प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -48

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण

संस्मरण- शेरू

भगवान सच्चिदानन्द शिक्षण संस्थान में गृह विज्ञान की प्रेक्टिकल परीक्षा थी। छात्राएँ अपनी सुरुचि का व्यंजन बनाने में लगी थीं। कोई पूरी बनाने के लिए आटा गूँथ रही थी, तो कोई खीर पकाने के लिए दूध गरम कर रही थी। दो छात्राएँ पास के हैण्डपंप से पानी ला रही थीं। जिसे जो काम दिया गया था, उसे वह बखूबी निभा रही थी। तभी कहीं से एक अत्यन्त कृशकाय श्वान वहाँ आ पहुँचा। बाद में आये हुए स्वजातीय बन्धु-बान्धवों पर उसे ग़ुर्राते हुए देखकर ऐसा लगता था, जैसे किसी अन्य का वहाँ रहना उसे बिलकुल भी पसंद न हो। मेरे मुँह से 'शेरू' शब्द सुनकर वह चौंक पड़ा, फिर भौंकने लगा। अन्य कुत्ते उसकी चुनौती भांपकर भाग खड़े हुए। भोजन करने से पहले मैंने कुछ पूरियाँ उसे परोस दी थीं। खाने पर वह इस तरह टूट पड़ा था, जैसे कई दिनों से कुछ खाया ही न हो। फिर वह अपनी टाँगें पसारकर निश्चिन्त भाव से सो गया। परीक्षा संपन्न होने के उपरांत छात्राएँ अपने घर चली गईं। उनके जाने के बाद मैं विद्यालय की दूसरी मंजिल पर बने कमरे में चला गया, सीढ़ी पर स्थित दरवाजे को अंदर से बंद कर दिया था।

दूसरे दिन सुबह जब मैं सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था, अचानक शेरू को उसके पिछले दो पैरों पर खड़ा पाकर मैंने उसके सिर पर हाथ रख दिया। स्नेहिल स्पर्श पाकर वह अपनी पूँछ हिलाने लगा। सुबह-शाम जब मैं कहीं जाता तो वह भी साथ हो लेता। स्वामी आनन्द वल्लभ का घर वहाँ से एक किलोमीटर की दूरी पर गाँव में है। एक दिन जब मैंने उनके घर जाने का मन बनाया, शेरू भी मेरे पीछे हो लिया। घर पहुँचने पर उनकी पत्नी ने उसे दूध-भात मिलाकर एक कटोरी में दिया और मेरी सहमति से उसे एक रस्सी से बाँध दिया। रस्सी से बाँधकर रखने का निर्णय इसलिए लिया गया था ताकि सड़क पर गाड़ी-मोटर की चपेट में आने की आशंका से उसे दूर रखा जा सके। खाना खाने के बाद रात में ही मैं विद्यालय लौट आया। दूसरे दिन सुबह मैंने उसे फिर उसी स्थिति में सामने पाया। "क्यों रे शेरू आ गया तू?"  उसने अपने पैर के दोनों पंजे मेरी ओर बढ़ा दिये। शाम को स्वामीजी से पता चला कि मेरे आने के बाद उसने रस्सियाँ काट दी थी और स्वयं को मुक्त कर लिया था।

उनकी बड़ी बेटी विद्यावती आठवीं में पढ़ती थी। विद्यालय की छुट्टी होने पर जब वह घर के लिए चलती, शेरू भी उसका साथ पकड़ लेता। घर जाते समय वह उसके पीछे-पीछे और विद्यालय आते समय हमेशा आगे। उसे दो साथी और मिल गये थे। एक नन्हीं  कुतिया, जिसे संभवतः किसी ने कुछ दिनों पूर्व कहीं से लाकर विद्यालय के सामने छोड़ दिया था, जो विद्यालय के आस-पास ही रहा करती थी, दूसरा विद्यावती का छोटा भाई रवि।

समय अपनी गति के साथ चल रहा था। शेरू अब स्वामीजी के घर-परिवार का हिस्सा बन चुका था। अब वह कभी-कभी ही मेरे पास आता था। उसके खाने और सुरक्षा को लेकर अब मैं निश्चिंत था। शेरू के साथ खेलते समय अक्सर रवि उसके मुँह में अपने हाथ डाल देता। उसकी पूँछ पकड़कर खींचता, खेलता और उसे तंग करता। रात में किसी भैंस के खूँटे से निकल भागने पर शेरू मुस्तैदी से अपने आँख-कान एक कर उसके सामने खड़ा हो जाता और उसकी पगही (रस्सी) दांतों से दबा लेता। अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए तब तक पगही ढीली नहीं होने देता था, जब तक घर का कोई व्यक्ति उसके दाँतों के बीच दबी पगही को थाम नहीं लेता था। मैं यह जानकर भी आश्चर्यचकित था कि स्वामीजी के शौच जाते समय वह भी उनके साथ जाता था और लौटते समय पानी का खाली डिब्बा दाँत से पकड़कर घर ले आता था।

शेरू एक कुशल शिकारी भी था। यह जानकर किसी को भी आश्चर्य होगा कि वह स्वामी जी के घर के दक्षिण मेड़ (लाठ) पर बसे लोगों के पाले मुर्गे मुँह में दबाकर जीवित ही मेरे पास ले आता था। उसने दो बार दो मुर्गे मुँह में दबाकर मेरे पास लाये थे, जिन्हें उनके पालकों को मैंने सौंप दिया था। तीसरी बार वह जो मुर्गा लेकर मेरे पास आया, वह मरा था। शायद वह नहीं मरा होता, यदि बस्ती के लोग उसको (शेरू को) मारने के लिए उसके पीछे लाठी-डंडे लेकर नहीं दौड़ते। आश्चर्य यह देखकर भी हुआ था कि उस दिन जब मुर्गे का माँस उसको खाने के लिए दिया गया था, उसे वह मुँह नहीं लगाया, सूँघकर पीछे हट गया था।

