द-गिर्द ऐसा माहौल बनाती है कि कोई विकल्प नज़र नहीं आता।
अब रोहन बदला लेने की ठानता है और कानून हाथ में ले लेता है। इसके बाद फिल्म की कहानी अब अगले पड़ाव पर पहुंचती है और बदला लेने के लिए रोहन प्लान बनाता है और सच की जीत होती है।


निर्देशन और म्यूजिक के मामले में लम्बे समय तक की गई मेहनत का परिणाम है संजय गुप्ता की यह फ़िल्म। इस फिल्म के हर दृश्य को संजय गुप्ता ने बहुत ही बारीकी से फिल्माया है। सुदीप चटर्जी ने कैमरे और रेसुल पुकुट्टी ने साउंड पर बेहतरीन काम किया है। दूसरी ओर, राजेश रोशन ने बीते जमाने के हिट्स तथा अपनी ही फिल्म 'याराना' का गाना  'सारा जमाना' और 'दिल क्या करे' को एक दम नया रूप दिया है, जो ठीक-ठाक कहा जा सकता है।
'मन अमोर' भी परदे पर बेहतरीन लगता है। इस मामले में राजेश रोशन का संगीत बाजी मारने में सक्षम है। फिल्‍म का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है और सीन्स को बल देता है, साथ ही फिल्‍म का टाइटल ट्रैक ज़ुबान पर चढ़ता है।


फिल्म के लीडिंग एक्टर ऋतिक रोशन और यामी गौतम दोनों ने ही बहुत शानदार परफॉरमेंस दी है। फिल्म में दोनों की केमिस्ट्री काबिले-तारीफ़ है। ऋतिक का डांस और एक्शन भी बहुत कमाल का है। ऋतिक ने इस फिल्म में दिव्यांग व्यक्ति की भूमिका निभाई है। इस फिल्म से ऋतिक ने यहाँ साबित किया है कि वे किसी भी तरह का अभिनय कर सकते हैं। वहीं उनकी बीवी के किरदार में नज़र आई यामी ने भी ऋतिक का बखूबी साथ दिया है। कुल मिलाकर फिल्म में सभी के लिए करने के लिए बहुत कुछ है। लंबे अरसे बाद ऋतिक रोशन के हाथ कोई अच्छी फिल्म लगी है, वैसे इस फिल्म के डायरेक्टर संजय गुप्ता हैं इसलिए उनकी इस फिल्म में उनकी पहले की फिल्मों की तरह विदेशी फिल्म का प्रभाव भी है।
संजय गुप्ता के निर्देशन की सबसे बड़ी कमज़ोरी रही है कि उनकी फिल्म पर हॉलीवुड हमेशा हावी हो जाता है, जिसके चक्कर में वह फिल्म की आत्मा से खिलवाड़ करने में गुरेज़ नहीं करते। संजय गुप्ता अपनी इस कमजोरी को कभी दूर नहीं करना चाहते। ये उनकी कमज़ोरी इस फिल्म को भी कमज़ोर बनाने की कोशिश करती है और यह फिल्म भी हॉलिवुड फिल्म 'ब्लाइंड फ्यूरी' (1989) के 'रटगर हॉउर' के लीड किरदार के अलावा कोरियन सुपरहिट फिल्म 'ब्रोकन' (2014) से प्रेरित नज़र आती है।


हालांकि काबिल एक रेग्युलर रिवेंज ड्रामा है। फिल्म क्लाइमैक्स पर पहुंचने तक रोमांच के शिखर को छू लेती है। लेकिन यह फिल्म अंत तक दर्शकों को सीट से भी बांधे रखती है। इस फ़िल्म के कुछ रोचक दृश्यों को देखकर अजय देवगन की 'दृश्यम' फ़िल्म भी याद आती है। जिस तरह का ताना-बाना 'दृश्यम' में बुना गया, लगभग वैसी ही तेजी और फुर्ती के साथ यहाँ भी बुनने की कोशिश की गई है। फिल्म में बैकग्राउंड म्यूजिक सलीम-सुलेमान का है। इसकी कहानी में इमोशन, एक्शन और ड्रामे का बराबर स्कोप था। नेत्रहीन किरदारों के साथ दर्शकों की सहानुभूति जल्दी से जुड़ जाती है और उनके मूवमेंट्स दिल से जुड़ते हैं लेकिन ये कहानी बेहद छोटी थी, जिसको एक पूरी फिल्म बनाने के लिए जो विस्तार दिया जाना चाहिए था, वहाँ देखा जाए तो कई मौकों पर ये कमज़ोर हो जाती है और यही बात बहुत अखरती है। रोमांस से एक्शन की ओर फिल्म के मुड़ने का सफर जब रिवेंज ड्रामे पर पहुंचता है, तो थ्रिलर की पावर इसे किसी हद तक बचा लेती है। बदला अंधा होता है, यह इस फिल्म का सबसे मजबूत संदेश है। कुल मिलाकर संजय गुप्ता ने इसे बड़े ही असरदार और मनोरंजक तरीके से पेश किया है।

प्यार और कानून में यह समानता है कि दोनों अंधे होते हैं। फिल्म की नायिका कहती है कि दो नेगेटिव मिलकर पॉजिटिव कैसे बन सकते हैं? काबिल की कहानी में भी इन दो नेगेटिव को मिलाकर पॉजटिव बनाने की कोशिश है। पर बात बन नहीं पाती। कहानी में प्यार आधे रास्ते में खत्म हो जाता है और कानून शुरू से अंत तक लचर बना रहता है। फिल्म में मुश्किल से कोई बड़ी कमी निकाली जा सकती है। फिल्म की कहानी, इसके किरदार और इसका संगीत हर एक चीज़ इसे लोगों के दिलों तक पहुंचाने में मदद करता है। लेकिन अगर टेक्निकल चीज़ों पर ध्यान दिया जाए तो इसमें किया गया वी.एफ.एक्स. थोड़ा और बेहतर हो सकता था। फिल्म के कुछ सीन्स को वी.एफ.एक्स. के माध्यम से क्रियेट करने की कोशिश की गई है लेकिन वो स्क्रीन पर खराब लगते हैं।




 

फिल्म: काबिल
डायरेक्टर: संजय गुप्ता
स्टार कास्ट: रितिक रोशन, यामी गौतम, रोनित रॉय, रोहित रॉय


- तेजस पूनिया