प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2015
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

डॉ. महेंद्र भटनागर की काव्य-गंगा: दिनेश कुमार माली (भाग-1)
स्वातंत्र्योत्तर समकालीन हिन्दी कविता को नई ऊर्जा, उमंग व ऊष्मा देने डॉ. महेंद्र भटनागर की कविता का उर्वर प्रदेश लगभग छह दशकों से फैला हुआ है। वह उस पीढ़ी के कवि हैं, जिस समय हिन्दी कविताओं में तरह-तरह के प्रयोग होने लगे थे। कवि निराला, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, नागार्जुन, केदारनाथ सिंह उनके समकालीन थे। यह कहा जा सकता है कि उन्होंने हिन्दी कविताओं को नई दिशा प्रदान की है। उनके अंग्रेजी भाषा में ग्यारह कविता-संग्रह तथा हिन्दी-अंग्रेजी विभाग में पाँच कविता-संग्रह ‘जीवन: जो सो है’, ‘चाँद,मेरे प्यार!’, ‘मानव: गरिमा की कविताएं’, उनकी दीर्घ साहित्यिक यात्रा का परिदर्शन करवाती हैं, जिसमें जीवन, मानवता, प्रेम, निस्संगता, देश-प्रेम, आजादी तथा वैश्विक अनुभवों को कथ्य की परिधि में रखकर वह अपनी कविता रचते हैं। बचपन में मैंने कई श्रद्धालुओं को स्वामी प्रभुपाद रचित ‘यथार्थ गीता’ (गीता:एज इट इज) पढ़ते हुए देखा। इस ग्रंथ की यह खासियत थी कि इसमें गीता के श्लोकों के एक-एक शब्द का अर्थ हिन्दी और अंग्रेजी में दिया हुआ था ताकि पाठक क्लिष्ट संस्कृत शब्दों के संधि-विच्छेद वाले सरलार्थ आसानी से हृदयंगम कर सके। ठीक इसी तरह, साहित्यिक पुस्तकों में ये तीनों कविता-संग्रह मेरे लिए यथार्थ गीता की तरह अनुपम व अनोखे थे, जिनमें एक तरफ उनकी हिन्दी कविताएं तो दूसरी तरफ उस कविता का अंग्रेजी अनुवाद दिया हुआ था। ये संग्रह न केवल राष्ट्रीय वरन अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सराहे गए।ये संग्रह अंग्रेजी-हिन्दी और हिन्दी-अंग्रेजी के अनन्योश्रित संबंध व साहचर्य के उल्लेखनीय उदाहरण हैं। हिन्दी के कठिन शब्दों को अंग्रेजी भाषा से तथा अंग्रेजी के कठिन शब्दों को हिन्दी के प्रचलित शब्दों के माध्यम से आत्मसात कर उनकी कविताओं का दोनों हिन्दी व अँग्रेजी पाठक आनंद ले सकते हैं। कवि ऐसे भी शब्द प्रेमी होता है, उनके पास अथाह शब्द भंडार होता है। पाठकों का शब्द-भंडार और समृद्ध होता जाता है, जब इसमें विदेशी भाषा के शब्दों का विपुल भंडार जुड़ता जाता है।
 
