प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

झूठ

भुट्टो तानाशाह नहीं था
तुम्हें कैसे पता चला?
और आतंकवाद का
धर्म से कोई संबंध नहीं है
तुम इस बात पर यक़ीन कर सकते हो?

तब तुम यह भी जान लो
कि हमारे मोहल्ले में रोज़ पानी आता है
फुल प्रेशर से, चौबीसों घंटे,
नगरपालिका के अफसरों ने शपथ ली है
कि वे अब रिश्वत नहीं खाएँगे,
वकील अब केवल सच बोलेंगे,
डॉक्टर मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव से नहीं मिलेंगे,
भारतीय लोग गन्दगी नहीं फैलायेंगे,
ब्लॉगिंग नहीं है एक तरह की पोर्नोग्राफ़ी,
सेंसर बोर्ड के चेयरमैन महेश भट्ट
अश्लीलता के घोर विरोधी हैं,
मंच पर कवियों से चुटकुले सुनाने बंद कर दिये हैं,
लड़कियों की संख्या लड़कों से ज़्यादा हो गयी है,
धर्मगुरु धर्म का पालन करने लगे हैं,
तालिबान से ज़्यादा नरम दिल कोई नहीं होता
और मुझसे झूठ नहीं बोला जाता

हर सच अपनी क़ीमत माँगता है
और झूठ उस क़ीमत को चुकाने को तैयार रहता है


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मैं कहता रहता हूँ...

तुम नहीं होते हो सुनने को
कोई नहीं होता है सुनने को
तब भी मैं कहता रहता हूँ, कहता रहता हूँ
और सुनती हैं दीवारें

सुनती हैं बिस्तर की चादर की सलवटें
सुनती हैं कमरे में इधर-उधर बिखरी किताबें
मेरे भीतर का सुरसुरा अधमरा कोलाहल
मैं कैसे अपनी ही लाश को काँधे देता आया हूँ
मैं कैसे बिना आँसुओं के ही रोता आया हूँ
मैं ज़िन्दा हूँ इसकी ख़बर तुम्हें हो या न हो
पर इन्हें है और रहेगी तब तक
जब तक कि
मैं तुम्हारे लिए सच में ही मर न जाऊं
और तब ये सब सुनायेंगे तुम्हें मेरी बातें


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बोल रही थी कविता

बोल रही थी सिर्फ कविता
और सुन रहा था पूरा अस्तित्व
जैसे तुतलाते बोल रही हो
घर की सबसे छोटी बेटी
और सुन रहा हो पूरा परिवार

बोल रही थी सिर्फ कविता
और सुन रहा था पूरा अस्तित्व
जैसे हौले से सीख दे रही हो
घर की सबसे बड़ी माँ
और सुन रहा हो पूरा परिवार

बोल रही थी सिर्फ कविता
और सुन रहा था पूरा अस्तित्व
जैसे मधुर बोल रहे हों
हरीप्रिया के प्रिय हरी
और सुन रहा हो पूरा देव वृन्द

बोल रही थी सिर्फ कविता
और सुन रहा था पूरा अस्तित्व
जैसे चेतावनी में बोल रहा हो
युग का सत्य
और सुन रहा हो पूरा क्षण समूह


- शैलेन्द्र ढड्ढा
 
रचनाकार परिचय
शैलेन्द्र ढड्ढा

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कविता-कानन (1)