प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -48

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

नवगीत- दिन में धुंध रात में ठिठुरन

दिन में धुंध
रात में ठिठुरन
दोहर सिमटी है।

धूप धरा पर
नहीं उतरती
सुबह दुपहरी तक।
सूरज सुबुका
उदयांचल पर
थकित सफर से थक।
झोंपड़ियों में
देह सिसकती
घुट्टी चिपटी है।

खूँटी फूँक
अलाव सेंकता
ठिठुरा-ठिठुरा डग।
नहीं घोंसलों
से निकला है
चीं-चों-चूँ का पग।
धूनी पर हैं
भाँग-कमंडल
गुमसुम चिमटी है।

भूख दियारा
है मचान पर
घर से निकला हल।
नहा रहा है
ठण्डे जल से
नगर निगम का नल।
खेत पटाती
मिली मोड़ पर
फटही गिलटी है।


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नवगीत- ‘छ्ठुआ’ पास हुआ

कई साल के
बाद आठवीं
‘छ्ठुआ’ पास हुआ

सोमवार व्रत
व्रत एकादशी
सालों तक आये।
शनि-मंदिर के
सभी चढ़ावे
खुशबू पहुँचाये।
तब कुछ थोड़ी
बात बनी है
मौसम खास हुआ।

संगत ही कुछ
ठीक नहीं थी
मदिरा पीता था।
और भाँग की
टिकिया खाकर
जीवन जीता था।
बीड़ी-खैनी
बुरी लतों का
था अनुप्रास हुआ।

हर की पौड़ी
पहुँच गई है
माँ काँवड़ लाने।
भीड़-भाड़ में
भक्तिभाव का
कुछ धक्का खाने।
‘काली पलटन’
के मंदिर पर
है विश्वास हुआ।।



'काली पलटन'- मेरठ का एक प्रसिद्ध मन्दिर है, कहा जाता है कि शहीद मंगल पाण्डेय ने 1857 की आजादी की पहली लड़ाई का ‘श्रीगणेश’ यहीं किया था।

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नवगीत- कुछ नहीं! कुछ भी नहीं है

मित्र! मनराखन!!
नहीं तुम आ रहे
नियमित टहलने
बात क्या है?
कुछ न कुछ तो है!

अरे! भाई!! फेसबुक पर
मत बिताओ समय इतना
कुछ न कुछ टहला करो।
काम बहुतेरे पड़े हैं
यहाँ करने के लिये
मनमीत! मत दहला करो।
मौन तुम अब तक खड़े हो
सोचते क्या? क्यों अड़े हो?
क्यों नहीं कुछ बोलते हो?
बात क्या है?
कुछ न कुछ तो है!

अरे! भाई!! क्या बताऊँ?
अब से थोड़ी देर पहले
लौटकर मोहित गया है।
दूधवाला भी खड़ा था
थी खड़ी कुछ देर महरी
दुखित हो रोहित गया है।
घुटन क्यों पाले हुये हो?
मन कहाँ डाले हुये हो?
क्यों नहीं कुछ बोलते हो?
बात क्या है?
कुछ न कुछ तो है!

अरे! बुधुवा!! बैठ तो अब?
कुशल-मंगल ठीक है सब?
राघवन अब है कहाँ पर?
बहू उसकी आ गई है?
राधिका ब्याही कहाँ है?
राजश्री अब है कहाँ पर?
रम गया है मन कहीं पर
नई दुनिया बस रही है
चैट का रोगी हुआ, बीमार हूँ
बात क्या है?
कुछ नहीं! कुछ भी नहीं है!!


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नवगीत- दो बेटों का बाप

जब तक जीया
आँसू पीया
दो बेटों का बाप।

घर-जमीन पर
खतियौनी ने
चढ़ा लिया खुद
नाम।
धन-संपति का
बँटवारों ने
बाँट लिया था
दाम।
पता नहीं वह
किन जन्मों का
भुगत रहा था पाप।

चूल्हा-चौका
कभी न छोड़े
मोहमन्त्र का
साथ।
रहा पाथता
दो रोटी भी
अंत समय तक
हाथ।
रोज भोर का
उठना करना
नई सदी का जाप।

खुला तमाशा
खुलकर देखे
गाँव-नगर के
लोग।
सबके मुँह का
एक बोल था
'यह दुनिया है'
रोग।
दुविधा में थी
तंग जिन्दगी
सही समय का ताप।।


- शिवानन्द सिंह सहयोगी
 
रचनाकार परिचय
शिवानन्द सिंह सहयोगी

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गीत-गंगा (2)