'जीवन: जैसा जो है (लाइफ: एज इट इज)' कविता-संग्रह में कवि ने अपने जीवन के सारे पहलुओं व अनुभूतियों पर अपनी संवेदनाएँ अभिव्यक्त की हैं।उदाहरण के तौर पर समय, अपेक्षा, पूर्वाभास, प्रार्थना, प्रबोध, भाग्य, इच्छा, चाह, एकाकीपन, मर्माहत, संबंध, विस्मय, पटाक्षेप, घटना-चक्र, मजबूरी, कामना, गलत-फहमी, दृष्टिकोण, व्यक्तित्व, वेदना, विक्षोभ, आस्था, विश्वास, विपर्यय, ऊहापोह, ईर्ष्या, संकल्प, विकल्प, पुनर्जन्म, सहारा, स्वप्न, गंतव्य जैसे जीवन के अनेकानेक यथार्थ स्वरूपों को कवि ने कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है। उनकी इन कविताओं में जीवन-धर्मी और जन-धर्मी लय पूरी ऊर्जा के साथ संचारित हो रही है। डॉ. महेंद्र एक स्थितप्रज्ञ की भांति जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, हानि-लाभ, सर्दी-गर्मी सभी परिस्थितियों में तटस्थ रहकर अपनी अर्जित तथा प्रारब्ध से प्राप्त अनुभवों को विद्रूप व विरूप समय में ह्रास होते सामाजिक मूल्यों व सांस्कृतिक पतन से जनसाधारण को परिचित करवाकर अपनी जीवन-धर्मी चेतना का उत्तर-दायित्व निभा रहे हैं। इस प्रकार वह प्रगतिशील कवियों की प्रथम पंक्ति के कवि हैं, जिनकी रचना-धर्मिता ने प्रगतिशील कविता के फ़लक को अत्यंत ही व्यापक बनाया है। उनकी अनुभूति भी समकालीन कवि केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन या नागार्जुन जैसी रही है, मगर कविकर्म पूरी तरह से मौलिक। ‘यथार्थ’ के बारे में कवि का मानना है कि हकीकत की दुनिया में संघर्ष ही संघर्ष है। जीवन की मंजिल पाने के रास्ते इतने सहज नहीं है। गुलाब की सेज नहीं हैं उन रास्तों पर। जीवन स्थितियों और मनःस्थितियों को पहचानने की योग्यता कवि महेंद्र को तुलसी और निराला की परंपरा से जोड़ती है। दोनों के परस्पर संबंधों से यथार्थ और अनुभव का निर्माण होता है। यथार्थ हमारी अंतरंगता का दबाव लिए रहता है और अनुभव जीवन-स्थितियों के प्रभाव से ही संगठित होता है। यथा-
 
हर चरण पर
मंज़िलें होती कहाँ हैं?
जिंदगी में कंकड़ों की ढेर है
मोती कहाँ है?
 
मगर कवि जिंदगी से निराश नहीं होता है, वह जीवन के हर लम्हे को पूरी तरह से जीना चाहता है क्योंकि वह नहीं जानता कि कौन-सा लम्हा जीवन छीन ले अथवा कौन-सा लम्हा आपके जीवन को ऐतिहासिक बना दे। इसलिए उनकी कविता मुखरित होती है-
हर लम्हे को भरपूर जियो
जब तक
कर दे न तुम्हारी सत्ता को
चूर-चूर वह
जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं, जब आदमी अपनी स्मृतियों को भूलने लगता है। श्मशान, रेलवे-स्टेशन और अस्पताल जीवन के क्षणभंगुर गतिशील परिवर्तनशील पल को दर्शाते हुए मन में वैराग्य-बोध को जगाकर अपने अस्तित्व को भूलने पर विवश कर देता है, मगर कुछ क्षण के लिए। ध्यान देने योग्य बात है, जैसे ही कोई आदमी श्मशान से लाश जलाकर घर लौटता है तो वहाँ की अनुभूतियों से कुछ समय के लिए आया वैराग्य-बोध फिर से जगत-जंजाल में बदल जाता है। ऐसी ही उनकी एक अनुभूति-
औचक फिर
स्वतः मुड़ लौट आता हूँ
उपस्थित काल में!
जीवन जगत जंजाल में!
 
उनकी कविताओं की यह विशेषता है कि वह दोहरी जिंदगी नहीं जीते हैं। जैसा उन्होंने अनुभव किया वैसा ही लिखा। उनकी कविताओं को पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो आप अपने माता-पिता, गुरु अथवा आत्मीय संबंधियों के साथ बातचीत करते हुए एक अविस्मरणीय दीर्घ महायात्रा के तुंग पर किसी कवि के पारदर्शी व्यक्तित्व में सहजतापूर्वक झांक रहे हो। पढ़ते-पढ़ते आपको लगेगा कि उनकी कविताओं का जन्म अपनी अनुभूतियों व गहन अनुभवों के आधार पर हुआ। इस वजह से अभिव्यक्ति की शैली उल्लेखनीय बन पड़ी है। अपनी अग्रज कविता पीढ़ी और समकालीनों की तरह अपनी कविताओं में अत्यंत साधारण लोग, उनके जीवन-चरित्र, जिजीविषा, मानव-गरिमा, प्रेम को उद्देश्य बनाकर गहन संवेदना और सच्ची सहानुभूति के साथ प्रस्तुत किया है। कवि की भाषा सहज, सार्थक और आत्मीय काव्य भाषा है। हिन्दी गद्य की बोलचाल के उपयोग के अलावा वे बीच-बीच में तुक और छंद के प्रयोग से काव्य-भाषा का आस्वाद बदलते रहते हैं।
 
