प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2016
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जग्गी अंकल का डॉगी

एक थी निक्की। बड़ी ही प्यारी, बड़ी ही खुशदिल। बात-बात पर खुदर-खुदर हँसती। इसीलिए तो उसकी दोस्ती हर किसी से हो जाती थी। बच्चों से, बड़ों से, पोपू पिल्ले से, पीलू से, टिनटिन चिड़िया से। राम जाने और भी न जाने किस-किस से! एक बार की बात, इतवार का दिन था। निक्की अपने छोटे से पिल्ले पोपू से खेल रही थी। साथ ही उसका प्यारा दोस्त पीलू पूँछ उठाए इधर-उधर घूम रहा था। टिनटिन चिड़िया कभी निक्की के कंधे पर बैठ जाती तो कभी सिर पर। एक बार तो टिनटिन ने उसके बालों में बँधे फीते को अपनी चोंच में दबाकर इस तरह खींचा कि निक्की का फीता झट से खुल गया और उसके बाल पूरे चेहरे पर बिखर गए। टिनटिन चिड़िया की इस शैतानी पर निक्की को बड़े जोरों की हँसी आई। फिर पोपू और पीलू भी ऐसे-ऐसे कमाल के खेल दिख रहे थे कि निक्की बार-बार खिलखिला पड़ती।

 

निक्की अपने इसी खेल में डूबी थी कि जाने कब पड़ोस के जग्गी अंकल आ गए। निक्की को तब पता चला, जब पोपू जोर-जोर से भौंकने लगा और पीलू भी। टिनटिन चिड़िया हैरानी से कभी पोपू, कभी पीलू तो कभी निक्की को देख रही थी। निक्की ने बुरी तरह मुँह बनाकर पोपू की ओर देखा और बोली, “पोपू, क्या हुआ...?” तब पोपू अचकचाकर चुप हो गया, जैसे उसने कोई बेवकूफी का काम किया हो। और पोपू के चुप होते ही पीलू भी टाँगों में पूँछ दबाए एक ओर खड़ा हो गया। इतने में निक्की को जग्गी अंकल और उनका कुत्ता रॉकी नजर आ गया। अब उसे माजरा समझ में आ गया था कि पोपू और पीलू भला किसलिए भौंक रहे थे? निक्की बोली, “सॉरी अंकल, पोपू और पीलू को पता नहीं था कि आप मेरे प्यारे जग्गी अंकल हैं। नहीं तो वे कभी आपको तंग न करते।”तब तक निक्की के मम्मी-पापा भी बाहर निकलकर आ गए थे। बोले, “आइए जग्गी साहब, आइए! बड़े दिनों दिन बाद चक्कर लगा आपका?”

 

जग्गी अंकल हँसकर बोले, “असल में तो आनंद साहब, सच्ची बात तो यह है कि मैं आपसे नहीं, निक्की बिटिया से मिलने आया हूँ आज। आहा-हा, क्या प्यारी बच्ची है आपकी। इस बार अपनी कॉलोनी के ड्रामा फेस्टिवल में इसने क्या कमाल का मोनो प्ले किया कि हँसते-हँसते पेट में बल पड़ गए! एक कुत्ते की आत्मकहानी भी कोई नाटक की शक्ल में पेश कर सकता है, वह भी मोनोप्ले में, मैं तो सोच भी नहीं सकता। इतनी मजेदार थी इसकी एक्टिंग...ओहो-हो!” कहते-कहते जग्गी अंकल फिर हँसने लगे। निक्की के मम्मी और पापा मुसकराए। फिर निक्की के पापा बोले, “आइए जग्गी साहब, भीतर आइए। बैठते हैं कुछ देर, थोड़ी गपशप हो जाए।” उसके बाद जग्गी अंकल देर तक निक्की के मम्मी-पापा के पास बैठ, दुनिया-जहान की और बीच-बीच में मोहल्ले की ऊँच-नीच की तमाम बातें करते रहे। उधर उनका बड़े-बड़े बालों वाला भूरा कुत्ता रॉकी निक्की के पास बैठ, उसके खेल में शरीक हो गया था। निक्की ने पोपू, पीलू और टिनटिन चिड़िया से उसकी खूब अच्छी दोस्ती करवा दी थी।

 

