दिसम्बर 2016
अंक - 21 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

उड़ गये हैं हाथ से तोते कभी के
सामने हैं पँख टूटे ज़िन्दगी के

कौन कहता है अँधेरा ही फलेगा
पाँव भारी हो गये हैं रौशनी के

जब से उतरा आँख का पानी तभी से
आपको फ़बते नहीं ज़ेवर ख़ुशी के

आज फिर तस्वीर को तेरी निहारा
मन में उतरे रँग सारे ओढ़नी के

रेत की बाँहों को थामे फिर रहा था
बज उठे कंगन तभी सोना नदी के

याद की चिड़िया नहाई धूल में फिर
नैन गीले हो गये बारादरी के

जब कभी आज़ाद होने को हुआ मन
ठकठकाते बूट आये संतरी के


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ग़ज़ल-

हर तरफ बारिश हुई है मेरा घर सूखा रहा
मैं फ़कत बरसात के किस्से यहाँ सुनता रहा

धूप ने फूँका है मेरा घर तुम्हारे हुक़्म से
भीगता मौसम तुम्हारी ओट में दुबका रहा

ओस के नन्हे समन्दर एक पत्ते पर लिए
मैं हज़ारों मील रेगिस्तान में चलता रहा

दिन दहाड़े आपने अगवा किया सूरज मगर
एक दीपक झौंपड़ी में रात भर जलता रहा

बाज़ुओं पर लिख चुका है वो पसीने की कथा
पत्थरों को तोड़ने वाला मगर भूखा रहा

रास्ता बेजान-सा कब से पड़ा है इस जगह
भीड़ का रेला यहीं से उम्र भर आता रहा

एक भी पँछी इधर से भूल कर गुज़रा नहीं
एक पिंजरा बस मेरी दालान में लटका रहा

मर गया 'कमलेश' तो लोगों ने हँसकर ये कहा
एक अच्छा आदमी था, मर गया अच्छा रहा


- कमलेश श्रीवास्तव

रचनाकार परिचय
कमलेश श्रीवास्तव

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ग़ज़ल-गाँव (1)