1. आ जाती जीवन प्यार लिए जब संध्या की बेला
    हर चौराहे पर लग जाता अभिसारों का मेला
    एक क्षण प्रेम देह का
    एक क्षण सुख देह का             (याचना)
 
2.  रिक्त उन्मन उर-सरोवर भर दिया
    भावना संवेदना को स्वर दिया    (कौन तुम)
 
3.  रंग कोमल भावनाओं का भरा
     है लहराती देखकर धानी धरा   (गीत में तुमने सजाया)
 
4.  रिझा हुआ मोर-सा मन मगन
     बाहें विकल, काश भर लूँ गगन
     कैसे लगी विरह की अगन    (रूपासक्ति)
 
कवि की चिर-वंचित, जीवंत, अतिचार, पूर्वाभास, अवधूत, सार-तत्व, निष्कर्ष, तुलना आदि कविताओं में जीवन के एकाकीपन, दुख-दर्द, ताश के पतों की तरह टूटते निपट स्वार्थ के संबंध, अस्तित्व-हीनता, स्थितप्रज्ञ होने की आवश्यकता, जीवन की असारता, निर्लिप्तता और अनिश्चितता के विषयवस्तु का उल्लेख आता है। कहीं-कहीं कवि महेंद्र की कविताओं में मोह-भंग और स्वप्न-भंग होता हुआ प्रतीत होता है। शायद कवि जिन अपेक्षाओं से आजादी लाने के लिए प्रयत्नरत थे, वे पूरी नहीं हुई होगी। एक तरफ जनता के टूटे सपनों से उपजी निराशा और कुंठा, दूसरी तरफ इस निराशा और कुंठा को संघर्ष विमुख करके सनातन सत्य और मानव-मूल्य बनाने के उनके प्रयास यह स्पष्ट करते हैं कि स्वाधीनता के साथ समाज के अंतर्विरोधी स्वर तीखे होते गए, तब कवि ने अपनी कविता को भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों में विभाजित कर सामाजिक सहानुभूति की कसौटी पर अपनी भावानुभूतियों को सहज-बोध से लिखना शुरू किया। जहां प्रगतिशील कवि जनता के टूटे सपनों और संघर्ष-भावना को वाणी दे रहे थे, जहां प्रयोगवादी कवि सामाजिक चेतना को झूठ और पाखंड बता रहे थे, वहाँ जन-संघर्ष से दूर मानव-धर्मी कवि महेंद्र अपने आत्म-चेतना की अलौकिक धरातल पर जीवन की सार्थकता, मानव-गरिमा और प्रेम-काव्य का प्रतिपादन कर रहे थे। कवि महेंद्र जानते है कि विचार जितना स्पष्ट होता है, अनुभव जितना संबंधों से पुष्ट होता है, उसकी अभिव्यक्ति उतनी ही सटीक और संप्रेषणीय होती है। भक्त कवियों से- कबीर, जायसी, मीरा, तुलसी से अच्छी कविता लिखने का दावा बड़े से बड़ा समकालीन कवि नहीं कर सकता। भक्त-कवियों की रचना साधारण लोग भी समझते हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद्र यह बात जान गए थे कि जनसाधारण में पहुँच जाने वाली बात अमर हो जाती है। इसलिए कवि महेंद्र भी अपने अनुभव को साधारणीकृत करके कविता में व्यक्त करते समय अपनी भाषा और अभिव्यंजना पर विशेष ध्यान देते हैं। एंग्लेस ने एक आइरिश लोक कवि का यह कथन उद्धृत किया था कि भाषा और आजादी में चुनना हो तो वह भाषा को चुनेगा क्योंकि भाषा रही तो वह आजादी ले लेगा, लेकिन अगर भाषा मिट गई या छीन ली गई तो आजादी नहीं बच सकेगी। जैसे कुछ पंक्तियाँ-
 
