प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

आदमी अभी भी भूखा है


उसने एक कविता लिखी
सर्वकालिक,
सर्वव्यापी,
एक हद तक सर्वग्रासी

भूख पर लिखकर
वह इस तरह निढाल हो गया
जैसे प्रसव पीड़ा भोगने के बाद
सद्यजनित शिशु की माँ
सुस्त, शांत हो जाती है

बहुत बेचैन कर रखा था
इस आदिम ज़रूरत ने
इसका दारुण दर्द
बार-बार कोड़े बरसा रहा था
संवेदना के तारों पर

उसे उद्विग्न कर रही थी
विचलित कर रही थी
विगलित कर रही थी
साथ में ललकार भी रही थी
आदमी की भूख

वैसे वह भी आदमी है
और यह भूख
उसके पेट की नहीं थी
दरअसल उसके पेट में
भूख की कोई जगह नहीं थी
वह भरा पेट आदमी है

फिर भी आग की तपिश से
खुद को बचा नहीं पा रहा था
तपतपाया, अकुलाया उसने
कविता लिख ही डाली भूख पर
चुनौती के रूप में

कविता क्या लिखी
मानो भूख की ज़िंदा तस्वीर ही बना डाली

उसकी भयावहता को,
विकरालता को,
सर्वग्रासी रूप को
मर्मभेदी शब्दों से
कुछ ऐसा रंग भरा कि
भूख की धूम मच गई 'भरेपेटों' के बीच

भूख! भूख! भूख!!!

भूखवादी कविताएँ
लिखने/ पढने/ बेचने/ छापने की
होड़ मच गई

भूख पर बतियाना,
भूख पर लिखना,
भूख पर परचा पढ़ना
भूख को सेल्युलाईड पर उतारना
बुद्धिजीवियों के कलम, कूची और कैमरे भूख पर
भूख के इर्द-गिर्द मंडराने लगे

अदबी दुनिया के हासिये में
दुबका ठिठका नाम
सबको पछाड़ कर
सुर्ख़ियों में चमकने/दमकने लगा

'भूख का सच्चा कवि'
विविध भाषाओं में छा गया

भूख पर केन्द्रित कविता का ही चमत्कार था कि
भरेपेट कवि को 'पेट भरने' के लिए
इनामों, खिताबों और तारीफ़ों से हरी-भरी थैलियाँ
उसके गले से लटकाकर
उसे 'कोल्डस्टोर' बना दिया गया

भूख की बैसाखी बना
विजेता स्तम्भ के पहले पायदान पर खड़ा
'भूख का सच्चा कवि'
विजयी मुस्कान के साथ
शुक्रिया अदा कर रहा है
उस आदमी का
जिसकी भूख से उद्दीप्त होकर उसने
कविता लिखी

यह अलग बात है कि
वह आदमी अभी भी भूखा है


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बची रहे चिड़िया

चख रही है चिड़िया
खिला रही है बच्चों को
पेड़ के पके-अधपके फल
तृप्ति का मधुर गीत गाते हुए
अपनी हरी-भरी बाहों से संभाले
फलों की टोकरी
गुनगुना रहा है पेड़ क़ुर्बानी वाली कविता
मौन रहकर
सबकुछ लुटा देने का ज़ज्बा दिखाते हुए

अपनी बगिया में रोपे
पेड़ के फल न खाए जाने का मेरा दुःख
कितना छोटा हो गया है
जैसे बालू का कण
चिड़ियों को खिलाये जाने का सुख
कितना बड़ा हो गया है
जैसे पर्वत हिमालय

हम रहें न रहें
बचा रहे पेड़ और बची रहे चिड़िया


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मसाला पीसती औरत

मसाला पीसती औरत को देखना
कोई अजूबा नहीं
आपके घर में, मेरे घर में
मसाला पीसती है औरत

अदरक, लहसुन, प्याज, मिर्च को
प्यार, स्नेह और अपनेपन की छींटें मार-मार कर
मसाला पीसती है औरत

अपने लोगों को
ज़ायकेदार भोजन खिलाने की कोशिश में
और भी बहुत कुछ
कूटती, पीसती, छाँटती, चुनती है औरत

यह अलग बात है कि
अपने लोगों की सिल पर रोज़-रोज़
कूटी, पीसी जाती है औरत


- मार्टिन जॉन
 
रचनाकार परिचय
मार्टिन जॉन

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कविता-कानन (3)