प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2015
अंक -46

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जीवन में अनवरत प्राप्त अनुभवों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति चाहा अनचाहा इसी खिड़की से- आशा पाण्डे ओझा
एक लेखक जब रचनाएँ लिखता है तब वास्तव में वह अपने जीवन, को युग को भोगा हुआ लिखता है। जब हम किसी कवि, लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार को पढ़ रहे होते हैं, तब हम केवल लेखक के शब्द या उसकी भावनाओं को नहीं पढ़ रहे होते हैं बल्कि हम भी कुछ क्षणों के लिए ही सही पर जीने लगते हैं उसके द्वारा जीये परिवेश को, हम उसके अनुभवों में उतर जाते हैं, उसके सुख-दुःख उसके भाव-अभाव ,जय-पराजय, सब कुछ पढ़ते हुए उसी के समानार्थ आ खड़े होते हैं उसका लिखा पढ़कर महसूसने लगते हैं। वो सब कुछ जो कुछ उस लेखक ने महसूस किया होगा अपनी जीवन यात्रा, शब्द यात्रा व रचनाधर्मिता के दौरान।
 
वत्सला जी का यह काव्य संग्रह 'चाहा अनचाहा इसी खिड़की से' को पढ़ते हुए अपनी दुनिया से पृथक एक नई दुनिया को महसूस किया है, हालाँकि मन के द्वन्द्व, जीवन का संघर्ष, टूटने की वजहें बहुत कुछ हम-सा ही है, पर नया है। इसमें भावों का बुनाव हटकर है, मन का लगाव भिन्न है, जिन्दगी से जुड़ाव कुछ तो अलग दीखता है इस खिड़की से हमारी खिड़की की बनिस्बत। काव्य संग्रह के शीर्षक में ही बहुत देर तक डूबी सोचती रही कि सचमुच जिन्दगी की इस खिड़की से कितना चाहा अनचाहा सबकुछ देखना पड़ता है, सुख-दुःख, आँसू-हँसी, मिलन-बिछोह, सारी गर्म ठंडी बयार चली आती है इस खिड़की से चाहे अनचाहे।
 
इस काव्य कृति में पृष्ठ नौ से एक सौ सत्रह तक कुल 100 से अधिक कवितायेँ संकलित हैं। कवितायेँ छोटी भी हैं, बड़ी भी हैं पर मेरा मानना है कि कवितायेँ ना छोटी होती हैं न बड़ी होती हैं। महत्वपूर्ण यह होता है कि लेखक ने अपनी अनुभूतियों को कितनी सहजता से कितने प्रभावोत्पादक तरीके से अभिव्यक्त किया है भाव-भूमि कितनी विस्तृत है?
किसी भी साहित्यिक कृति पर विचार दो दृष्टियों से किया जा सकता है। एक तो गहन अध्ययन, दूसरा विहंगावलोकन। गहन अध्ययन करते समय रचना के प्रत्येक अंश पर गंभीर चिंतन किया जाता है। रचनाकार का परिवेश, उस परिवेश का रचनाकार पर प्रभाव, उन रचनाओं के सम्बन्ध में अन्य विद्वानों के विचार आदि पर गहराई के साथ विचार किया जाता है।
इनकी पहली कविता 'मछली की आँख एक दुनिया' इस एक ही कविता में एक समांतर दुनिया समेटी है विविध भावों की, एक से ही अनुभवों की। यह कविता लगभग 16 पृष्ठों पर एक ही शीर्षक से 36 कविताओं का समूह है, जो जिन्दगी के विविध पहलूओं को समेटे हुए जीवन के हर संदर्भों के साथ उपस्थित है। इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे लगा की जीवन के प्रति अपने समग्र दृष्टिकोण को रचा है कवयित्री ने। कहीं जर्ज़र मन का मर्म प्रकट हुआ है, तो कहीं आशा-निराशा के भंवर में उलझे जीवन की वेदना अभिव्यक्त हुई है, कहीं स्वप्नों व स्मृतियों के बनते-बिगड़ते सांचे में छटपटाता मन व्यक्त हुआ है, कहीं पौरूष का पाषाण होना उभरा है तो कहीं पिघलती हुई स्त्री भी रुपयात हुई है। संग्रह की पहली कविता ही जिन्दगी के फलसफे को बड़ी आसानी से समझा देती है-
 
