जनवरी 2017
अंक - 22 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- इण्टरव्यू

जगदम्बिका बाबू आज यह सोचकर घर से निकले थे कि आज चाहे जैसे गिरीश्वर बाबू को शादी के लिए मना ही लेंगे। पर जब वे उनके दुआरे पर पहुँचे तो अचकचाकर रह गये। वहाँ करीब दस लोग बैठे थे और सभी उन्हें देखते ही ठठाकर हँस पड़े। समवेत स्वर में बोले- "लो, एक और आ गये।"
"मतलब आप लोग भी गिरीश्वर बाबू के बेटे के सिलसिले में आये हैं?" उन्होंने दबी ज़ुबान में पूछा।
कोई बोला- "हाँ भाई, सही कहा। आराम से बैठिए। अभी हम सभी को एक-एक कर इण्टरव्यू के लिए बुलाया जायेगा।"


"इण्टरव्यू!" कुर्सी पर बैठते-बैठते अचानक हड़बड़ाकर गिरने से बचे जगदम्बिका बाबू, फिर होश सम्हालकर बोले- "इण्टरव्यू लेगा कौन?"
"अरे, एक तो गिरीश्वर बाबू ही रहेंगे, दूसरे शायद लड़के के फूफा, जो मिलिट्री में हैं।"
जगदम्बिका बाबू का दिल धक-धक करने लगा। बड़ी मासूमियत से पूछा- "और क्या-क्या सवाल पूछेंगे वहाँ?"
सभी मुस्कराये। एक आदमी, जो काफी गम्भीर प्रतीत हो रहा था, इत्मिनान से बोला- "देखिए, आप कतई परेशान न हों। जो होना होगा, होगा ही। लड़की की फोटो लाये हो?"
"जी।" वे बोले।
वह बोला- "तब ठीक। फोटो देखेंगे, लेन-देन की बात करेंगे और शायद आपकी पर्सनाल्टी भी चेक करें, उनके स्टैंडर्ड का मामला है। आदमी बराबरी में ही रिश्ता करता है।"


जगदम्बिका बाबू अचानक खासे गम्भीर हो गये। यूँ तनकर बैठ गये, मानो वे भी किसी से कम हैसियत नहीं रखते हैं। लड़की की तरफ से तो निश्चिंत थे, उनके हिसाब से तो वह लाखों में एक है, पढ़ी-लिखी भी अच्छी-खासी है, फर्राटे से अंग्रेजी बोलती है, बस और चाहिए ही क्या! बस थोड़ी दुविधा लेन-देन को लेकर थी। कितना दे दें कि इन सभी लोगों से बीस ठहरें! दो लाख, पाँच लाख, दस लाख, बीस लाख। तभी कोई बोला, लगता है बोली पचास लाख तक जायेगी। जगदम्बिका बाबू सोच में पड़ गये, भला पचास लाख वे कहाँ से लायेंगे, बीस तो किसी तरह दे भी दें। अभी-अभी रिटायर हुए हैं, इतनी रकम खाते में तो आ ही गई होगी। पर पचास लाख! बड़ी उधेड़बुन में पड़े थे जगदम्बिका बाबू। दोस्तों-रिश्तेदारों से माँगने पर क्या वे मदद न करेंगे भला! पर अगले ही पल उनका मन इस विचार से डिग गया- सब मतलबी हैं, तीन हजार तो मिलेंगे नहीं, तीस लाख कौन दे देगा! अचानक उन्हें एक ऐसा आइडिया सूझा कि वे बाग-बाग हो गये। साठ बीघे खेत हैं, आधे खेत बेच ही देते हैं नहीं तो। आराम से पचास लाख इकठ्ठे हो जायेंगे, बल्कि कुछ ज्यादा ही! लड़का होती तो क्या हिस्सा न बँटाती। आधे खेत बचेंगे, जो इकलौते बेटे के जीने-मरने के लिए बहुत होंगे। अब आत्मविश्वास से एकदम लबालब हो उठे जगदम्बिका बाबू।
उन्हें इण्टरव्यू के लिए शायद तीसरे या चौथे नम्बर पर बुलाया गया। उन्होंने गौर किया कि गिरीश्वर बाबू, जिनसे मिलकर वे कई बार गिड़गिड़ा चुके हैं, उन्हें एकदम से भाव न देने के मूड में हैं।