1. हर ज्वालामुखी को
    एक दिन सुप्त होना है!
    सदा को
    लुप्त होना है! (पूर्वाभास)
2. वस्तुत:
    जिसने जी लिया संन्यास
    मरना और जीना
    एक है उसके लिए
    विष हो या अमृत
    पीना
    एक है उसके लिए! (अवधूत)
3. लेकिन
    निश्चित रहो-
    कहीं न फैले दुर्गंध
    इसलिए तुरंत लोग तुम्हें
    गड्ढे में गाड़/दफन
     या
     कर संपन्न दहन
     विधिवत कर देंगे खाक/भस्म
     जरूर!      (सार-तत्त्व)
4. सत्य-
    कर्ता और निर्णायक तुम्हीं हो
    पर नियामक तुम नहीं।
    निर्लिप्त हो
    परिणाम या फल से।   (निष्कर्ष)
5. कब क्या धारित हो जाए
    कब क्या बन-संवर जाए
    कब एक झटके में सब बिगड़ जाए!   (तुलना)
 
उपरोक्त कविताओं की पंक्तियाँ पढ़ने पर ऐसा लगता है, मानो कवि यथार्थ जीवन जीने के लिए गीता के श्रीकृष्ण की तरह उपदेश दे रहे हों। रह-रहकर जीवन की असारता के बारे में याद दिला रहे हो, निर्लिप्त रहकर कर्म करने का उपदेश दे रहे हो। प्रसिद्ध समकालीन ओडिया कवि रमाकांत रथ की तरह जीवन तथा मृत्यु के प्रति चेतना के स्वर कवि महेंद्र में मुखरित हुए है। जहां रमाकांत रथ अपनी कविता ‘जहाज आएगा’ में जीवन के अस्थायित्व की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं-
 
आज वह जहाज आएगा
जिससे एक दिन इस जगह पर
उतरा था मैं
आज उस जगह को छोड़कर उसमें
चला जाऊंगा मैं
तुम जल होते हुए भी
अग्नि की तरह मेरे चारों तरफ मौजूद हो
तुम हलाहल हो
तुम रसातल हो
तुम एक गोदाम हो
अस्थायित्व के!
 
कवि महेंद्र की तरह रमाकांत रथ का भी वही दृष्टिकोण ज्यादा गोचर होता है, जो हर समय मृत्यु को अपने नजदीक देखता है। कवि महेंद्र की ‘अनुभूति’ कविता में मनुष्य जीवन की सारी मूर्खताओं, गलतियों तथा समाज द्वारा थोपे गए रीति-रिवाजों के तले दबकर जीवन जीने का ढंग भूलकर अपनों पर अंधविश्वास और परायों पर विश्वास कर छद्म मुखौटे पहने धूर्तों से लूटे जाने का जिक्र है। मगर जब आँखें खुलती हैं तो सिवाय पछताने के और कुछ नहीं बचा रह जाता है। इसी तरह ‘यथार्थता’ कविता में कवि ने आलंकारिक भाषा का प्रयोग करते हुए जीवन जीने का अर्थ दो नावों की सवारी, पैरों के नीचे विष-दग्ध दुधारी तलवार, गले की फांस, बदहवास, भगदड़, मारा-मारी, लाचारी और अमावस्या की अंधेरी रात बताया है। क्या यह बात सही नहीं है? दुनिया में ऐसा कौन होगा, जिसने जीवन में कभी कष्ट नहीं उठाया होगा और जीवन में हमेशा पुष्पों की सेज शैया पाया होगा? शायद कोई नहीं होगा। इसी तत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कवि महेंद्र ने अपनी कविता ‘खिलाड़ी’ में बिना अगल-बगल देखे जीवन की निरंतर दौड़ में थकते-गिरते-उठते-बैठते बिना किसी प्रतिस्पर्धा के अविरल दौड़ते जाने तथा जीवन के ऊष्ण समुद्र में हाथ झटकते-पटकते बिना हार माने मछली की तरह अविरत तैरते जाने को गतिशील जीवन कहा है, क्योंकि वह जानते हैं कि उनकी अमर आत्मा के सामने हृदयघात, पक्षाघात यहां तक की सारा मृत्युलोक भी दूर भागता है। इसलिए वह मृत्यु पर विजय पाने के लिए जीवन पर्यंत श्रमजीवी रहने का संदेश देते है अर्थात कवि की दृष्टि नए ढंग की है। यह उसकी कविता को ऊर्जा और स्फूर्ति देता है सूक्ष्म, सधे और प्रच्छन्न रूप से। कहते हैं, किसी अच्छे कवि में अपने समय के स्वरों के अलावा आने वाले कल की छाप होती है। आज में रखा हुआ कविता का आइना अपने दोनों और के कल को देखता है। वैसे भी वर्तमान को बेहतर और भविष्य को सुंदर बनाने की कोशिश ही समकालीन साहित्य की धड़कनें और यही उसे सर्वकालिक भी बनाती है। कवि का सतत सृजन कर्म, उसकी इसी अप्रतिहत विकास-यात्रा के प्रति आश्वस्त करती है। ‘राग संवेदन’ कविता में रिश्तों की दहकती आग में संवेदना अनुभूत आत्मीयता से रिक्त राग के कुछ क्षणों को केवल यादगार बनाया है। बाकी तो कुछ भी याद नहीं रहता है। ‘ममत्व’ के बारे में आधुनिक समाज की यथार्थता का वर्णन किया है- "न दुर्लभ है/न है अनमोल/मिलते ही नहीं, इहलोक,परलोक में/आंसू....अनूठे प्यार के/आत्मा के/अपार-अगाध-अति विस्तार के!" जिजीविषु कविता में जीवन में अत्यंत दुख-दर्द, दाह, झुलस, कड़वाहट होने के बाद भी संसारी मायाजाल में प्राणी फंसकर और जीने की उम्मीद करता है। "मैं आज आत्महंता/द्वार वातायन करो मत बंद/शायद समदुखी कोई भटकती जिंदगी आ/ कक्ष को रंग दे/ सुना स्वर्गिक सुधाकर गीत।" इस तरह की अन्य कविताओं में ‘वरदान’, ‘स्मृति’, ‘बहाना’, ‘दूरवर्ती से’, ‘बोध’, ‘निष्कर्ष’ आदि प्रेम, सांत्वना, मनुहार, रूठना, अहसास, कामना, संगीत आदि संवेदनाओं पर आधारित है। ‘प्रतीक’ कविता में प्रेमिका जब पुष्पगुच्छ प्रेमी के कमरे में छोड़कर चली जाने पर वह भाव-विभोर हो जाता है और उसके जीवन का अर्थ पूरी तरह बदल जाता है।
 
