प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2015
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत
गीत
 
तुम रहते हो, खुशियों के भी मौसम सारे रहते हैं
फिर भी हम जीवन में कितने मारे-मारे रहते हैं
 
थक जाते हैं चलते-चलते
कैसी मंजिल ढूँढ रहे
मझधारों से प्यार किया है
लेकिन साहिल ढूँढ रहे
कहने को तो साथ हमारे चाँद-सितारे रहते हैं
फिर भी हम जीवन में कितने मारे-मारे रहते हैं
 
महफिल में हैं फिर भी जैसे
लगता आज अकेले हैं
हमने तो बस रोना सीखा
जग में कितने मेले हैं
दुनिया के हर खिलते लम्हें साथ हमारे रहतेे हैं
फिर भी हम जीवन में कितने मारे-मारे रहते हैं
 
दर्द भरी धुन गाने वाले
साज बजाते शहनाई
दिन की चाहत में कट जाती
रातों की भी तन्हाई
फूलों के सँग काँटे भी तो रूप सँवारे रहते हैँ
फिर भी हम जीवन में कितने मारे-मारे रहते हैं
 
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गीत
 
सभी कह रहे हैँ मुझे एक दम से
कि मैँ हो रहा बदनुमा रोज ग़म से
 
दिल सोचता है कि क्या हो रहा है
मैँ रो रहा और जग सो रहा है
नहीँ सुख मिला है मुझे तो जनम से
कि मैँ हो रहा बदनुमा रोज ग़म से
 
ठोकर लगे रोज फिर होश क्योँ है
मुझमेँ न जाने यही दोष क्योँ है
बढ़ी उलझनें हैँ बढ़े हर कदम से
कि मैँ हो रहा बदनुमा रोज ग़म से
 
धोखा मिले प्यार मेँ आजकल है
ग़म है बहुत ना हँसी एक पल है
नहीँ बात कोई करे आँख नम से
कि मैँ हो रहा बदनुमा रोज ग़म से

- आकाश महेशपुरी
 
रचनाकार परिचय
आकाश महेशपुरी

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गीत-गंगा (1)