"आपका नाम?" रौबदार आवाज। यही शायद लड़के के फूफा थे, जो मिलिट्री में थे।
"जी, जगदम्बिका।"
"ठिकाना?"
"इस शहर से दस कोस दूर, एक गाँव।"
"बीड़ी-सिगरेट, दारू-शराब, गाँजा-भाँग कुछ लेते हो?"
"जी नहीं।"
"दाँत दिखाओ?"
"••••••••।" उन्होंने मुँह खोल दिया।
"मतलब, पान तक नहीं खाते न?"
"जी।"
"जूते निकालो।"
"जी?"
"जी, कहा जूते निकालो।" वही रौबदार आवाज।
"लो निकाल दिया।"
"यह•••यह जुर्राब फटे क्यों हैं? रौबदार आवाज और रौबीली हो आई।
"•••••••••।" अचानक जगदम्बिका बाबू को कुछ न सूझा।
"नाउ गेटआउट, गेटआउट फ्राम हियर!"
"अरे सर, सुनो तो, "रोने-रोने को हो उठे जगदम्बिका बाबू- "मेरी बेटी की फोटो देख लो, उसकी पढ़ाई देख लो और •••और जो कुछ माँगोगे, सब कुछ दूँगा मैं!"
वह आदमी, जो शायद मिलिट्री में था, अपनी सीट से उठा और उन्हें धकेलता हुआ बाहर तक ले आया। चीखा- "तुम फटेहाल आदमी, मुझे क्या दोगे। जाओ, कहीं से नये जुर्राब खरीद लो।"
जगदम्बिका बाबू सिर झुकाए हुए वहाँ से नौ दो ग्यारह होने पर विवश हो गये।

 

 

लघुकथा- गेम

उस दिन प्रिया की आँखें आँसुओं से तर थीं। बोली- "संजय, क्या मैं सिर्फ इसलिए नौकरी छोड़ दूँ कि तुम मुझ पर शक करते हो?"
"पर तुम्हें नौकरी करने की ज़रूरत भी क्या है, मैं तो कमाता ही हूँ।" वह झल्ला उठा।
"ज़रूरत है। मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहती, किसी की दया का पात्र नहीं बनना चाहती।"
"यह सब प्रोफेसर साहब ने ही तुम्हें समझाया है न?"
"हाँ, मेरे पापा ने ही समझाया है। उन्होंने ही मुझे तराशा, मेरे भीतर आत्मनिर्भर बनने का जज़्बा पैदा किया और इस लायक बनाया। फिर मुझे ही क्यों, और तमाम लड़कियों को यह पाठ पढ़ाया, जो आज अपने पैरों पर खड़ी हैं और उनके गुण गाती हैं।"
"ठीक है, ठीक है। मैं कुछ नहीं कह रहा उन्हें। जो किया, ठीक किया। पर यह तो नहीं बताया होगा कि नौकरी करना तो बाॅस से इश्क लड़ाना, उसके साथ रंगरेलियाँ मनाना, पति को धोखे में रखना और उसकी एक न सुनना।"
"संजय, क्या तुम्हें पूरा विश्वास है कि मैं ऐसा कर रही हूँ?" प्रिया काफी भावुक हो उठी।
"सुन-सुनकर आजिज आ गया हूँ मैं। अब तो लोग मेरे मुँह पर ही मेरी खिल्ली उड़ाने लगे हैं। जहाँ सुनो, वहीं तुमसे तुम्हारे बाॅस के सम्बन्ध की चर्चा। मुँह छिपाकर चलना पड़ रहा है मुझे! यदि यही सब चलता रहा तो मैं किसी दिन ज़हर खाकर अपनी जान दे दूँगा।"
प्रिया ज़ार-ज़ार रो पड़ी। अगले ही दिन उसने बाॅस को त्यागपत्र भिजवाकर नौकरी छोड़ दी।


कुछ दिन बीते।
"संजय भाई, अरे ओ संजय भाई!" उस दिन संजय आॅफिस के लिए घर से तैयार होकर चौराहे पर बस पकड़ने के लिए पहुँचा ही था कि किसी ने जोर की हाँक लगाई। उसने मुड़कर उधर ही देखा। देखा, दुर्योधन था। यही था, जिसने एक बार एक महिला को छेड़ा तो संजय ने इसके ख़िलाफ़ थाने में अपना बयान दर्ज कराया था। तभी से दोनों की बोलचाल बन्द थी।
उसे हिचकता देख दुर्योधन खुद उसके पास बढ़ आया और एक मिठाई का डिब्बा उसकी ओर बढ़ाते हुए बोला- "लो, मिठाई खा लो और ले जाकर भाभी को
भी खिला देना।"
"किस खुशी में?"
"मेरी नौकरी लग गई है यार।" कहकर वह मुस्कराया।
"कहाँ? कैसे?"
"तुम्हारी बीवी वाले आॅफिस में और उसी के पोस्ट पर। पर काफी गेम खेलने पड़े।"
"गेम?" वह चौंका।
"हाँ, मैंने तुमसे कहा था न कि कभी ऐसा सबक दूँगा कि जीवन भर याद करोगे। वही वाली बात।"
"मैं समझा नहीं।"
"यह जो अफवाह फैली थी न कि बाॅस के साथ तुम्हारी बीबी का चक्कर है, मेरा ही उड़ाया हुआ है, एक सुनियोजित रणनीति के तहत। बाॅस को भी नये अप्वाइंटमेण्ट में मोटी रकम मिलनी थी, इसलिए उसने इस अफवाह को बल ही दिया और बन गया काम।"
संजय का सिर घूमने लगा। उसने घृणा से चेहरा फेर लिया, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ गया।


- मुन्नू लाल

रचनाकार परिचय
मुन्नू लाल

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कथा-कुसुम (3)