प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा वृत्तांत

एक आंदोलन का नाम है 'आमार कुटीर'

आप शांति निकेतन की यात्रा करें और आमार कुटीर न आएँ, यह कैसे हो सकता है? विश्व कवि रवींद्रनाथ ठाकुर का शांति निकेतन धरती रूपी कैनवास पर एक अद्भुत आध्यात्मिक कविता है। किसी रचनाकार, कलाकार, साधक के लिए यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। यहीं से थोड़ी दूर पर बसा है आमार कुटीर, जो अपने ऐतिहासिक महत्व व आदर्शों से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है।
आमार कुटीर का अर्थ है- मेरी कुटी यानि मेरा घर। यहाँ मेरा सर्वनाम का पर्याय है सबका। यह सबका घर है, जहाँ हस्त-शिल्प-कला को जीवन मिलता है। श्रीनिकेतन की यात्रा कर जब आप बल्लभपुर की ओर बढ़ेंगे, तब शुरु होता है घने जंगलों का विहंगम दृश्य। लाल कंकड़ युक्त भूमि के एक बड़े भाग में फैला है बल्लभपुर का यह जंगल, जिसमें शाल व सोनाझुड़ी के वृक्ष ही बहुतायत मात्रा में हैं। कच्चे रास्तों से होकर इन्हीं जंगलों को निहारते हम पहुंच जाते हैं– आमार कुटीर।


कोपाई नदी के तट पर बसा हस्त-शिल्प-कला का यह एक ऐसा महत्वपूर्ण केंद्र है, जिसने स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई थी। यहाँ पहुँचकर आप शिल्पकारों को काम करते हुए भी देख सकते हैं। यहीं पर एक विक्रय-केंद्र भी है, जहाँ से आप सूती-वस्त्र, बाटिक प्रिंट के वस्त्र, चमड़े के सामान, ठेठ गांवों के घास-फूस या ताड़ के पत्तों से बनी डलिया, विभिन्न तरह के गहने, चमड़े पर विशेष रूप से की गयी कलाकारी वाले बैग आदि खरीद सकते हैं। यहाँ के सामान प्रथम दृष्टि में आपको थोड़े महंगे लग सकते हैं, पर यकीन मानिए यहाँ की वस्तुएँ गुणवत्ता के आगे महंगी नहीं हैं। इसलिए यहाँ आएँगे तो दो-चार सामान खरीदे बिना आप न रह सकेंगे। सामान खरीदने के पहले ढलानों से उतर कर चले जाइए कोपाई नदी के कनारे, जिसे निहार कर आप धन्य हो जाएँगे। कोपाई भले ही कोई बहुत बड़ी नदी न हो पर अपनी सर्पिल देह-यष्टि व साफ निर्मल नीले पानी से आपका मन मोह लेगी।
इस नदी से प्रभावित होकर कवि रवींद्रनाथ ने एक सुंदर कविता लिखी थी। यहाँ के आस-पास के खेतों की हरियाली, गाँवों के विहंगम दृश्य व शांति में डूबे यहाँ के बड़े-बड़े वृक्ष आपको प्रभावित करेंगे। यहीं आपको एक बोर्ड भी मिलेगा, जिसे देखकर आप समझ जाएँगे कि यह एक पिकनिक स्पॉट भी है, जहाँ शांति निकेतन के आश्रमवासी भी पिकनिक मनाने आते हैं।

 

                                   


आमार कुटीर की स्थापना की कहानी कम रोचक नहीं है। आमार कुटीर के संस्थापक श्री सुसेन मुखोपाध्याय का कलकत्ता में कपड़े का व्यवसाय था। 1920 ई. में उन्होंने कलकत्ता में एक ट्रष्ट की स्थापना की थी, जिसका नाम था- हिन्दुस्तान इंड्रस्ट्रीयल एशोसिएसन। यह स्वदेशी कपड़ों का व्यवसाय करता था। गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव सुसेन बाबू पर खूब पड़ा। यह वह दौर था जहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहता था। सुसेन बाबू गांधीजी और रवींद्रनाथ से प्रभावित तो थे ही। ऐसा माना जाता है कि 1923 ई. में जब गांधीजी बोलपुर आए तब सुसेन बाबू इन दो महामानवों को देखने के लिए कलकत्ता से बोलपुर चले आए थे। इसके पहले वे 1921 ई. में बोलपुर आए थे, तब सुरुल ग्राम के ज़मींदार श्री रजनीकांत सरकार ने सुसेन बाबू से प्रभावित होकर कलकत्ता से तांत वस्त्र तैयार करने वाली कुछ हस्त-चालित मशीनें लाकर व्यवसाय प्रारंभ किया था। पर बाद में सुसेन बाबू ने इन्हीं जमींदार घरानों के लड़कों की मदद से बल्लभपुर के जंगल में कोपाई नदी के किनारे पच्चीस बीघा जमीन का जुगाड़ कर सूती-वस्त्र-छपाई का उद्योग बिठाया। सिद्धेश्वरी महाश्मशान के पास ज़मीन मिलने में किसी प्रकार दिक्कत नहीं हुई। यहाँ की मिट्टी लाल-कंकड़-युक्त अनुपजाऊ थी। इसी हस्त-शिल्प-उद्योग का नाम रखा गया- आमार कुटीर। इस उद्योग में अपनापन के मिजाज को सहज ही पढ़ा जा सकता है। रवींद्रनाथ एवं गांधाजी दोनों ही सही अर्थों में गाँव का विकास करना चाहते थे। इसी आदर्श ने सुसेन बाबू को भी कलकत्ता से यहाँ सुनसान जंगलों में खींच लाया था।