“जब पी रहे थे  हम
घूँट जीवन के
तब निगल रही थी वह
छोटी-छोटी मछलियाँ"   (मछली की आँख एक दुनिया)
 
सच ही तो है, जिन्दगी के घूँट में आशा-निराशा, सुख-दुःख, राग-द्वेष, हर्ष-विषाद और भी साँसों के घूँट में न जाने कितनी मछलियाँ निगलते हैं हम।
 
"आज भी है
भरी हुई
जीवन से
कट रही थी
जिस पल
था साक्षात्कार
जीवन से"    (तेरी आँख)
 
यह कविता हाथ से फिसले वक्त और टूट कर  बिखरे सपनों की मार्मिक अभिव्यक्ति है। संघर्षरत जीवन और जिजीविषा का उत्कृष्ट प्रस्तुतिकरण है। इसी शीर्षक की चौथी कविता में प्रिय बिछोह का वह दर्द समाया है, जो तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद हृदय को मथ देने वाली वेदना में डूबा है।
यथा-
 
"कांच की
दीवार पार
उसकी आँख से
हर दिन टपकती दो बूँद
तुमसे दूर
होने के बाद
यूँ ही तो हँसता रहा
मन"
 
इस पहली कविता के 36 सोपान जिन्दगी के हर पहलू को प्रस्तुत करती हैं। कवितायेँ इस बात की प्रमाण है कि कवियत्री ने जीवन में अनवरत प्राप्त
अनुभवों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है। दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन के मूल्यवान अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति है। सरलता, सहजता व मार्मिकता  इनकी कविताओं की विशेषताएं हैं।
रचनाकार ने सीधी-सादी जीवंत भाषा व सर्वग्राह्य शैली में अपनी बात कहने का प्रयास किया है। इस संकलन में नारी मन के कोमल भाव कई जगह प्रकट हुए
हैं, जो एक नर्म अहसास व गुदगुदाती ताजगी से भर देते हैं। यथा-
 
"मैं और तुम
वह रात
पहली रात का सूर्य
बुदबुदाते हुए
पहली छुअन"
 
इन कविताओं में प्रेम-प्रणय के पल सहेजे गए हैं, तो दूसरी ओर देह से परे भी सच्चा प्रेम खोजती हुई स्त्री मन की छटपटाहट भी है। इसी छटपटाहट को
कवियत्री ने कितनी मार्मिकता से अभिव्यक्त किया है एक छोटी-सी कविता से-
 
“तुम खोजते
पाते रहे देह
मैं इससें इतर
तलाशती रही
तुम्हें"              (क्या खोजती मैं)
 
यहाँ स्त्री मन को उसकी चाह को कितनी गहराई से उकेरा है लेखिका ने। इस संकलन में प्रेम के विभिन्न आयामों की सूक्ष्म व्यंजना विशेष आकृष्ट करती है।
 
"हरसिंगार की
बारिश में
तुम लेटे थे
मैं बैठी थी
रची जा रही थी
एक और सृष्टि
तुम्हारे पीठ पर पत्ते की नोक से
लिख बैठी थी प्यार
उतरती गई
अतल गहराइयों में
भीगती रही धरती
उलीचती रही सागर
तुमने करवट बदली
लोप हो गई मैं
 
यहाँ मैं का लोप हो जाना प्रेम की पराकाष्ठा दर्शा जाता है। साधारण जीवन के मार्मिक चित्रण के सिवा एक असाधारण प्रेम की कामना भी है। इन कविताओं में  निराकार निरंजन से प्रेम, उसको पाने की कामना, उसें समर्पित होने की बलवंती इच्छा। ऐसी कुछ कवितायेँ हैं, 'प्रार्थना', 'वह', 'अश्रुजल', 'पाया एक सत्य', 'सच या सजा' आदि।
इस कविता संग्रह में सबसे अधिक स्पर्श करने वाली बात है नारी का अंतर व उसके अंतर की अकुलाहट। जिस तरह लोहा आग में तपता है, गलता है, पिघलता है और फिर मनचाहे अगणित आकारों में ढाल लिया जाता है, वैसे ही नारीलोह के समान दृढ रहते हुए भी जीवन की भट्टी में जलती है, पिघलती है और विभिन्न रूपों में ढलती जाती है, हर चोट को छुपाते हुए। कुछ कविताओं में स्त्री के अंतर को कितनी बखूबी ढाला है!
 