निक्की अपनी नीली गेंद भी उठा लाई थी। जब वह गेंद दूर फेंकती तो पोपू, पीलू और जग्गी अंकल के भूरे कुत्ते रॉकी में बड़ी जबरदस्त होड़ शुरू हो जाती। तीनों एक साथ भागते कि भला कौन निक्की की गेंद को मुँह में पकड़कर पहले वापस आता है और निक्की को सौंपता है। इसमें कभी पोपू बाजी मार ले जाता, कभी पीलू, तो कभी जग्गी अंकल का रॉकी। लेकिन वे खेल का पूरा मजा ले रहे थे। लड़ बिलकुल नहीं रहे थे।बीच-बीच में निक्की कोई हुक्म देती तो उसको मानने की होड़ लग जाती कि कौन सबसे पहले वह काम करे। निक्की ने जग्गी अंकल के डॉगी के सिर पर हाथ फेरकर खूब प्यार किया और कहा, “रॉकी-रॉकी, अब तुम हमारे घर जरूर आया करोगे, समझ गए न? नहीं आओगे तो मैं रूठ जाऊँगी।” इस पर रॉकी ने बड़े प्यार से गरदन हिलाई, जैसे निक्की की सारी बात समझ गया हो।

 

कुछ देर बाद जग्गी अंकल जाने लगे तो उन्होंने रॉकी को पुचकारकर कहा, “चलो रॉकी, देर हो गई। अब घर चलते हैं।” पर रॉकी को तो खेल में इतना आनंद आ रहा था कि वह उठना ही नहीं चाहता था। रॉकी को चुपचाप बैठे देख, जग्गी अंकल ने फिर आदेश देते हुए कहा, “सुना नहीं, रॉकी...!” इस पर रॉकी ने ऐसी बेबसी से जग्गी अंकल की ओर देखा, जैसे उसका उठने का बिलकुल मन न हो, फिर भी उसे उठाया जा रहा था। वह धीरे से उठा और जग्गी अंकल के पीछे-पीछे चल दिया। पर वह इतनी अनिच्छा से चल रहा था कि उसका एक कदम आगे तो दो कदम पीछे लौट रहे थे।

 

रॉकी की यह हालत जग्गी अंकल से छिपी न रही। उन्होंने हँसते हुए कहा, “अच्छा रॉकी, नहीं चलना तो रहने दो। निक्की के साथ खेलने का मन है न! तो ठीक है, आज तुम यहीं रहो। बाद में मैं तुम्हें ले जाऊँगा।” और रॉकी वापस आया निक्की और उसके दोस्तों के पास तो वह इतना खुश था, इतना खुश कि उसकी आँखें एकदम बिजली के लट्टुओं की तरह चमक रही थीं। वह खुशी के मारे बड़ी देर तक उछलता-कूदता और नाचता रहा। निक्की ने पोपू, पीलू और टिनटिन चिड़िया के साथ जग्गी अंकल के रॉकी को भी प्यार से खाना खिलाया।

 

शाम के समय जग्गी अंकल रॉकी को लेने के लिए आए, पर रॉकी का अब भी मन नहीं भरा था। बार-बार वह निक्की की ओर देखकर कूँ-कूँ करता और उसके पैरों से लिपट पड़ता। इस पर निक्की के मम्मी-पापा ने कहा, “निक्की, यह अच्छी बात नहीं है। तुम कहो न, ताकि जग्गी अंकल का रॉकी उनके साथ जाए।” निक्की हँसकर बोली, “जाओ रॉकी, जाओ अंकल के साथ। फिर आना।” रॉकी जग्गी अंकल के साथ गया तो इस तरह पीछे देखते हुए जा रहा था, जैसे निक्की से कह रहा हो, “निक्की, मुझे अफसोस है कि मुझे जाना पड़ रहा है। अभी तो मेरा तुमसे और तुम्हारे दोस्तों के साथ खेलने का बड़ा मन था।”और सचमुच निक्की और निक्की के मम्मी-पापा हैरान रह गए जब कोई पंद्रह मिनट के भीतर जग्गी अंकल का डॉगी उछलता-कूदता और सरपट भागता हुआ निक्की के पास आ गया। वह इस तरह कूँ-कूँ-कूँ करता हुआ निक्की के चारों ओर चक्कर काट रहा था और पूँछ हिला रहा था कि निक्की ही नहीं, उनके दोस्तों पोपू, पीलू और टिनटिन चिड़िया को भी हैरानी हुई।

 

