प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2016
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

1.

 

एक रोज़ फिर गुज़रूंगा यहीं से
न जाने क्यों लगा
कि पुकारा हो किसी ने।

वो अपने अर्थों में खिला हुआ था
ऐसे अर्थों के लिए शब्द नहीं होते।

वो हमें दिखाई देता है
पर हम दिखा नहीं सकते।
हमें उसका स्पर्श महसूस होता है
पर हम उसे छू नहीं सकते।

वहाँ कुछ भी नहीं था
एक एहसास था किसी के बीत जाने का

वहाँ एक पल था अव्यक्त
शोर से घिरा
ख़ामोशी के साथ ठहरा हुआ।

वहाँ एक प्रतीक्षा थी
किसी भी न किये गये वादे की
गहनतम... शांत।

कोई मुझे बताएगा
यहाँ से मेरे गुजरने की वजह?


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2.


हाँ, कुछ कहना था
जो कहा नहीं,
क्योंकि कहते हुए छूट जाता है
कहने और न कहने के बीच
वही कि जो कहना था।

अर्थ छिटकते रहते हैं शब्दों से निरंतर
और बुझ जाते हैं
गंतव्य तक पहुंचने से पूर्व ही।

मैं चाहता हूँ वे पहुँचें
अपनी पूरी उर्जा के साथ
आलोकित करते हुए उस छूटे हुए "कुछ" को।

जब तुम उपस्थित हो अपनी संपूर्णता में
और मैं कुछ कहूँ
क्या पता घटित हो जाए
अब तक अकथ
तमाम।


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3.


तुम से करते हुए प्रेम
नहीं सोचा था
पड़ जाऊँगा इतना अकेला।

बहुत नर्म नाज़ुक मिट्टी में
बहुत गहरे रखे थे
अपनी आँखों के अतृप्त बीज।

उम्र भर की नींदें
थक चुकी थीं
देखते हुए उमड़ते आँसुओं के
कुंठित सपने।

पैरों के तले
इकट्ठा हो गए थे
रास्तों के सारांश
थामे हुए मायावी आमंत्रण।

मैं बंद था एक ध्वस्त क़िले के अंदर
और तुम प्रेम करते हुए
नहीं छू पायीं
वो नर्म नाज़ुक मिट्टी।

नहीं जगा पायी
थकी हुई नींदों से।
नहीं बचा पायी
मायावी आमंत्रणों से।

और मैं उस ध्वस्त क़िले में
अकेला पड़ गया
प्रेम करते हुए।


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4.


आज दिल
बहुत उदास है।

एकांत के घने कोहरे में
बिखरे पड़े हैं
एकांत की चिड़िया के पंख।

एकांत कहाँ रह गया एकांत
एकांत को भी छल रही है उदासी।
नितांत निजी थे ये क्षण।
वर्जित में प्रवेश कर गयी यादें
और घिर आये बादल।

फिर बरसे भी बादल बिन घोरे
उमड़ते आँसुओं की तरह
भिगोया सब कुछ ठीक से
जंगल जंगल
हो गया
पानी पानी।

और मैं
और भी सूखापन लिए
घिरा रहा कोहरे के बीच अकेला
बग़ैर किसी एकांत के।

एकांत भी
टूटता है कभी कभी
आज दिल बहुत उदास है।


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5.


खिड़कियों से
देख रहा हूँ झमाझम छपाछप बारिश।
इन ही से देखता रहता हूँ
माँ की नरम गोद जैसी
कुनकुनी सुनहरी धूप।

घुल जाना चाहा है
कई बार
बूँदों के साथ
रास्तों में बहते
बरसाती पानी की तरह।

सो जाने की ख़्वाहिश रही है
ओढ़ कर
अक्सर
कुनकुनी धूप का आँचल।

पर कहाँ!
वो सब हैं
खिड़की के उस पार।

सपनों के प्रवेश द्वार होते हैं
जिनसे जाया जा सकता है
सिर्फ़ खिड़कियों तक,
और नहीं मिलते
वहाँ से वापसी के भी रास्ते।

अक्सर गुज़र जाती है
उम्र
खिड़कियों के इस तरफ़
और हम सोच लेते हैं-
लो, कट गयी ज़िंदगी।


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6.


मुझे आकाश
बहुत अच्छा लगता है,
क्योंकि उसे ऊँचाइयाँ छू कर
ज़मीन पर उतरना आता है।

मुझे बादल
बहुत अच्छे लगते हैं,
क्योंकि उसे बारिश में भीग कर
सूखना आता है।

मुझे नदियां
बहुत अच्छी लगती हैं
क्योंकि उसे डूब कर
पार करना आता है।

बहुत ग़ुस्सा आता है मुझे
जब आकाश कुहरे से अटा पड़ा हो
बादल बरसें नहीं
और नदियां सूख जायें।

पर मैं मुस्कुराने लगता हूँ
क्योंकि उसे
डाली से टूट कर भी
खिलना आता है।


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7.


उसने मेरे दो चेहरे देखे
एक तो वह
जो मेरा था ही नहीं,
दूसरा वह
जो उसने चाहा देखना।

उस की इस मनमानी ने
कर डाला मुझे बेचेहरा,
मैं कब से खड़ा हूँ
अपने रूबरू
ख़ुद को पहचानने की कोशिश में।


- कृष्ण सुकुमार
 
रचनाकार परिचय
कृष्ण सुकुमार

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