जनवरी 2017
अंक - 22 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

शहर के अंदर बसा शहर

शहर के अंदर भी बसता है
एक अंधेरा शहर
उस अंधेरे शहर में
सब-कुछ अलग-थलग होता है
मकान नहीं होते
तंबुओं में रहते हैं लोग,
वहाँ के बच्चे नहीं जानते
कि बच्चे भी पहनते हैं कपड़े
बस कागजों पर चलते हैं
वहाँ के विद्यालय,
वहाँ के अस्पताल

शहर के अंदर भी बसता है
एक अंधेरा शहर
जहाँ होती हैं
खौफनाक गलियाँ,
बलात्कारी, खंडहर, मंदिर
और डरावनी रातें,
वहाँ की सड़कें और नालियाँ
लगभग एक ही होती हैं
हाँ, उनकी मरम्मत कागजों पर
नियमित होती है
वहाँ के लोग नहीं जान पाते
योजनाओं के बारे में,
आवंटनों के बारे में
उन्हें अनभिज्ञ रखा गया है
पीढ़ियों से
उनके अपने ही अधिकारों से

शहर के अंदर भी बसता है
एक अंधेरा शहर
जिस शहर को
नहीं जानती सरकार,
नहीं जानते सरकारी दफ्तर,
नहीं जानती राजनीतिक पार्टियाँ
उन शहरों को सिर्फ जानते हैं
चुनाव, घोटाले, दंगे
और धर्मांतरण


*************************


सभ्यता का विकास

मानव सभ्यता के विकास में
हम मानव से पशु
कब बन गये
पता ही ना चला!

सभ्यता के उदय में
समस्त मानवीय मूल्यों का
पतन होता गया

संसाधनों की खोज और विकास में
हमारी सारी संवेदनाएँ
विस्मृत होती गयीं
पनपते बाज़ार में

कराहते/टूटते रिश्तों ने
घर में ही घर बना डाला

सभ्यता विकास के इस दौर में
पशुता में तब्दील हो चुकी
आदमियत ने
अपना ही विनाश कर डाला

यही हमारी सभ्यता का
चमकता विकास है, कि आज
आदमी ही
आदमी के खिलाफ खड़ा है


- परितोष कुमार पीयूष

रचनाकार परिचय
परितोष कुमार पीयूष

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (3)