प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2016
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

आदमी इश्तिहार नहीं होता

वो महज शब्द नहीं
जिसकी एवज में हज़ारों भूजाएँ
कंधों से दो फुट ऊपर लहरा रही हैं,
वो इक विचार है
जिसे तुम अपने मॉर्क्सिस तहख़ाने के
किसी कोने में रख देना चाहते हो,
कॉमरेड!
आदमी के साथ-साथ
उसके सच का खुला होना बहुत जरूरी है,
आदमी इश्तिहार नहीं होता
विचार होता है,
आदमी को दीवार पर लगाकर
उसे पढ़ना मूर्खता है,
इतिहास गवाह है
गवाह है वो इस बात का कि-
विचार ने ही आदमी का प्रतिनिधित्व किया है
न किआदमी ने आदमी का।


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एक मौत की रिपोर्ट 

और वो आँखें
लोक भवन की दीवारों पर
रोज़, हर रोज़ प्रश्न लिख जाती हैं
कि इस भूख से मरे हुए आदमी को दफ़नाया जाए
या जलाया जाए
या मुल्क के दिग्गजों की मुस्कुराती तस्वीरों के
ठीक सामने रख दिया जाए,
कि उत्तर कहीं नहीं है
सिवाय हिरण की खाल-सी चमकदार सांत्वना के,
जो गाँव में आकाशवाणी के किसी
कुशल वक्ता-सी आती है
और भाषा में एक शुद्ध रिपोर्ट लेकर चली जाती है।


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मैं तैयार हूँ रणभूमि

अब मैं चाहता हूँ कि
पास से गुजरते हुए आदमी को आदमी कहूँ
उसकी भाषा को समझूँ,
पार्क में खेलते बच्चों को बच्चा कहूँ
छोटी-छोटी शरारतों को बचपन कहूँ,
बीवी के पास बैठूं, सारे गिले शिकवे दूर करूँ
इस प्रकार जातिवाचक संज्ञा में बदल जाऊँ

बारिश में भीगती कलियों को छू लूँ
और उनकी नमी ले लूँ,
बागों की तितलियों से अट्ठखेलियाँ करूँ
और उनसे रंग माँग लूँ,
पंछियों के पीछे भागूँ
और उनसे उड़ना सीख लूँ,
इस प्रकार भाववाचक संज्ञा में बदल जाऊँ

क्योंकि मैं
जूए में हारा कोई जुआरी नहीं हूँ
शतरंज पर पिटा हुआ कोई मोहरा नहीं हूँ

मुझमें
मज़दूर के हरेक हथोड़े-सी टंकार है
हल चलाते किरसान का अटल विश्वास है
कारीगर की छैनी-सी तेजधार है
युद्धरत योद्धा-सी धारदार तलवार है
मुझमें हर वो ज़ज्बात है
जिसमें आदमी है, आदमी होने का एहसास है


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इक गंवार लोकतंत्र के लिए

इक शांतिपूर्ण हत्याकाण्ड के बाद
शहर की अँधी गलियों में
ढूँढता हूँ इक शब्द
जिसे उस जगह पर रख
कर सकूँ मातम

कि अब इस व्यवस्था के कहीं किसी भी कोने में
नहीं है कोई शब्द
सिवाय 'लोकतंत्र' के
जो हर बार भोजन करते समय
जबड़े के ठीक नीचे कंकर-सा आ ही जाता है
और मेरे बाबा छोड़ देते हैं भोजन
बेबसी, लाचारी के कारण
क्योंकि कंधे पर लाशों को लिए
स्तुति करने की आज्ञा
न घुटने देेते हैं न ही जुबान

शहर को आती इक सड़क पर
गाँव के जाते कदमों के निशान
को देख, बरसों वहाँ बैठे रहते थे
प्राणायाम की मुद्रा में
कि कहीं वो जब वापस आएगा, अपने
साथियों के खाली झोलों के साथ
तो उसे, पास के किसी डेरे की
समाध की चादर
कछोरा और कुछ लोक गीत दे देंगे
पीपल के किसी पेड़ के नीचे
इक गंवार लोकतंत्र की पुन: स्थापति के लिए

कि जहाँ बहसें दस्तावेजों के किसी प्रथमाक्षर
या
तथ्यों के जिवाणुओं के किसी सार से शुरू नहीं होती
'करमे' किरसान के खुले ठहाके-सी खुलती वह
'मरुये' के फटे हुए पाँव से होती
गाँव के सबसे बुजुर्ग 'जगजीवन' की झुर्रियों और
पोपले मुँह पर पहुँचती है
जहाँ आदमी को ठीक सामने से समुचा देखा जा सकता है
इन्कारी नहीं होते उसके सामने के हाथ
हाथों की किसी अटूट कड़ी के लिए
कि न ही वे
दीवार को जवाबदेह हैं किसी हँसते हुए आदमी के
ठहाकों के लिए
क्योंकि वहाँ आदमी का मरना कोई हादसा नहीं
न ही शब्दों को रखा जाता है
आँख में पुतली की जगह
वहाँ फलों के पेड़ पर फल
फूलों के पेड़ पर फूल ही लगते हैं
वहाँ घास को घास नहीं दूब
जानवर को जानवर नहीं दरवेस कहते हैं
जानवर चिड़ियाघर में नहीं, इंसानों के दिल में रहते हैं
हवाएँ दूर से नहीं
पास से होकर बहती हैं
पानी में आदमी को उसका चेहरा साफ़ दिखता है


- सुशील कुमार शैली
 
रचनाकार परिचय
सुशील कुमार शैली

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