प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2017
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़बरनामा

काव्यमंच जोधपुर के द्वारा ‘कबीर’ पर परिचर्चा का आयोजन


काव्यमंच जोधपुर के द्वारा रविवार 8 अगस्त, 2017 को क्रांतिदृष्टा ‘कबीर’ पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। चर्चा का प्रारंभ करते हुए युवा कवि चन्द्रभान बिश्नोई ने कहा कि कबीर हमें भीतर की यात्रा करवाते हैं। तीर्थ, जप, व्रत आदि तमाम बाह्याचार को छोड़कर कबीर परम तत्व को स्वयं के भीतर खोजने का मार्ग दिखलाते हैं। युवा कहानीकार उपासना ने कहा कि कबीर लोक के कवि हैं और बावजूद इसके वे किसी अनंत के कवि हैं, जो अनंत को बाहर नहीं कहीं अपने भीतर ही खोजने के हिमायती हैं पर लगता है स्त्री सम्बन्धी मान्यताएं अपने परिवेश से ग्रहण करते हुए वे अधिक सावधान नहीं थे। वे कैसे कह पाए कि स्त्री कि छाया पड़ने से काला नाग भी अँधा हो जाता है? वे नारी के संग के विरोधी क्यूँ थे? इस तरह कबीर समसामायिक नहीं प्रतीत होते हैं। युवा कवि और कहानीकार नवनीत नीरव का कहना था कि कबीर लोक में मौजूद तो हैं लेकिन लोक में उनका प्रभाव कम है, नब्बे प्रतिशत लोगों के जीवन में कबीर कहीं नहीं है वर्ना हमारे समाज की ये दुर्दशा नहीं होती। विचार के रूप में हम चाहे कबीर के प्रशंसक हों लेकिन व्यवहार में वो हमें स्वीकार नहीं हैं। कबीर ने भी अपने समय में भी उस बाजार को जरुर महसूसा होगा, जिस बाजार रूपी अजगर ने आज हमें कसकर लपेट रखा है और हमारा दम टूट रहा है।

चिंतक प्रमोद शाह ने कहा कि कबीर की बात करते हमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद से लेकर डॉ.धर्मवीर और पुरुषोतम अगरवाल के दृष्टिकोणों को भी ध्यान में रखना होगा। प्राचीन भारत में शास्त्रीय धारा के विलोम लोकधारा का प्रतिनिधित्व बुद्ध करते हैं तो मध्य भारत में कबीर और आधुनिक भारत में गांधी। रंगकर्मी और कवि कमलेश तिवारी ने कहा कि ‘खोजी हो तो तुरंत मिल जाय,  पल भर की तलाश में’ में कबीर जिस पल का जिक्र कर रहे हैं और पूरे विश्वास के साथ कर रहे हैं, उसकी खोज ही कबीर के अध्ययन का ध्येय है। कवि और चिंतक दिनेश सिंदल ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रचनकार के भीतर जिस सत्य का उदय होता है वो न हिन्दू होता है न मुसलमान होता है, न स्वर्ण होता है न दलित होता है, न पुरुष होता है और न स्त्री होता है लेकिन उसका जो क्राफ्ट का चयन है, उसकी जो अभिव्यक्ति है वो उसे किसी न किसी ढांचे में बाँध देती है। ये मत कहो कि कबीर ने क्रांतिकारी असर नहीं डाला है, हम क्रांति को ही गलत समझ रहे हैं, क्रांति एक बार नहीं होती है बल्कि ये एक सतत प्रक्रिया है। कबीर ने जो बीज हमारे भीतर डाले हैं वो वृक्ष बन रहे हैं, समाज बदल रहा है। कबीर से किसी ने प्रेमभाव ग्रहण किया तो वो किसी क्रांति से कम नहीं है।

परिचर्चा का समापन करते हुए काव्यमंच के अध्यक्ष और कवि शैलेन्द्र ढड्ढा ने कहा कि समग्र कबीर को अभी तक समझा ही नहीं गया है, हमने कबीर के केवल दस प्रतिशत पदों से परिचय प्राप्त किया है, नब्बे प्रतिशत पदों की कोई चर्चा ही नहीं करता है। कबीर को हमने अपने-अपने उद्देश्यों के अनुरूप खण्ड-खण्ड कर दिया है। कबीर का पूर्ण अध्ययन अभी शेष है और हम पूर्व के आचार्यों और विद्वानों के निष्कर्षों को मानने को विवश हैं। कबीर पर पुनर्विचार की जरुरत है, कबीर को ताजा करने की जरुरत है।

इस अवसर पर श्री दिनेश सिंदल ने स्वरचित छंदों का पाठ भी किया:-


कभी गाता है कबीरा का एकतारा मेरे भीतर
कभी मैं देखता हूँ ये सारा जहां मेरे भीतर


- सुरेन बिश्नोई