फरवरी 2017
अंक - 23 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल-वाटिका

बाल कहानी- मन का भूत

गर्मी का मौसम था। दस बजे भी नहीं थे कि लू चलने लगी थी। लोग घरों में जा छुपे थे। लेकिन कुछ बच्चे अभी भी बगीचे में खेल रहे थे। केशव के बापू ने देखा कि वह घर में नहीं है तो वे उसे ढूंढने बगीचे में जा पहुँचे। केशव वहीं बैठा बच्चों के साथ कंचे खेल रहा था। वे उसे पकड़कर घर ले आये। दूसरे बच्चों को भी खूब डांट पिलाई। लेकिन वे सब कहीं नहीं गए। पेड़ों के पीछे जा छुपे और जब वे चले गए तो निकलकर फिर से खेलने लगे।
केशव अब अपने बापू के साथ कमरे में लेटा था। उसे नींद नहीं आ रही थी। वह बाहर जाने के लिए छटपटा रहा था। तभी अमित वहाँ पहुँचा। लेकिन केशव के बापू के डर से वह बाहर ही खड़ा रहा। उसने खिड़की से अन्दर  झांककर देखा। केशव के बापू खर्राटे ले रहे थे और केशव लेटा करवटें बदल रहा था। अमित ने उसे इशारे से बाहर आने को कहा। वह दबे पाँव बाहर आया और दोनों बच्चे दौड़कर बगीचे में जा पहुँचे। फिर अपने साथियों के साथ मिलकर दिनभर वहीं खेलते रहे।


दूसरे दिन जब केशव खेलने नहीं गया तो अमित, बबलू, बिपिन और गुलबू उसे ढूँढने उसके घर जा पहुँचे। देखा, केशव खाट पर पड़ा कराह रहा है। माँ बैठी उसके तलवे मल रही है। वह लेटा पड़ा बड़बड़ा रहा है। उसके बापू लहटन भगत को बुलाने गए हैं।
अमित सोचने लगा- 'केशव दिनभर बगीचे में खेलता रहा था। उसे लू लग गई है। तेज बुखार के कारण वह बड़बड़ा रहा है। फिर यह भूत-उत का क्या चक्कर है, जो उसके बापू लहटन भगत को बुलाने गए हैं?' लेकिन बड़ों की बात थी, वह क्या करता?


लहटन भगत का नाम इलाके भर में मशहूर था। किसी को कुछ भी होता तो पहले उन्हीं को खबर दी जाती। फिर वे जैसा कहते, लोग वैसा ही करते। लोगों का कहना था कि भूत कैसा भी हो, वे उसे चुटकी बजाते भगा देते हैं। वही लहटन भगत आज केशव का भूत उतारने आये थे।
लम्बी फहराती जटा, मोटी चिपटी नाक, भुच्च काला शरीर- लहटन किसी भूत से भी अधिक डरावने लग रहे थे। उन्होंने केशव को देखते ही कह दिया, "यह नीम गाछ की डाकिन है।"
केशव के बापू यह सुनते ही घबरा उठे। केशव अचेत पड़ा बड़बड़ा रहा था।
अमित बोला, "कुछ नहीं कक्का, तेज बुखार के कारण केशव ऐसा कर रहा है। इसे डॉक्टर को दिखाइए लेकिन लहटन भगत ने उसे डांटकर भगा दिया। बोले, "तू फिकर मत कर गणेशी, मेरे रहते इसे कुछ नहीं होगा। अब तू ऐसा कर, दौड़कर जा और पाव-पाव भर लाल मिर्च, पीली सरसों और लोहबान बाजार से खरीद ला। और तू रधिया, पीतल के बर्तन में पानी भरके लेती आ और मिटटी की कड़ाही में आग भी भरकर लेती आना जरा, ठीक?"


लहटन भगत लाल मिर्च, सरसों, लोहबान आदि मुट्ठी में भरकर आग में झोंकने लगे। बीच-बीच में मन्त्र पढ़कर पानी का छींटा भी आग में देते जाते थे। कड़वी गंध और धुएँ से सारा घर भर गया। लोग खाँसते-ढासते बेदम हो आये। सभी बाहर निकल आये। तभी लहटन भगत बड़े जोर से चिल्लाये, "वह देखो, भूतनी भागी जा रही है।" लोगों ने देखा, एक नन्हीं चिड़िया आकाश में बड़ी ऊँचाई पर उड़ती चली जा रही है। भूतनी चिड़िया बनकर भाग गयी थी। लोग अपने-अपने घर जा चुके थे। केशव के बापू भी निश्चिन्त होकर अपने काम पर चल दिए।

अमित, बबलू, बिपिन और गुलबू ने मिलकर आपस में विचार किया और केशव को टांग-टूंग कर सरकारी अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने देखा और देखकर दवाएँ लिख दीं। कुछ दवाएँ तो अस्पताल से ही मिल गयीं, बाकी बच्चों ने आपस में चंदा करके खरीद लीं। दवाओं के असर से केशव का बुखार फौरन उतर गया और केशव दो दिनों में ही ठीक भी हो गया।
अमित, बबलू, बिपिन और गुलबू, तीनों मिलकर केशव को देखने उसके घर गए। अमित केशव से बोला, "गलती हो गई यार! हमने बड़ों का कहा नहीं माना और तुम्हारा यह हाल हो गया। हमें माफ कर देना यार!"


केशव मुस्कुराया, बोला, "कोई बात नहीं यार! चलो, इसी बहाने लोगों के मन का भूत तो भाग निकला?"
सभी बच्चे खिलखिला कर हँस पड़े।


- श्रीकृष्ण कुमार पाठक

रचनाकार परिचय
श्रीकृष्ण कुमार पाठक

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