प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2016
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

घोड़ी का बच्चा

बात कुछ पुरानी है। एक चित्रकार था। वह बहुत सुन्दर पेंटिंग बनाता था। परिवार पालन के लिये वह अधिक कमाई करना चाहता था। इसलिये अपनी पेंटिंग बेचने के लिये दूर-दूर के स्थानों पर भी जाता था। दूर के स्थानों पर जाने के लिये उन दिनों घोड़ों का ही ज्यादा इस्तेमाल होता था। उसके पास भी एक घोड़ी थी। घोड़ी बहुत ही सुंदर थी। वह अपनी घोड़ी को बहुत प्यार करता था। उसकी घोड़ी के बच्चा जनने का समय निकट ही था, फिर भी वह घोड़ी को लेकर दूसरे शहर अपने बनाये चित्र बेचने चला गया। जब वह घर से चलने लगा था, तब बच्चों ने कहा था कि उस शहर में दस-दस किलो वजन के तरबूज मिलते हैं। आप हमारे लिये एक जरूर लाना। इसलिये इस बार उसने कोई और सामान नहीं लिया। एक तरबूज ही लिया ताकि गर्भवती घोड़ी को अधिक वजन वाली परेशानी न हो।

 

वापस आते समय तूफान के कारण वह रास्ता भटक गया। एक अपरिचित गांव में पहुंच गया। रात हो गई थी। रात भर ठहरने के लिये उसने कई घरों के दरवाजों पर दस्तक दी, मगर किसी ने द्वार नहीं खोला। तब उसने खुले में एक पेड़ के नीचे ठहरकर रात काटने की सोची। अभी वह एक बड़े पेड़ की तरफ जा ही रहा था कि एक आदमी उसके पास आया और बोला - तुम कोई मुसाफिर लगते हो। यदि रात में ठहरना है तो मेरे घर चल सकते हो।

 

चित्रकार को लगा, यह तो कोई देवदूत है। वह उसके घर चला गया। उसने गृह स्वामी को बता दिया कि उसकी घोड़ी ब्याने वाली है तथा उसके पास एक दस किलो का तरबूज भी है। गृह स्वामी ने उसके लिये घर पर खाना बनवाया। आवभगत से प्रसन्न होकर चित्रकार ने उसी समय एक चित्र बना दिया, जिसमें वह स्वयं, उसकी घोड़ी, तरबूज, गृह स्वामी आदि सभी थे। इसे आप उस समय की ‘सेल्फी’ कह सकते हैं।

 

खाना खाते ही चित्रकार गहरी नींद में सो गया। सुबह उठा तो उसे कुछ सरदर्द भी था। फिर भी उसने सबसे पहले अपनी घोड़ी को संभाला। वह सही सलामत थी, पर उसकी हालत देखकर वह समझ गया कि रात में जब वह सोया हुआ था, किसी समय घोड़ी ने बच्चा दिया है। उसने देखा, उसका दस किलो वाला तरबूज भी गायब है। उसने गृहस्वामी से घोड़ी के बारे में पूछा-घोड़ी की हालत बता रही है कि रात में उसने बच्चा दिया है। क्या है वह? बछेरा या बछेरी? मेरा तरबूज कहां है?

 

गृहस्वामी तुनक कर बोला - क्या कह रहे हो तुम? तुम सिर्फ घोड़ी लेकर आये थे। अपनी घोड़ी लेकर चलते बनो। एक तो मैंने तुम्हें रात भर के लिये ठहराया, अहसान मानना तो दूर, मुझ पर चोरी का दोष लगा रहे हो? दोनों का झगड़ा बढ़ गया तो मामला उस गांव की पंचायत में पहुंच गया। वह आदमी बहस करने लगा। पंचों ने चित्रकार से कहा कि कोई सबूत दो कि तुम घोड़ी के साथ बच्चा भी लाये थे। उस आदमी से भी कहा कि तुम्हारे पास क्या सबूत है कि यह अकेली घोड़ी लाया था?

