प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2017
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

मैं हर पल अपनी हस्ती के जनाज़े को उठाता हूँ
मेरा एहसां है तुझ पे ज़िन्दगी, मैं मुस्कुराता हूँ

बड़ी दुश्वारियों से बोलना इक झूठ सीखा है
कोई पूछे कि कैसे हो? "बहुत खुश हूँ" बताता हूँ

कड़ा हो वक़्त तो भी काम मेरा कब बिगड़ता है
मुझे जो आज़माता है, उसे मैं आज़माता हूँ

मेरे अंदर भी इक शैतान आसानी से रहता है
जहां के सामने बस पारसा मैं बनके आता हूँ

वो दूजे मुल्क में रहकर हुकूमत हमपे करता है
मैं अपने घर में इतना सोचकर ही काँप जाता हूँ

ग़ज़ल कहना मेरे मेहबूब लाचारी रही मेरी
कोई सुनता नहीं तो हाल ग़ज़लों को सुनाता हूँ


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ग़ज़ल-

दिन को अच्छा न लगे, रात को अच्छा न लगे
आज भी ग़म जो किसी का मुझे अपना न लगे

ज़िंदगी मैं तो तेरे बोझ से झुक जाता हूँ
लोग कहते हैं मगर मुझको ये सजदा न लगे

है कोई जो मेरी नज़रो में छुपा बैठा है
वो जो अपना न लगे और पराया न लगे

आईने से भी ग़लतफ़हमी तो हो सकती है
मेरे जैसा है मगर ये मेरा चहेरा न लगे

है कमी कोई या मश्शाक हुआ है मेहबूब
इश्क की राह इसे आग का दरिया न लगे


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ग़ज़ल-

तुम्हारी याद मेरे दोस्त इस क़दर आए
फ़रार क़ैद से हो कोई जैसे घर आए

ग़मे-हयात तुझे किस तरह छुपाऊं मैं
तू साफ़-साफ़ मेरे शे'र में नजर आए

उधर तो बाम पे गेसू सवारे जाते हैं
इधर नसीब मेरा ख़ुद-ब-ख़ुद संवर आए

उदास रहने से तो मुस्कुराना अच्छा है
मैं मुस्कुराने लगूं तो भी आँख भर आए

फ़रेब है ये नज़र का या शिद्दते-एहसास
हरेक शय में तेरा अक्स ही नज़र आए

उड़ान भरने को बस हौसला ज़रूरी है
नज़र ज़माने को मेहबूब सिर्फ पर आए


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ग़ज़ल-

मेरी आँखों में तन्हाई की रातें ढलने लगती हैं
जो यादें यार की रौशन हो मुझमें जलने लगती हैं

मैं अपने पाँव जब भी देखता हूँ, टूट जाता हूँ
ये राहें जोश मेरा देखकर ख़ुद चलने लगती हैं

नई जिस सोच से लगता था हल मिल जायेंगे सारे
वही दो-चार दिन में क्यूँ हमें ही खलने लगती हैं

शजर आला समझ के बुलबुलें ये फ़िक्रे-दुनिया की
क्यूँ मुझमें घोंसला करती हैं, मुझमें पलने लगती हैं

मेरे मेहबूब ये दुनिया मुझे तब क़ैद लगती है
सलाखें सोच की जब शख्सियत पर डलने लगती है


- मेहबूब सोनालिया
 
रचनाकार परिचय
मेहबूब सोनालिया

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