प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2015
अंक -46

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

साहित्य में कथानक का प्रश्न: डॉ. शशांक शुक्ला
साहित्य में कथानक को ‘प्राण’ कहा गया है। कहीं इसे आधार रूप में देखा गया है, तो कहीं इसे ‘आत्मा ’ कहा गया है। स्पष्ट है कि कथानक की उपयोगिता और महत्व के सन्दर्भ में कोई संशय नहीं है। यहॉ प्रश्न कथानक के बहाने सामाजिक  संरचना को समझना और सामाजिक संरचना के बीच कथानक के बनने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। पहला प्रश्न यह है कि सामाजिक संरचना के बीच कथानक के बनने की प्रक्रिया क्यों है? समाज की गति के बीच कथानक जन्म लेते हैं, इसीलिए समाज में परिवर्तन के साथ ही कथ्य या कथानक बदलने लगते हैं। इस ढंग से समाज के बनने का असर कथानक के बनने से जुड़ा हुआ है। लेकिन यहाँ पर हम कथावस्तु और कथानक की प्रक्रिया को समझ लें। कथ्य से कथानक बनने का प्रश्न सामाजिक व सांस्कृ्तिक भी है और साहित्यिक भी। हर समाज अपने लिए एक कथ्य चुनता है। कहना क्यों है? यह प्रश्न हर समाज चुनता ही है। फिर कथ्य और कथानक में बदलाव या रूपान्तरण की प्रक्रिया बड़े सूक्ष्म स्तर पर चलती रहती है। इस  बदलाव की प्रक्रिया साहित्यिक संदर्भों में आकर अपना स्वरूप बदल लेने की भी है और तथ्य के संस्कृति बनने की भी। यहाँ इस प्रश्न पर भी हम विचार कर सकते हैं कि कथ्य बनता कैसे है? हर वस्तु्- परिस्थिति- स्थिति- विचार कथ्य  नहीं होते हैं। विचार परिस्थिति के कथ्य  बनने के पीछे भी हमारी अपनी आंतरिक दृष्टि कार्य करती रहती है। हर समाज-संस्कृति अपने चुनाव में उन तथ्यों का चयन करता है जो उस युग के प्रतिनिधि होते हैं। तो प्रतिनिधि तथ्यों का चुनाव ही कथ्य बनने का आधार बनता है। इस संबंध में प्रश्न उठ सकता है कि क्या तथ्य ही कथ्य है?
 
जैसा कि हमने कहा कि हर तथ्य नहीं, वह तथ्य जिसमें समाज-संस्कृति के विकास की दिशाएँ छिपी हुई हों। सब तथ्य इस दृष्टि से हमारे लिए काम्य नहीं बनते हैं, इसीलिए जो सभी तथ्य को कथ्य बना लेना चाहते हैं, वे तात्कालिकता के भार/आतंक से दबे लोग होते हैं। तात्कालिक मांग और वास्तविक मांग में फर्क है। जो लेखक-विचार तात्काालिक मांग का हल खोजना प्रारम्भ  कर देते हैं, वे अल्पजीवी सिद्ध होते हैं। वास्तविक मांग आवश्याकता को पहचानने वाला लेखक ही तथ्य को कथ्य  में रूपान्तारित करने की क्षमता से युक्त होता है। अत: जिनके लिए सभी तथ्य घटनाएँ यथार्थ जैसी दिखती हैं, वे यथार्थ बोध से वंचित लोग होते हैं। फिर प्रश्न यह है कि कथ्य  कैसे बनता है? हमने पूर्व में संकेत किया कि कथ्य रूपान्तरण की प्रक्रिया समाज व संस्कृति की जरूरत व आवश्यकता से निर्मित होती है। हर समाज व साहित्यिक अपने कथ्य चुनता है। कालिदास के समय ने अपना कथ्य चुना व तुलसी-सूर के समय ने अपना कथ्य। कथ्य-चयन की प्रक्रिया में प्राय: हमें लगता यह है कि कवि कथ्य का चयन करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह होती है कि संस्कृति अपना कथ्य लेखक से चुनवाता है। कथ्यक एक चयनात्मक प्रक्रिया है। हर युग के कुछ सचेत व्यक्ति यह तय करते हैं कि क्या कहना है? लेकिन कई बार समाज की प्रभुत्ववादी ताकतें भी यह भ्रम रचने में सफल हो जाती हैं कि अमुक तथ्य ही कथ्य है। लेकिन यह भ्रमित तथ्य होता है, जिसका जल्दी  ही नाश हो जाता है। तो कथ्य बनने की प्रक्रिया का सीधा और दीर्घकालीन संबंध सचेत लोगों द्वारा ही निश्चित होता है। हर युग के सचेत व्यक्ति, परम्परा के प्रगतिशील बिन्दुाओं को जाँच करके अनका युगानुरूप परीक्षण करते रहते हैं। वे ऐसे कथ्य को चुनते हैं, जो न केवल समसामयिक आवश्यकताओं से निर्मित हआ हो, अपितु उसमें मानव-सत्यक के दीर्घकालीन समाधान को टटोलने की क्षमता भी हो। इस संक्षिप्त प्रस्तवना के बाद हम इस प्रश्न पर विचार कर सकते हैं कि कथ्य से कथानक में ढलने की प्रक्रिया क्या है?
 