सुसेन बाबू का जन्म चौबीस परगना जिले (पश्चिम बंगाल) में हुआ था। यद्यपि उच्च शिक्षा इन्हें नहीं मिल पायी थी, तथापि जीवन की पाठशाला से इन्होंने जिन आदर्शों को अपनाया वह अनुकरणीय है। अंग्रेजी व्यवसाय के मिजाज को उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया था कि किस तरह से यह भारतीय कुटीर-उद्योग को नष्ट कर रहा है। अतः जब इन्होंने आमार कुटीर की स्थापना की, तब इन्हें राज-रोष का सामना भी करना पड़ा। 1928 ई. में सरकार ने आमार कुटीर को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। तब इनकी मुलाकात कई राजनीतिक नेताओं से हुई और इस विषय पर चर्चा भी हुई। धीरे-धीरे यह इसी प्रकार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ता चला गया। 1926 ई. से 1937 ई. तक आमार कुटीर ने आस-पास के गांवों में स्वदेशी की लहर फैला दी थी। ग्रामों में खुलकर समाज-सेवा का काम चलाया गया। धीर-धीरे आमार कुटीर का विकास भी किया गया। चमड़ा-उद्योग, मुर्गी-पालन, कृषि-उन्नयन-केंद्र, चिकित्सा केंद्र की स्थापना हुई ताकि अधिक से अधिक गाँवों को जोड़ा जा सके।

सुसेन बाबू को आमार कुटीर को लेकर जेल की भी यात्रा करनी पड़ी। प्रेसीडेंसी जेल में इनकी मुलाकात कई महत्वपूर्ण राजनीतिक व्यक्तियों से हुई। मणि गांगुली, संतोष दत्त, सुरेन बंद्योपाध्याय, मनोरंजन दत्त, रामपद दत्त, अनिल दे, कालिपद वशिष्ठ, मंथन दे आदि प्रमुख लोगों से जुड़ने का मौका मिला और बाद में इनमें से कइयों ने आमार कुटीर आकर अपना योगदान दिया।
1929 ई. में मछुआ बाजार (कलकत्ता) बम-काण्ड के आरोप में पन्नालाल दास गुप्त को पांच साल की सजा हो गयी थी। जेल में रहते हुए जब वे बीमार हो गए तब उन्हें कलिंगपोंग के अस्पताल में भेज दिया गया। रामकृष्ण मिशन के सहयोग से सुसेन बाबू कलिंगपोंग पहुंचे एवं इनकी सेवा-सुश्रुषा से मनोरंजन दत्त, पन्नालाल दास गुप्त जैसे देश-भक्त स्वस्थ हुए। सुसेन बाबू की अपनी कोई गृहस्थी नहीं थी। उन्होंने उस संसार को ही अपना संसार मान लिया था, जो देश सेवा में जुटे हुए थे। ऐसे लोगों की थोड़ी बहुत सेवा कर इन्हें अपार सुख का अनुभव होता। इनकी इसी करूणा व उदारता के कारण आमार कुटीर अनेक त्यक्त लोगों का शरण-स्थल बन गया था। यहाँ उन्होंने देश-सेवियों, बूढ़ों, बच्चों को शरण दे रखी थी। वे स्वयं खाना बनाकर उन्हें खिलाया करते थे। रोगियों की सेवा करते। उनके इस परोपकार से अक्सर इन पर कर्ज भी चढ़ जाता था। 1938 ई. में जब ये प्रेसीडेंसी जेल से छूटे तो सीधे आमार कुटीर चले आए थे।


