प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास-मुलाक़ात

चन्द्रकान्त देवताले जी से अंजु चौधरी अनु की मुलाक़ात

 

 

चंद्रकांत देवताले (जन्म 1936) जी का जन्म गाँव जौलखेड़ा, जिला बैतूल, मध्य प्रदेश में हुआ। उच्च शिक्षा इंदौर से हुई तथा पी-एच.डी. सागर विश्वविद्यालय, सागर से। साठोत्तरी हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर देवताले जी उच्च शिक्षा में अध्यापन कार्य से संबद्ध रहे हैं। देवताले जी की प्रमुख कृतियाँ हैं- हड्डियों में छिपा ज्वर, दीवारों पर खून से, लकड़बग्घा हँस रहा है, रोशनी के मैदान की तरफ़, भूखंड तप रहा है, हर चीज़ आग में बताई गई थी, पत्थर की बैंच, इतनी पत्थर रोशनी, उजाड़ में संग्रहालय आदि। देवताले जी की कविता में समय और सन्दर्भ के साथ ताल्लुकात रखने वाली सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक प्रवृत्तियाँ समा गई हैं। उनकी कविता में समय के सरोकार हैं, समाज के सरोकार हैं, आधुनिकता के आगामी वर्षों की सभी सर्जनात्मक प्रवृत्तियां इनमें हैं। उत्तर आधुनिकता को भारतीय साहित्यिक सिद्धांत के रूप में न मानने वालों को भी यह स्वीकार करना पड़ता है कि देवताले जी की कविता में समकालीन समय की सभी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से आप उत्तरआधुनिकता को मानें या न मानें, ये कविताएँ आधुनिक जागरण के परवर्ती विकास के रूप में रूपायित सामाजिक सांस्कृतिक आयामों को अभिहित करने वाली हैं। देवताले जी को उनकी रचनाओं के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें प्रमुख हैं- माखन लाल चतुर्वेदी पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान। उनकी कविताओं के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में और कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं। देवताले की कविता की जड़ें गाँव-कस्बों और निम्न मध्यवर्ग के जीवन में हैं। उसमें मानव जीवन अपनी विविधता और विडंबनाओं के साथ उपस्थित हुआ है। कवि में जहाँ व्यवस्था की कुरूपता के खिलाफ गुस्सा है, वहीं मानवीय प्रेम-भाव भी है। वह अपनी बात सीधे और मारक ढंग से कहते हैं। कविता की भाषा में अत्यंत पारदर्शिता और एक विरल संगीतात्मकता दिखाई देती है।
(मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से साभार)

 

आइये पढ़ते हैं, करनाल निवासी, चर्चित कवयित्री एवं ब्लॉगर अंजू चौधरी 'अनु' जी की, चंद्रकांत देवताले जी से हुई मुलाक़ात के कुछ रोचक अंश -
 
उज्जैन यात्रा के दौरान हमें (मैं, विजय सपपत्ति और नितीश मिश्र ) चन्द्रकान्त देवताले जी से मुलाक़ात करने का सौभाग्य मिला । अत्यंत सरल स्वभाव के स्वामी देवताले जी हमें लेने अपनी गली के नुक्कड़ तक आए। बेहद आदर भाव से अपने घर के आँगन में बैठाया। शालीन स्वभाव और ठहरा हुआ व्यक्तित्व, ऐसा पहली बार देखने को मिला। स्वभाव से हँसमुख, 76 साल की उम्र में भी गजब का जोश देखते ही बनता था। एक साहित्यिक चर्चा के अंतर्गत बहुत सी बातों पर हम लोगों की बातचीत एक चाय के दौर के साथ शुरू और चाय खत्म होने के साथ ही खत्म हो गई। उसी चर्चा का एक हिस्सा आप सभी के साथ यहाँ साझा कर रही हूँ -
 
हम तीनों का एक जैसा ही सवाल था जो पूछा विजय सपपत्ति जी ने कि आज के लेखन और लेखक/लेखिका की परिभाषा क्या है?
 