इस संबंध में ध्यान रखने की चीज यह है कि कथ्य ही कथानक का  आधार है। हम जिस कथ्य को चुन रहे हैं, वह धार्मिक-सांस्कृतिक है या राजनीतिक या पारिवारिक संबंध? इन प्रश्नों के आधार पर कथानक निर्मित होता है। लेखक इन सारे प्रश्नों पर विचार के बाद ही कथानक बुनता है। पहले कथ्य का विस्तार, फिर चरित्र का विकास तथा चरित्र के अनुसार घटना रखने की प्रवृत्ति। ये सब कथानक निर्माण के आधार बनते हैं। कथानक निर्माण व विकास में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि लेखक चरित्र किस प्रकार का चुनता है? उसके चरित्रों का टाइप क्या है? क्योंकि कथानक का विस्तार पात्रों व घटनाओं के साथ चलता रहता है। पात्र के अनुरूप घटनाएँ व घटना से कथानक को गति इस प्रकार कथानक निर्माण के बिन्दु कथ्य-चयन, समस्या कथन व क्रियाशील व्यक्तित्व के आस-पास निर्मित होता है। इस प्रकार कथानक के बुनने का प्रश्न शिल्पगत प्रश्न नहीं है, अपितु सांस्कृतिक प्रश्न है। लेखक बहुधा कथानक निर्माण या विकास के लिए तथ्यों का चुनाव कर लेता है, लेकिन यह भी होता है कि कथानक में कुछ तथ्य ही आकर कथानक को मजबूती प्रदान कर जाते हैं। कथानक की मजबूती के लिए हम अक्सर तथ्यों/घटनाओं तक ही देख पाते हैं, लेकिन किसी भी लेखक की दृष्टि उसके कथानक को रचती है। तथ्य-घटना का चयन करना हो या चरित्रों का विकास करना, सभी लेखक की दृष्टि का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। रचना में आये कथन कथानक का प्रश्न बनते हैं। कथन के बिन्दु लेखक निर्धारित करता है और वही रचना के हेतु होते हैं।
 
कथानक और लेखक की प्रतिभा के सम्बन्ध को भी उठाया गया है। कलावादी विचारक प्रतिभा को मुख्य मानते हैं। उनका तर्क है कि यदि कवि में प्रतिभा है तो वह सूई की नोंक पर भी श्रेष्ठ साहित्य का निर्माण कर सकता है। क्या वाकई ऐसा होता है? महान रचनाएँ सुगठित कथानक के आधार पर रचित होती हैं। बिना कथ्य-कथानक के क्या महान साहित्य सृजित हो सकता है? अर्थात् नहीं हो सकता। परम्परावादी चिंतकों का मत है कि श्रेष्ठ साहित्य, श्रेष्ठ कथानक के बिना सृजित नहीं हो सकता। कथानक और प्रतिभा का सम्बन्ध क्या है? यह समझना अनिवार्य हो जाता है। हमने संकेत किया कि सुगठित कथानक के बनने की प्रक्रिया व कारण ठोस वस्तुनिष्ठ होते हैं। तथ्य से कथ्य और कथ्य से कथानक तक विकसित होने की प्रक्रिया प्रतिभाशील लेखक द्वारा ही सम्पन्न होती है। संग्रह और त्यााग का विवेक कर लेखक अनौचित्य प्रसंगों को छोड़ देता है तथा औचित्यतपूर्ण प्रसंगों को रखकर उन्हें और सृजनात्मक बनाने का उद्यम करता है। इस संदर्भ में कुछ लोगों ने यह प्रश्न भी उठाया है कि क्या कारण है कि एक ही कथ्य पर लिखकर भी रचनाएँ अलग-अलग महत्व प्राप्त कर लेती है। जैसे उदाहरण स्वरूप यदि हम कहें तो कह सकते हैं कि रामकथा के कथानक को आधार बनाकर वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति, तुलसीदास, मैथिलीशरण गुप्त, निराला इत्यादि ने लिखा, लेकिन उनमें रचनागत पार्थक्य स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। क्या इसका कारण रचनागत प्रतिभा है? कलावादी चिंतक इसके पीछे प्रतिभा को मुख्य कारक मानते हैं। एक दूसरा मत समाज-संस्कृति के दबाव से निर्तित संभावनाशील कथ्य या कथानक की श्रेष्ठता को इसका  कारक मानते है। इस संदर्भ में दोनों स्थितियाँ होती रहती हैं। सामाजिक गति में परिवर्तन के साथ ही प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का प्रस्फुटन व उसका सामाजिक गति से जुड़ जाना। श्रेष्ठ कथानक बिना सामाजिक गति के बोध के संभव ही नहीं हो सकता व सामाजिक गति को केवल प्रतिभाशाली ही पकड़ सकता है, पकड़ पाता है।

- डॉ. शशांक शुक्ला
 
रचनाकार परिचय
डॉ. शशांक शुक्ला

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