हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2016
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल पर बात

(आज हिंदुस्तानी परिवेश और ज़ुबान में ख़ूब ख़ूब ग़ज़लें कही (लिखी) जा रही हैं। अब तो हम यह भी कह सकते हैं कि इस विधा में हमारे पास ढेरों मुकम्मल ग़ज़लकार भी हैं। लेकिन फिर भी इस विधा में आलोचनात्मक कार्य और बड़े आलोचक का अभाव अखरता है। इस बात को ख़्याल में रखते हुए 'हस्ताक्षर' के माध्यम से एक हिमाकत करने जा रहा हूँ।
यह बहुत अच्छे से जानते हुए कि अभी ग़ज़ल या ग़ज़ल के सृजन पर बोलने की हैसियत कतई नहीं रखता, फिर भी यह सोचते हुए कि कोशिश तो करनी ही होगी।
कॉलम 'ग़ज़ल पर बात' में किसी एक समकालीन ग़ज़लकार की ग़ज़ल पर बात करने की कोशिश करूँगा। आप सबसे ख़ासकर ग़ज़ल से जुड़े मनीषियों से सहयोग की अपेक्षा रखता हूँ।)

 

आम शब्दों और सीधी-सादी कहन में कही गयी हरीश दरवेश साहब की ग़ज़ल पर बात

 
 
आज 'ग़ज़ल पर बात' के तहत बस्ती (उ.प्र.) के उम्दा शायर जनाब हरीश दरवेश साहब की एक ग़ज़ल पर नज़र डालते हैं। हरीश दरवेश जी दुष्यंत और अदम साहब की परम्परा के बहुत ही क़ाबिल उत्तराधिकारी हैं। जिस तरह दुष्यंत ने एक आम इंसान के साधारण-से लेकिन बहुत ज़रूरी अहसासात को ज़ुबान दी और अदम साहब ने उस आवाज़ को रौबदार बुलन्दी अता की, हरीश सर भी उसी आवाज़ को पैनापन देने के लिए ज़मीनी अशआर से अपनी ग़ज़लों को लगातार धार दे रहे हैं। ग़रीबी, भुखमरी, आर्थिक असमानता, असांप्रदायिकता जैसे मुद्दे तब जितने ज़रूरी थे, आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। हरीश साहब अपनी ग़ज़लों में आम शब्दों और सीधी-सादी कहन में इन्हीं सभी समस्याओं से झूझते दिखते हैं।
 
प्रस्तुत ग़ज़ल में फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन यानी 2122 2122 2122 212 में हरीश सर हमारे आस-पास की बहुत ज़रूरी बातों को बहुत ही ख़ूबसूरती से अशआर में ढालते हैं।
ग़ज़ल का मतला समाजवाद की हिमायत करता हुआ आज की कितनी कड़वी हक़ीक़त बयान करता है यह किस व्यापारिक घराने को सरकार ने कितनी रियायत दी, ये बताए बिना ही सारी स्थिति आपके समक्ष रख देगा।
 
इस सदी ने कौन-सा सूरज निकाला है यहाँ
कोठियों मे ही फ़क़त जिससे उजाला है यहाँ
 
यही मसला आज से क़रीब 40 साल पहले भी इतना ही सजीव था और आज विकराल है।
ग़ज़ल का पहला शेर सियासत के संदर्भ में अगर देखें तो बहुत ही सही और सटीक है। अपने झूठे वादों से आम जनता को रेगिस्तान में पानी का आभास करा, जिस तरह पाँच साल ऐश किए जाते हैं और जनता को उतने ही अरसे तक मृगतृष्णा के पीछे छकाया जाता है, ये सबकुछ इस शेर के दो मिसरों में आपके सामने है।
बाँट कर उम्मीद जो आकाश मे खो जायेगा
सिरफिरों ने आज वो सिक्का उछाला है यहाँ
 
अगला शेर एक बहुआयामी शेर हुआ है, इसे आप कई मायनों में समझ सकते हैं। अगर हम नदी को एक युवती माने और समंदर को उसकी चाहत, तो ऐसी नदियों के डूबने के हवाले दैनिक अख़बारों में एक नहीं, अनेक मिलेंगे।
'हवाला' शब्द को काफ़िये के बतौर कितनी ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है, यह उल्लेखनीय बात है।
देखती रहती थी जो हरदम समुन्दर का ही ख़्वाब
उस नदी के डूब जाने का हवाला है यहाँ
 
चाटुकारिता के दौर में जिन लोगों को धृष्टतम कार्य के एवज डूब मरना चाहिए था, लेकिन वे ज़िंदा है, अब स्थिति देखिए कि हैरत उन लोगों के ज़िंदा रहने पर नहीं बल्कि हैरत यह है कि वे ही लोग अपनी गर्दनें ताने अपने महान होने के दावे करते नज़र आते हैं।
शर्म से झुकनी थी जो, वो तन गई तो क्या हुआ
मसअला तो ये है उस गर्दन पे माला है यहाँ
 
अब अँधेरे कर रहे हैं रौशनी का कीर्तन
दाल मे अब कुछ न कुछ निश्चित ही काला है यहाँ
बहुत ही कड़वा लेकिन सच्चा शेर हुआ है। 'अँधेरों द्वारा रौशनी का कीर्तन किया जाना' कितना अच्छा बिम्ब है!
इस मिसरे में 'कीर्तन' 22 को बहुत ख़ूबसूरती दे देसी ज़ुबान में ढाल ग़ज़लकार ने 'कीरतन' 212 कर दिया है, और इस तरह की छेड़छाड़ से शब्द की संरचना पे और मिसरे की रवानी पे कोई बुरा असर नहीं पड़ता, बल्कि 'देसी लहज़े' से और निखार आ रहा है।
सानी मिसरे (दूसरी पंक्ति) में 'दाल में कुछ काला होना' मुहावरे का बेहद ही उम्दा प्रयोग किया गया है।
 
एक और बात, दुष्यंत और अदम साहब की ग़ज़लों को एक वर्ग ने यह कहकर 'कमतर' साबित करने की कोशिश की कि उनकी रचनाओं में शिल्प कमज़ोर है, और ये बिना आधार का दावा भी नहीं था, लेकिन उनकी परंपरा के आज के ग़ज़लकार शिल्प पर भी कमाल की पकड़ रखते हैं, इस बात की भी तस्दीक करती है यह ग़ज़ल।
 
 
ग़ज़ल-
 
इस सदी ने कौन-सा सूरज निकाला है यहाँ
कोठियों मे ही फ़क़त जिससे उजाला है यहाँ
 
बाँट कर उम्मीद जो आकाश मे खो जायेगा
सिरफिरों ने आज वो सिक्का उछाला है यहाँ
 
देखती रहती थी जो हरदम समुन्दर का ही ख़्वाब
उस नदी के डूब जाने का हवाला है यहाँ
 
शर्म से झुकनी थी जो, वो तन गई तो क्या हुआ
मसअला तो ये है उस गर्दन पे माला है यहाँ
 
अब अँधेरे कर रहे हैं रौशनी का कीर्तन
दाल मे अब कुछ न कुछ निश्चित ही काला है यहाँ

- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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