 

चित्रकार अपनी बात कहता रहा, पर ऐसा कोई सबूत नहीं दे सका कि रात में उसकी घोड़ी ने बच्चा दिया था। उधर वह आदमी बोला - मेरे पास इसका सबूत है। इसने खुद ने एक चित्र बनाया था। उसमें सिर्फ घोड़ी है, कोई बच्चा नहीं है।उसने पंचायत में चित्रकार द्वारा बनाई पेंटिंग सबके सामने रख दी। पंचों ने उसे देखा। आपस में विचार-विमर्श कर कोई फैसला देने वाले थे कि चित्रकार बोल पड़ा - इस आदमी के दिए सबूत से एक बात तो सिद्ध होती है कि मेरे पास दस किलो वजन वाला तरबूज था। मेरे बच्चों ने मंगवाया था वह। मुझे वह दिलवा दें। मैं उसे लेकर चला जाऊंगा।

 

वह आदमी चीख कर बोला - अब दूसरा झूठा आरोप। मेरे पास कोई तरबूज नहीं है। इसने खुद ने ही खा लिया होगा।

पंच बोले - इतना बड़ा तरबूत यह अकेला कैसे खा सकता है। जरूर तुमने अपने घर में छिपा रखा होगा।

आदमी बोला - तलाशी ले लो। यदि मेरे घर में तरबूज नहीं मिलता है तो इसे क्या सजा मिलेगी?

पंचायत बोली- सब जानते हैं कि झूठा आरोप लगाने वाले को हम कितनी कठोर सजा देते हैं।

 

पंच, चित्रकार और वह आदमी घर पर पहुंचे। पंच तलाशी लेना शुरू करें, इससे पहले ही घोड़ी हिनहिनाने लगी और अपने को छुड़ाने की कोशिश करने लगी। चित्रकार ने उसे छोड़ दिया। घोड़ी तेजी से घर के पिछवाड़े की ओर गई। सभी उसके पीछे चले। घोड़ी एक बंद दरवाजे पर टक्कर मारने लगी। पंचों ने गृहस्वामी की ओर देखा। उसका मुंह सफेद हो गया था, वह घबराया सा लगा। एक ने आगे बढ़कर उस कमरे का दरवाजा खोल दिया। कमरा खुलते ही सभी आश्चर्य चकित रह गये। कमरे में कचरे के ढेर पर घोड़ी का नवजात बच्चा पड़ा था। घोड़ी ने भी उसे सूंघा, चाटा और हिलाया तो उसमें कुछ हरकत हुई। चित्रकार समेत सभी ने उसे संभाला। कुछ देर में बच्चा ठीक हो गया। चित्रकार ने कहा - मुझे अपनी घोड़ी का बच्चा सही सलामत मिल गया। मैं इसे ले जाता हूं। तरबूज.....

 

वह आगे कुछ बोलता, इससे पहले उस आदमी का एक बच्चा बोला - वह तो हम सबने रात में ही खा लिया था। बहुत मीठा और स्वाद था।

बच्चे की सच्चाई पर चित्रकार को हंसी आ गई। बोला - वह तरबूज मैंने अपने बच्चों के लिए लिया था। इन बच्चों ने खा लिया, मुझे कोई शिकायत नहीं।

पंचों ने उस आदमी की तरफ देखा। वह हाथ जोड़े, सिर झुकाए खड़ा था। पंच कुछ बोले, इससे पहले ही चित्रकार वहां से चल पड़ा। रास्ते भर उसे अफसोस रहा कि वह अपने बच्चों के लिए तरबूज नहीं ला सका।

 

वह घर पहुंचा तो बच्चों को इंतजार करते पाया। बच्चों की नजर जैसे ही घोड़ी के बच्चे पर पड़ी, वे सब कुछ भूलकर उससे लिपट गये। उनकी खुशी देखकर चित्रकार सोच रहा था, तरबूज आता तो शायद ये उसकी तरफ देखते भी नहीं। फिर घोड़ी की तरफ देखते हुए वह मन ही मन बोला - बहुत वर्षों से तुम मेरी यात्राओं की मुश्किल को आसान बना रही हो, आज तुम्हारे बच्चे ने एक बड़ी मुश्किल को हल कर दिया।


- गोविंद शर्मा
 
रचनाकार परिचय
गोविंद शर्मा

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कथा-कुसुम (1)