देवताले जी 
आप खुद ही देखें, वक़्त बदल रहा है और वक़्त के मुताबिक लेखन में भी बदलाव आना बेहद जरूरी है। जिस तरह वक़्त के साथ-साथ समाज बदल रहा है उसी को लेकर लेखन में भी बदलाव आ रहे हैं। उन्मुक्तता और सेक्स को लेकर आज बहुत सी कविता और कहानी का लेखन, लेखकों द्वारा पढ़ने को मिल रहा है। कुछ साल पहले तक सेक्स के विषय पर बात करना भी बुरा माना जाता था, वहीं आज खुले तौर पर इसे लिखा जा रहा है। लेखक या लेखिका अब इस फर्क को अपनी लेखनी से मिटाते जा रहे हैं, बात और गंभीर तब हो जाती है जब एक औरत इस विषय पर लिखती है और उसे टिप्पणी के तौर पर गालियाँ और बहुत कुछ अनाप-शनाप सुनने और पढ़ने को मिलता है। बहुत सी लेखिकाएँ जो नयी हैं और ऐसा-वैसा अपने खुलेपन (बोल्डनेस) की वजह से लिख तो देती हैं पर बाद में खुद ही सबसे बचती फिरती हैं। अरे, भाई ...ऐसा लिखना ही क्यों कि सबसे नज़रें बचानी पड़ें (ओर एक ज़ोर सा ठहाका लगा कर वो हँस पड़ते है )। 
 
देवताले जी ने अपनी बात को ज़ारी  रखते हुए कहा कि ....
कैसी विडम्बना है कि हिन्दी साहित्य अलग अलग खेमों में बंटा हुआ है | भारतीय साहित्यकार, प्रवासी साहित्यकार या स्थानीय साहियत्कार। पर ये बात समझ में नहीं आती कि लेखन को अलग अलग क्षेत्र में कैसे बाँटा जा सकता है। जितना सबको सुना और समझा ....बस ये ही बात समझ आई कि भावनाएँ  सब की एक जैसी है पर अनुभव अलग-अलग, जिस के आधार पर हर कोई लिखता आ रहा है और उसी पर आज तक लेखन टिका हुआ है। 
 
बहुत बार मैंने एक बात को बहुत ही गहराई से महसूस किया है और वो ही बात, मुझे उस वक़्त बहुत दुखी कर जाती है कि जब कोई लेखक या लेखिका, किसी को जाने बिना उस पर किसी भी बात को लेकर दोष मढ़ने लगते हैं। कोई अच्छा लिख रहा है तो इस बात से परेशानी, कोई शांत रह कर काम करता है तो परेशानी, किसी को भी सम्मान मिले तो बेकार का होहल्ला। ये कैसा लेखक वर्ग है जो पढ़ा-लिखा होने के बाद भी किसी की भावनाएँ नहीं समझता!
 
कविता-कहानी लिखने वाले दिल से इतने कठोर कब और कैसे हो जाते हैं कि किसी की उसकी पीठ के पीछे बुराई करने से भी गुरेज नहीं करते ''फलां ने ऐसा कर दिया .....देखो तो फलां ने कैसा लिखा है ..उफ़्फ़ रे बाबा ....पता नहीं कैसे हँस कर सबको पटा लेती है या यार! वो ''सर'' को कितना मस्का मारता है या कितना मस्का मारती होगी ''.....आदि आदि। ऐसी ही कितनी बातें हैं जो आते-जाते सुनने को मिल जाती हैं। पर मेरा बस इतना ही कहना है कि अरे, बाबा! किसी की भी परिस्थिति को जाने बिना, उस पर किसी भी तरह की कोई भी टिप्पणी मत करें। 
 