"धूप थी मुझमें कि
धूप में थी मैं
जलना तो बाहर-भीतर दोनों ही रहा"
 
"क्या यूँ ही
मर सकती है
एक स्त्री
रेगिस्तानी
किरकराती धूप में
खड़ी पेड़-सी
एवं नदी बहती
भीतर-भीतर
गुप-चुप आपाधापी के
शिशिर में
जमी है
उदासी की परत
 
नदी, धूप, पेड़ प्रतीक बनके प्रकट हुए हैं यहाँ स्त्री मन की उदासी, तड़प, वेदना व टूटन-बिखराव के। इस संग्रह की सभी कविताएँ अपना अलग प्रभाव छोड़तीं हैं। जो कवियत्री की काव्य यात्रा के साथ-साथ उनकी जीवन यात्रा की भी साक्षी हैं। इन कविताओं में निजता का मनोमंथन नहीं है बल्कि इन कविताओं में स्त्री की पराई पीड़ भी व्यक्तिगत दर्द व यातना के रूप में उभरती दिखाई देती है। ऐसी ही कुछ कविताएँ हैं- 'पीले बिच्छू', 'उस दिन से', 'विश्व सुंदरियां', 'स्त्री और घोड़े', 'तुमने कहा' आदि। इन कविताओं में गिद्द, हष्टि व भड़वा मानसिकता के बीच झटपटाती स्त्री के देह के दर्द को उजागर किया है कवियत्री ने। वह क्षुब्ध भी है स्त्री को सामान बनाकर बाज़ार में उतारे जाने से।
ये कवितायेँ एक जागरुक रचनाकार की कविताएं हैं, जो अपनी मिटटी, अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति का लोप होते हुए देखने से विचलित है, दुःखी है और उनकी सही संवेग दृष्टि उनके आस-पास की सामान्य-सी चीज़ों को उठाकर कविता को वैचारिक फलक तक ले जाती हैं।
 
कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि वत्सला जी की कविताओं में जीवन की स्पष्ट व सारगर्भित भावाभिव्यक्ति है। प्रत्येक कविता जीवन की गहन अनुभूति से जुड़ी है। भाषा और कथ्य बड़े पैमाने पर फैले हुए हैं। ऐसी कवितायेँ भी हैं जिनमें शब्द एक बिम्ब देता है, वही बिम्ब विचार बनता है, इसे जिन शब्दों का रचनाओं में प्रयोग हुआ है वो पाठक को भी एक नया आयाम देते हैं।
वत्सला जी की अब तक प्रकाशित तीन काव्य कृतियों में से मुझे दो काव्य कृतियों को पढने का सुनहरा अवसर मिल चुका है। इनके दोनों काव्य संग्रह
में मुझे इनके काव्यात्मक सामर्थ्य, गहन अध्ययन, गूढ़ मनन व जीवन का असीम अनुभव दिखाई दिया।
कविताओं में सांकेतिकता भी है और अर्थ की गहनता भी है। छोटी-छोटी कविताओं के धागों में गहन व गूढ़ अर्थों के मोती पिरोये गए हैं। सार्थक शीर्षक, आकर्षक आवरण, सुन्दर साज-सज्जा के साथ उतरी इस काव्य-कृति का काव्य जगत में अभिनन्दन होगा, ऐसा मेरा विश्वास है। इस पुस्तक के प्रकाशक बोधि प्रकाशन, जयपुर को उत्कृष्ट प्रकाशन के लिए साधुवाद।
 
समीक्ष्य पुस्तक- चाहा अनचाहा इसी खिड़की से (कविता संग्रह)
समीक्षक- आशा पाण्डेय ओझा
रचनाकार- वत्सला पाण्डेय
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर

- आशा पाण्डे ओझा