साप्ताहिक छुट्टी का वह बहुत ध्यान रखता था। उस दिन वह या तो सवेरे ही मेरे पास आ जाया करता था या दोपहर बारह बजे के करीब। सीढ़ियों पर लगे दरवाजे पर पंजे मारकर आभास करा देता था कि वह आ गया है। जब मैं दरवाजा खोलता, बिजली की भांति वह मुझसे पहले ही छत पर आ जाता और चारों पैर आसमान की ओर कर सिर हिलाने लगता, जैसे कह रहा हो अब वह कहीं भी नहीं जाने वाला। जब मैं बच्चों को पढ़ाने बैठता, वह भी कुर्सी से थोड़ी दूर बैठकर बड़ी सावधानीपूर्वक सुनता। शरारती बच्चों को उससे डर भी लगता। जब मैं किसी बच्चे को कक्षा में शोर मचाने या शरारत करने पर डांटता या दण्ड देने के लिए आगे बढ़ता, शेरू उसकी ओर इस तरह झपटता जैसे उसे काट-खायेगा। मुझे छड़ी फेंक देनी पड़ती। शेरू फिर संयत होकर अपनी जगह बैठ जाता। छुट्टी के बाद वह विद्यावती के साथ घर चला जाता। दोपहर के समय दूसरी बार स्वामी आनन्द वल्लभ के साथ वह राजकुमार की दुकान पर आता। दुकानदार उसे कुछ न कुछ खिलाते रहते। कभी-कभी शेरू शाम के समय विद्यालय पर रुकने के लिए अड़ जाता तो उसको जबर्दस्ती स्वामीजी के साथ घर भेजना पड़ता।

एक दिन नियत समय से पहले उसे विद्यालय आया हुआ देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। "क्या बात है शेरू?' इतना कहते ही वह ऊँची आवाज में कीं-कीं करने लगा, मानो अपने मन की सारी भड़ास मुझ पर निकाल रहा हो। इस स्थिति में मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सा उसे निहारता रहा। थोड़ी देर बाद वह भी मेरे पीछे-पीछे छत पर आया और इस तरह लेट गया, जैसे अब वह कहीं भी जानेवाला नहीं।

उस दिन शाम के समय स्वामीजी की पत्नी अपनी छोटी बहन को विदा करने सड़क तक आयी थीं। उनके साथ उनकी बेटी विद्यावती भी थी। अपनी बहन को ऑटो में बैठाकर जब स्वामीजी की पत्नी अपने घर की ओर मुड़ी तो मैंने सोचा शेरू को उनके साथ लगा दूँ। इस विचार से मैं छत से नीचे उतरने लगा। मेरे कई बार बुलाने पर भी वह सीढ़ियाँ उतरने के लिए तैयार नहीं हुआ। आज पहली बार शेरू मेरी बात नहीं सुन रहा था या सुनते-समझते हुए भी अपनी जगह से न हटने की ज़िद पर अड़ा था। बार-बार पुचकारने पर वह शिथिल पाँवों से सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया और सड़क पर मेरे पीछे-पीछे दक्षिण की तरफ बढ़ चला। मैं शेरू को उनके साथ लगाकर लौट आया। शेरू उनके साथ घर चला गया।

गर्मी का दिन था। उस रात मैं स्वामी आनन्द वल्लभ के यहाँ ठहरा था। भोजनोपरान्त उनके छत पर ही विश्राम किया, शेरू भी सुबह तक मेरे पैरों के पास पड़ा रहा। सुबह जब मैं विद्यालय आ रहा था, शेरू भी मेरे साथ चला आया। सीढ़ी पर लगे दरवाजे को मैंने अन्दर से बन्द कर लिया। छत पर आकर जूठे बर्तन साफ करते हुए सोचने लगा कि आज मेरे और शेरू के लिए खाने में क्या पकाना है। शेरू नीचे ही रह गया था।
किसी के चपेट में आने की आशंका से मेरा मन कांप उठा। मैं सीढ़ियों से नीचे उतर आया। मुझे जिस बात की आशंका थी, वही हुआ था। शेरू का खून से सना शरीर सड़क पर पड़ा था और ट्रक उसके ऊपर से गुजर चुका था। वातावरण में सन्नाटा पसर गया था। समझ में नहीं आ रहा था कि मदद के लिए किसे पुकारूँ। काँपते हुए हाथों से उसके मृत शरीर को उठाकर मैंने विद्यालय परिसर में रख दिया। विद्यालय के बच्चे उसकी मौत पर आँसू बहा रहे थे। उसकी दोस्त नन्हीं कुतिया भी उदास थी। स्वामीजी के घर खबर भिजवा दी गई। खबर पाते ही वे विद्यालय आ पहुँचे। पास की भूमि में ही शेरू के लिए कब्र तैयार की गई। उसके शव को कफन में लपेटकर दफनाया गया। आँखों में आँसू लेकर आहत हृदय से हम सबने उसको अंतिम विदाई दी।
शेरू अब नहीं रहा, पर उसकी यादें आज भी हमारे साथ हैं।


- आचार्य बलवन्त
 
रचनाकार परिचय
आचार्य बलवन्त

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