1933 ई. में अंडमान द्वीप पर काला-पानी की सजा काट रहे क्रांतिकारियों ने जेल में अनशन शुरू कर दिया। इस अनशन में सेनानी मोहित मित्र, मोहन किशोर एवं महावीर सिंह ने अपने प्राण दे दिए। कुछ पागल हो गए। जो बच गए, उन्हें देश में लाने के लिए जोरदार आंदोलन 1937 ई. में शुरू हो गया। तब रवींद्रनाथ ने कहा, "बंगला देश (तब बंगाल और बंगला देश एक ही था, यद्यपि अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन कर दिया था) कभी भी उनके (सेनानियों के) परिवारों को भूल नहीं सकेगा।" अपनी सजा पूरी कर लौटने वाले सेनानी जब वहाँ से लौटे तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह आ खड़ी हुई कि वे कहाँ जाएँ। अब वे अपने घरों को लौटने वाले नहीं थे, क्योंकि एक दिन देश की खातिर उन्होंने अपने घरों को छोड़ा था। तब ऐसे समय में सुसेन बाबू ने आगे बढ़कर इन बीमार सेनानियों को आमार कुटीर में आमंत्रित करते हुए कहा, "आमार कुटीर आप सबका घर है। आप सबका रहने, खाने-पीने, वस्त्र, दवा-दारु सभी का दायित्व आमार कुटीर लेता है। आप सब आनंद भाव से देश सेवा करते रहिए।" प्रयात मणि गांगुली वहाँ से आने वालों में प्रमुख थे। इस प्रकार यह संस्थान आस-पास के गाँवों का प्रेरणा-स्थल बनता चला गया। रूपपुर, बल्लभपुर, यादवपुर, इस्लामपुर, लोहागढ़, विनूरिया, सुरूल, कसवा, दर्पशिला आदि गावों में राष्ट्रीय चेतना जाग उठी। पन्नालाल दास गुप्त और मणि गांगुली उनके नेता थे, जिनसे ये राजनीतिक विचार-धारा ग्रहण करते थे। सर्वप्रथम तो यह युद्ध ग्राम के ही महाजनों, जमींदारों से लड़ा गया। गावों को इनके अत्याचारों से मुक्ति दिलायी गयी। ग्राम को संगठित किए बगैर स्वतंत्रता के युद्ध को नहीं लड़ा जा सकता था, इसे हमारे नेता अच्छी तरह जानते थे।

1939 ई. में यहाँ नेताजी सुभाषचंद्र बोस आए। श्यामा प्रसाद मुखोपाध्याय आए। कम्यूनिस्ट आंदोलन के पुरोधा मुजफ्फर अहमद आए। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुनसान जंगल में होने के कारण स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। आमार कुटीर ने कभी भी किसी खास राजनीतिक विचार-धारा को अपनाकर अपने को कभी संकीर्ण नहीं होने दिया। यहाँ सभी राष्ट्रवादियों का स्वागत था।
सितम्बर 1939 ई. में द्वितीय विश्वयुद्ध के छिड़ जाने पर अंग्रेजी सरकार ने मणि गांगुली और पन्नालाल दास गुप्त को वीरभूम छोड़ देने का आदेश जारी कर दिया। लुक्का-छिपी का खेल खेलते-खेलते 1940 ई. में देश-भर में भारत-छोड़ो आंदोलन जोर पकड़ने लगा। नेताओं की धड़-पकड़ शुरु हो गयी। आमार कुटीर के देशभक्त आस-पास के गाँवों में किसान के वेश में छिप गए। 1940 ई. में के बाद से ही सरकार आमार कुटीर पर कड़ी नजर रखने लगी। अब तक उन्हें पता चल चुका था कि यह केवल सूती-वस्त्र का साधारण-सा उत्पादन केंद्र-भर नहीं है। 29 अगस्त 1942 ई. में आमार कुटीर से एक विशाल जन-समूह जुलूस के रूप में बोलपुर स्टेशन पहुंचा। उद्देश्य था कि जो राज्य से रसद रेलगाड़ी द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए ले जाया जा रहा है, उसे रोकना। प्रतिवाद करना। पर जैसे ही यह जुलूस बोलपुर पहुंचा, ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए गोली चलानी शुरू कर दी। दो लोग मौके पर ही मारे गए। अनेकों घायल हुए। सैकड़ों गिरफ्तार कर लिए गए। अब तक आमार कुटीर खुलकर सरकार का विरोधी केंद्र बन चुका था। इसके बाद तो आमार कुटीर के रास्ते में अनेक व्यवधान आए।


सुसेन बाबू को इस अंचल के लोग दादू कहकर पुकारते थे। वे सदैव आत्म-प्रचार से दूर रहे। कर्म पर अधिक बल देते थे। 5 जून 1955 ई. को उनका देहावसान हो गया। इस विशेष दिन को आमार कुटीर के शिल्पी या वासी अपने दादू की याद में काम-काज बंद रखते हैं। उन्हें याद करते हैं। बाकी वर्ष-भर यह संस्थान खुला रहता है। अतः यहाँ के बिक्री-केंद्र से किसी भी दिन यहाँ के शिल्पकारों की वस्तुओं को खरीदा जा सकता है। आज सुसेन बाबू भले ही हमारे बीच नहीं हैं, पर उन्होंने हमारे सामने जो आदर्श खड़ा किया है, वह न जाने कितनी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। हमें यह याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता-संग्राम में ऐसे हजारों, लाखों लोगों का योगदान था जो इतिहास का हिस्सा कभी नहीं बन पाए।

इस प्रकार हमारी शांतिनिकेतन की साहित्यिक-यात्रा आमार कुटीर, प्रकृति-भवन के साथ-साथ हिन्दी-भवन को देखे बिना पूरी नहीं होती जहाँ कभी हिन्दी के प्रख्यात मनीषी पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी रहा करते थे। आज भी उनका शिरीष, नीम और अशोक का पेड़ हिन्दी भवन में ज्यों का त्यों शान से खड़ा है।


- जयप्रकाश सिंह बंधु
 
रचनाकार परिचय
जयप्रकाश सिंह बंधु

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