प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

नकल

राम नरेश शर्मा को छोटे बच्चों के पायजामे खींचने की आदत थी। लाज के मारे बच्चे जब अपना पायजामा पकड़ते हुए झिझकते और शर्म करते तो वह बच्चों को हंसाकर स्वयं भी जोर से ठहाके लगा आसमान सिर पर उठा लेते थे। खासकर वह अपने बड़े भाई के पोते रक्षक को तो बहुत छेड़ते थे। हालांकि उन दोनों की दांत कटी भी होती थी। रामनरेश शर्मा पूरा बालक बनकर रक्षक के साथ तरह-तरह के खेल खेलते थे। जब कभी रक्षक का पायजामा या कच्छा वह खेंचते तो लोट-पोट हुए हंसते। उस वक्त उनकी पत्नी अगर सामने होती तो वह उन्हें झिड़क देती थी।

‘‘कुछ तो शर्म कीजिए। आज के बच्चों से ऐसी हरकतें शोभा नहीं देती। यह भी याद रखिए कि बच्चे बड़ों की नकल करते हैं।’’ लेकिन रामनरेश शर्मा के कान में जूं तक नहीं रेंगती थी। वह पत्नी की बात एक कान से सुनते दूसरे से निकाल देते थे। रक्षक और उनका खूब हंसी-ठट्ठा चलता था।

 

रविवार का दिन था। रक्षक ने अपने दादा से कहकर छोटे दादा यानी रामनरेश शर्मा और उनकी पत्नी के पास आकर खेलने की अनुमति ले ली थी। रामनरेश की पत्नी ने उनके द्वारा रक्षक को लाए अनार खाने को दिए थे। जब तक रक्षक ने अनार खत्म किए तब तक रामनरेश शर्मा भी ट्रेकसूट में खेलने आ गए थे। रक्षक ने आव देखा ना ताव झटपट अपने छोटे दादा का पायजाम खींच लिया। रामनरेश शर्मा ने अंदर के वस्त्र भी डाले न थे। अपने नंगेपन पर वह हंसे तो जरूर, परन्तु रक्षक और पत्नी के सामने वे पानी-पानी हो गए थे।

 

पांच साल का रक्षक जोर-जोर से हंसता लोट-पोट होता जा रहा था।

रामनरेश शर्मा से हंसते बना न रोते। उनकी बोलती बन्द थी। उन्हे बार-बार पत्नी की बातें स्मरण हो रही थीं कि बच्चे बड़ों की नकल करते हैं।


- कृष्ण चन्द्र महादेविया
 
रचनाकार परिचय
कृष्ण चन्द्र महादेविया

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कथा-कुसुम (1)