प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2017
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

अभिमन्यु

सड़क बनाने के लिए
तोड़ दी गयी हैं
उनकी झुग्गी-झोपड़ियाँ
झोपड़ियाँ टूटने के बाद भी
वे छोड़ते नहीं हैं अपनी जगह
वहीं बने हुए हैं
जैसे शहद लूट लेते हैं लोग
फिर भी
मधुमक्खियाँ छोड़ती नहीं अपना छत्ता

उसी तरह ध्वस्त घरों से सटकर
बैठे हैं ये
बारिश आई तो भी
पन्नी ओढकर बैठे रहे वहीं
चूल्हा नहीं जला तो भी
कोई चिन्ता नहीं
यह नयी बात नहीं उनके लिए

ये भी किसी गुमनाम अभिमन्यु की
संतान हैं
जो गर्भ में ही सीखते हैं
भूख के चक्रव्यूहों को तोड़ना
आसमान को छत बना लेना
जमीन को बिस्तर
यद्यपि कहाँ किस चक्र तक जाकर
ये हो जायेंगे असफल
और मारे जाएँगे
इन्हें नहीं मालूम


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लड़की

गर्मी की धूप में
सुर्ख़ बोगेनविलिया की
एक उठी टहनी-सी
वह पतली लड़की
गर्म हवा झेलती
साइकिल के पैडल मारती
चली जा रही है

वह जब भी निकलती है बाहर
कॉलेज के लिए
लौटते हुए कई काम हो जाते हैं
रास्ते में दवा की दुकान है
और पोस्ट ऑफिस भी
काम निबटाते और वापस आते
देर हो जाती है अक्सर
सवेरे का गुलाबी सूरज
तपकर हो जाता है सफेद तब तक

रोज ही करती है सामना लू का
उसे अपना रास्ता मालूम है
अब रास्ते में जो मिले
छाँह की उम्मीद उसे नहीं रहती है
धूप के लिए लड़की
हमेशा तैयार रहती है


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मैंने प्यार बाँटा

मेरे पास प्यार था
जो मैंने बाँटा
फूलों और तितलियों को
जमीन, आसमान और बादलों को
हवा और चिड़ियों को
पहाड़ों, नदियों और झरनों को
धूप-किरणों और पत्तियों को
दूब पर रेंगते घोंघे को
रामजी के घोड़े और भृंग को
कुत्तों, बकरियों और हिरनों को
गाय, भैंसों और घोड़ों को
उदास चेहरों और बच्चों को
और भी न जाने किस-किसको
सबको बाँटते-बाँटते भी
खत्म नहीं हुआ है प्यार
अब तक ज्यों का त्यों है
ताज्जुब है!


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यह अपराध नहीं है

वे दे रहे हैं
फाइव स्टार होटलों में लंच-डिनर
पर घर की थाली मेज पर धरी रह जाती है
दिन पर लिखा है उनका नाम
रात भी उनकी मुट्ठियों में समा जाती है

पत्नी तरसती है साथ खाने के लिए
बच्चे तरसते रह जाते हैं
पिता की गोद में बैठने के लिए
माँ तरसती रह जाती है
बेटे से दो बातें करने के लिए

अपने घर को बनाने के लिए
अपने ही घर से
निष्कासन ले लेना पड़ता है
स्वेच्छा से

वे कागज के टुकड़े हमें थमाकर
हमसे छीन रहे हैं हमारा समय
पैसों के ढेर पर बैठकर भी
फुर्सत के मामले में
कंगाल हो गए हैं हम

हमसे हमारे समय को छीनकर
उन्होंने हमें जिन्दगी से
बेदखल करने की कोशिश की है
पर यह आज की दंड-संहिता में
अपराध नही है


- अंजना वर्मा
 
रचनाकार परिचय
अंजना वर्मा

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