टिप्पणी करने वाले/वाली की बुद्धि पर तब और भी हँसी आती है जब वो पूरी तरह से सच से वगत हुए बिना सबके आगे किसी दूसरे के सच को साझा करने की कोशिश करते हैं। अरे भाई! सच का तो जाने दीजिये....सबके लिए उसके विचार  कैसे हैं, ये तक उसे नहीं पता होते और वो दावा करते हैं पूरे सच को उजागर करने का। बुराई करने वाले ये नहीं जानते कि कब किसी की कोई भी कृति कालबोध बन जाए....इस बात को कोई नहीं जानता।
 
मुझे आज.भवानी प्रसाद मिश्र जी की ये पंक्तियाँ बरबस यूँ ही याद आ गईं-
अनुराग चाहिए 
कुछ और ज्यादा 
जड़-चेतन की तरफ/लाओकहीं से थोड़ी और
निर्भयता अपने प्राणों में 
बस ये ही सोचता  हूँ कि काश बेकार की बातें  करने वालों ने कभी अपनी सोच का  रचनात्मक उपयोग करने की सोची होती तो वो लोग आज अपने लेखन को शिखर पर पाते। 
 
इस पर मैंनें उनसे पूछा ...."दादा, आप अभी तक कहाँ कहाँ गए हैं और किन-किन साहित्यकारों से मिलें हैं?"
तो उनका जवाब था कि ......
मैं अपनी नौकरी के दौरान लगभग पूरा हिंदुस्तान घूम चुका हूँ और अभी तक जहाँ-जहाँ जाना हुआ....वहाँ के जन समूह और उसको लीड करने वाले अलग-अलग साहित्यकारों से मेरी मुलाक़ात हुई है। हर क्षेत्र के लोग, उनकी सोच, वहाँ के रहन-सहन के मुताबिक ही मिली। मैंने इस बात को बहुत ही गहराई से समझा है कि किसी की बात का किसी से तालमेल ही नहीं होता। एक बुद्धिजीवी वर्ग है, जिसकी अपनी ही दुनिया है, अपने ही लोग हैं और एक सीमित दायरा है,जो फालतू बोलने में विश्वास नहीं करता...पर करता अपने मन की है। फिर भी वो अपना काम करते हुए बहुत अच्छा लिख रहे हैं, उन सबका साहित्य में अपना एक मुकाम है। 
ऐसा मेरा अपना खुद का निजी अनुभव है जैसे अलग अलग धर्मगुरु हैं और उनके अलग अलग भक्त ....वैसे ही साहित्य में भी हर साहित्यकार की अपनी ही सोच और अपनी ही विचारधारा है, जो उनके लेखन को एक अलग ही पहचान प्रदान करती है। 
 
और नितीश मिश्र का एक आखिरी सवाल था ....दादा, क्या कविता कहानी लिखने का कोई उचित समय हैं? कई लोगों  से सुना है कि वो सुबह के वक़्त तरोताज़ा होते हैं इसलिए वो सुबह के वक़्त ही लिखते हैं?
 
इस पर एक बार फिर वो ठहाका लगा कर हँसते हुए हम तीनों से कहते हैं कि 
"क्या कविता लिखना या कहानी लिखना किसी स्कूल के चेप्टर जैसा है कि उसे याद किया और रट्टा मार कर सुबह के वक़्त लिख दिया। अरे, भाई लेखन को वक़्त में मत बांधो, वो तो खुली हवा है उसका अहसास करो और अपने शब्दों में उतारो। अपने शब्दों को जीना सीखो, तुम शब्दों में जीओ और शब्द तुम्हें जीवन में शालीनता से कैसे लिखा और जिया जाता है वो अपने आप सिखा देंगे।''
 
हम सबकी चाय के साथ-साथ बातचीत भी यहीं  समाप्त हो गयी और चलते-चलते देवताले जी ने अपनी पुस्तक को भेंट करके हम सबका बहुत खूबसूरती से सम्मान किया। इनके लिए आभार जैसे शब्द भी बहुत छोटे पड़ जाते हैं।

- अंजु चौधरी अनु
 
रचनाकार परिचय
अंजु चौधरी अनु

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)ख़ास-मुलाक़ात (1)