जीवन का अर्थ
अरे
सहसा बदल गया
गहरे-गहरे गिरता
जैसे कोई संभाल गया
भर राग उमंगें
नयी-नयी
भर तीव्र तरंगें
नयी-नयी!
 
‘तुम’ कविता में जीवन साथी का जीवन की पगडंडी पर साथ निभाने, ‘अकारथ’ कविता में प्रेमिका का प्रेम पाने का व्यर्थ प्रयासों, ‘सहसा व एक रात’ में उसकी स्मृतियों, ‘संसर्ग’ में मन को आकाश में उड़ने की ख़्वाहिश,‘संस्पर्श’ कविता में अंगुलियों के स्पर्श की मधुर संवेदनाओं को उकेरा है। ‘सहपन्था’ कविता में बीहड़ जिंदगी की लंबी राह जीवन संगिनी के साथ-साथ शांतिपूर्वक पार कर आने पर मन भर आया, यह कहते हुए-
तर-बतर
करते रहे तुम सफर
थामे हाथ/ बाँधें हाथ
साथ-साथ
पार कर आए अजनबी
जिंदगी की राह/ लंबी राह!
‘निकष’,‘समवेत’,‘सुलक्षण’,‘पुनरपि’,‘तिघीरा’,‘प्रधूपिता से निवेदन’,‘अंगीकृत’,कविताओं में कवि ने हृदय की विभिन्न संवदनाओं जैसे प्रेम पाने की चाह, जीवन की तृष्णा, रोमांच, उल्लास, राग, हर्ष, उत्सुकता, आसक्ति, सपने, उपहास, स्नेह, रुदन, शृंगार, आलिंगन, अभिशाप सभी को काव्यमय भाषा में संवारा है। 'कौन हो तुम' कविता में विरह-वेदना को अभिव्यक्त करते हुए कवि ने अचरज प्रकट किया है कि अंधेरी सुनसान रात में मेरे विषधर विकत अंतर में मधुर सद-सांत्वना का संगीत किसने घोला है। कवि चाँद से अत्यधिक प्रभावित है। उन्होंने ‘मेरे चाँद’, ‘चाँद और पत्थर’, ‘चाँद मेरे प्यार’, आदि कविताएं लिखी। चाँद को नींव बनाकर अपने हृदय की बात ‘मेरा चाँद मुझसे दूर है’ प्रस्तुत की है। "ये आँखें क्षितिज/पर आस से, विश्वास से/ क्योंकि यह सत्य है/ उसमें चाह मिलन जरूर है" जबकि दूसरी कविता ‘चाँद और पत्थर’ में चाँद को पत्थर दिल बताया है कि न तो तुममें सत्य आकर्षण है, न ही सभ्य मधुवर्षण है। तुमसे प्यार करना व्यर्थ है और तुम्हारी मनुहार करना भी व्यर्थ है। फिर उसी शीर्षक से दूसरी कविता में उसके विपरीत अहसास प्रकट किया कि तुम पत्थर हृदय नहीं हो तुम तो किसी का प्यार-बंधन या जीने की आशा हो, मगर दुख इस बात का है कि तुम इस धरती पर नहीं हो। जबकि कविता संग्रह ‘चाँद मेरे प्यार’ की शीर्षक कविता में चाँद को देखते ही कवि को किसी मासूम मुखड़े की याद ताजा हो जाती है। कवि कहता है-
 
