प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

शरद ऋतु के जंगल

भोर की मुस्काती बेला में
कोहरे की पतली-सी चादर में
रवि रश्मि के स्वागत को आतुर
घने-घने से मिले-मिले से
शांत भाव से खड़े हुए से
कुछ ठिठुरते से लगते हैं
कुछ कंपकंपी करते से
एक अबोध शिशु की भाँति
कितने निश्छल लगते हैं
शरद ऋतु में घने जंगल

धूप बिखरते ही हँसते-से
ओस कणों से मुँह धोकर
हरे-भरे खिले-खिले से
मस्तमौला पवनों के संग
सर-सर सर-सर मस्ती करते
शरद ऋतु में मस्त जंगल

साँझ ढले वन तपस्वी से
लगते मानों तप करते से
या फिर हैं कुछ सहमे-सहमे
रात रानी से डरे हुए से
साँय-साँय की आवाज़ों से
हो भयभीत सोए हुए से
शरद ऋतु के भरे जंगल


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अंतर्वेदना

बहुत रोई थी उस दिन मेरी संवेदना
जब मेरी माँ ने
मेरी होने वाली बहन को
उसके जन्म लेने से पहले ही
अपने गर्भाश्य की छोटी-सी
दुनिया से निकाल
चिर् स्थाई नींद में सुला दिया था

मैं सपने संजोए बैठी थी
उस सचमुच की भावी गुड़िया के साथ
गुड़िया-गुड्डा खेलने के
मैंने अपने सभी खिलौनों में से
कुछ प्रिय खिलौने उसके लिए
अलग निकाल कर रख दिए थे
जैसे वो ढम-ढम करता हुआ बंदर,
हाथ ऊपर उठाकर नाचता हुआ भालू,
छोट-छोटे बर्तनों वाला किचन सैट

किंतु ये क्या!
मुझे असीम प्यार देने वाली मेरी माँ ने ही
पारंपरिक अंधविश्वासयुक्त महत्वाकांक्षा के आगे
मेरी संवेदनाओं और
पूरे होने जा रहे भावी सपनों को
यूँ ही टूटने और बिखरने दिया!


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संकल्प का बीज

मेरे मन का संकल्प
वह नन्हा-सा बीज है
जो आज बोया गया है
कल उगेगा और परसों तक
यदि सद्गुणों के जल से
भली-भाँति सींचा जाता रहा तो
पल्लवित भी होगा
फिर इस पर आशाओं के
सुगंधित फूल खिलेंगे
जिनसे वे आशाएँ यथार्थ में
परिवर्तित होकर
अपना सुपरिणाम प्रदर्शित कर
एक फल का रूप धारण करेंगी
जो अपने अच्छे स्वाद से
संपूर्ण विश्व की वाह-वाही लूट सकेंगी
और मेरे संकल्प का
वह नन्हा-सा बीज
अपने जीवन की सार्थकता को
सिद्ध करता हुआ
अंत में मेरे साथ ही
कहीं विलीन हो जाएगा।


- डॉ. रीता
 
रचनाकार परिचय
डॉ. रीता

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