निक्की के मम्मी-पापा समझ ही नहीं पा रहे थे कि जग्गी अंकल के रॉकी पर निक्की का यह क्या जादू चल गया कि वह अपने घर जाना ही नहीं चाहता। थोड़ी देर बाद जग्गी अंकल का फोन आया। उन्होंने निक्की से कहा, “अरे बिटिया, तुम्हारे पास से आकर रॉकी इतना उदास था, इतना ज्यादा उदास कि मुझसे देखा नहीं गया। तो मैंने ही कहा—निक्की के पास जाना चाहते हो न, तो ठीक है, जाओ। रात को आकर मैं तुम्हें ले जाऊँगा।” रॉकी फिर से निक्की और निक्की के दोस्तों के साथ खेलकूद में इस कदर लीन हो गया, जैसे उसे यहीं धरती का स्वर्ग मिल गया हो। कुछ देर बाद निक्की पोपू और पीलू को साथ लेकर पार्क में घुमाने गई तो रॉकी भी उछलता-कूदता साथ गया। पार्क में तीनों दोस्तों ने खूब मजे किए। खासकर रॉकी ने वहाँ उछल-कूद के ऐसे-ऐसे करतब और तमाशे दिखाए कि पोपू और पीलू ने ही नहीं, निक्की ने भी उसकी ओर खूब प्रशंसा भरी नजरों से देखा। उसने प्यार से उसकी पीठ सहला दी। रॉकी को लगा, आज पहली बार मेरी कला की किसी ने सच्ची तारीफ की है!

 

फिर रात को जग्गी अंकल आए और रॉकी उनके साथ गया, तो निक्की ने उसकी आँखों में बड़ी याचना देखी। मानो रॉकी कह रहा हो, ‘जैसे मैं तुम्हारे घर आया हूँ, तुम भी तो मेरे घर आ सकती हो निक्की। वहाँ जग्गी अंकल के साथ बातें करना और मेरे साथ खेलना।’ उसके कुछ रोज बाद निक्की जग्गी अंकल के घर गई तो रॉकी इतना खुश हुआ कि जोर-जोर से निक्की की कई परिक्रमाएँ कर डालीं। वह इस कदर जोर-जोर से उछल रहा था और कूँ-कूँ-कूँ करके अपना प्यार जता रहा था कि निक्की ने बड़ी देर तक उसके सिर और पीठ पर हाथ फिराया। उसके बाद रॉकी शांत हो गया और इतनी प्यार भरी मासूम नजरों से निक्की को देखने लगा, जैसे कह रहा हो, ‘निक्की, मेरे पास जबान नहीं है, तुम्हारी तरह भाषा नहीं है। पर कुछ कहना चाहता हूँ। बस, तुम खुद ही समझ लो मेरी बात...!’

 

छुट्टी के दिन तो यह करीब-करीब तय ही था कि रॉकी निक्की के पास ही रहेगा और उसका पूरा दिन पोपू, पीलू और टिनटिन चिड़िया के साथ खेलते ही बीतता। पता नहीं कैसे उसे पता चल जाता कि आज इतवार है, निक्की के स्कूल की छुट्टी है। और वह झटपट दौड़ता-कूदता, उछलता और नाचता हुआ निक्की के घर की ओर दौड़ पड़ता था। शाम को जग्गी अंकल अपने डॉगी को लेने आते तो यह कहे बगैर न रहते, “निक्की, अब में जान गया है कि तुम जरूर कोई जादू जानती हो। तभी तो मेरे रॉकी को ऐसे अपना दोस्त बना लिया कि वह अब मेरी बात तो मानता ही नहीं।” इस पर निक्की हँसने लगती। फिर एक दिन हँसते-हँसते बोली, “जग्गी अंकल, मैं बताऊँ आपको राज की बात? असल में मैं जानवरों की भाषा जानती हूँ। उनकी आँखों में किसी को देखकर जो प्यार उमड़ता है, उसे पढ़ो तो वे बहुत खुश होते हैं। उनके साथ हँसो तो वे हँसते हैं, उनके साथ खेलो तो वे खेलते हैं और खुशियाँ मनाते हैं।”

 

निक्की की बात इतनी प्यारी थी कि सुनकर जग्गी अंकल अवाक रह गए। उन्होंने प्यार से निक्की के सिर पर हाथ फेरा और जाते हुए बोले, “अरी प्यारी बिटिया, आज तो लग रहा है, तुमने जग्गी अंकल के डॉगी पर ही नहीं, खुद जग्गी अंकल पर भी जादू कर दिया।” सुनकर निक्की और उसके मम्मी तो हँसे ही, जग्गी अंकल खुद भी अपनी बात पर हो-हो करके हँस पड़े।


- प्रकाश मनु
 
रचनाकार परिचय
प्रकाश मनु

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कथा-कुसुम (1)