क्या कह रहे हो?
ज़ोर से बोलो-
‘कि पहचाना नहीं!
हुश! प्यार के नखरे न ये अच्छे तुम्हारे
अब पकड़ना ही पड़ेगा
पहुँच किरणों के सहारे!
देखता हूँ और कितनी दूर भागोगे
मुझे मालूम है कि
तुम बिना इसके न मानोगे!
 
कवि की कुछ कविताएं मानव मन की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को स्पर्श करती हैं, जिसमें ‘नींद’, ‘आकुल अंतर’, ‘विवशता’, ‘मृगतृष्णा’, ‘आकर्षण’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘दुराव, ‘आत्म-स्वीकृति’ प्रमुख हैं। कवि के रचना-कर्म में अपने-परायों से धोखा खाने, जीवन के दुखों को झेलने और निसंगता की चेतना को अपनी कविताओं का आधार बनाया हैं। अनेक कविताएं जीवन के एकाकीपन की वेदना को दर्शाती हैं, जैसे-
 
ऐसा कौन है
परिचित तुम्हारा?
अजनबी है सब
अपरिचित हैं
इतने बड़े फैले नगर में!
कोई कहीं
आता नहीं अपना
नजर में।
 
जैसे-जैसे आदमी नई-नई ऊंचाइयों के कीर्तिमान स्थापित करता है, वैसे-वैसे वह भीतर ही भीतर खोखला होता जाता है, दुनिया उसे अपरिचित लगने लगती है, सब अपने सुख-दुख में लिप्त है, किसके साथ बातचीत की जाए, ऐसा कोई नजर नहीं आता। उनकी ‘अकेला’ कविता इस बात को प्रस्तुत करती है। जैसे ही शाम हो जाती है, कोई मिलने नहीं आएगा। यह सार ‘पटाक्षेप’ कविता का है। नीरस, नीरव जीवन से ‘मर्माहत’ कवि अपने अंदर-अंदर ‘खंडित मन’ से दहकते अंगारों की शैया पर छिटकार करते और कराहते हुए मर-मर कर जीने के लिए विवश है। उसे लगता है कि जब अपने ही लोग उसके साथ कुटिल विश्वासघाती खेल खेलना शुरू कर देते हैं, जिन्हें वह न तो मार सकता है और न ही आत्महत्या कर सकता है। केवल अकेले-अकेले मानसिक संताप की नरकाग्नि में जलता है वह। साथ ही साथ, टूटे विश्वास के कारण निरर्थक जीवन की गहनतम वेदना अपने भीतर समेटे चुपचाप अपने अस्तित्व का विसर्जन करता है। कवि भावुक बहुत है। जीवन की वेदनाओं से उन्हें अत्यंत प्यार है। वेदना-धर्मी तरंगों को गुदगुदाने के लिए आमंत्रित कर अपनी आहत चेतना को जागृत करता है वह। उसे तो जीवन के सारे समुद्र में सिर्फ शोकाकुल तरंगें, रिसते घाव और पल-पल पीड़ा के अनुभव में अपने अनेकों जन्मों के गंदे प्रतिशोध को महसूस करता है। अपनी कविता ‘अंतिम अनुरोध’ में उनके ऐसे स्वर प्रस्फुटित होते हैं-
 
यों तो
अंतिम क्षण तक
तपना ही तपना है
यात्रा-पथ पर
छाया-तिमिर घना है!
एकाकी-
जीवन अभिशप्त बना
हँसना रोना सख्त मना!
 
 
 
शेष अगले भाग में...........

- दिनेश कुमार माली