प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2015
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल कहानी- गलती का अहसास
किसी जंगल में एक भालू और उसका बेटा रहते थे। पिता भालू का नाम भोलू तथा उसके बेटे का नाम चुनु था। भोलू अपने बेटे चुनु से बहुत प्यार करता था। चुनु जहाँ बहुत ही प्यारा और शांत था, वहीं उसका पिता भोलू अपने नाम से अलग बहुत ही झगड़ालु और शातिर था। भोलू को हर वक्त कोई न कोई शरारत ही सूझती रहती थी। जंगल के सभी जानवर उससे डरे-डरे रहते थे। आज उसने गोल्डी बंदर के तीन दिन पहले जन्मे बच्चे को पेड़ से नीचे फेंक दिया और खूब जोर-जोर से हंसने लगा। यह तो शुक्र था  कि पेड़ के नीचे से गुजर रहे हाथी ने उसे देख लिया और उसे अपनी सूंड से पकड़कर नीचे गिरने से बचा लिया। आज हाथी न होता तो गोल्डी का बच्चा मर गया होता। हाथी ने भोलू को उसकी इस गलती के लिए खूब खरी-खोटी सुनाई। भोलू चुपचाप हाथी की बात सुनता रहा। इस वक्त उसका बोलना उसके लिए खतरा पैदा कर सकता था। वह थोड़ी ही देर में मुँह बंद करके चुपचाप वहाँ से खिसक लिया। परंतु उसे हाथी की बात से जरा भी फर्क नहीं पड़ा।
दूसरे दिन वह एक पेड़ पर चढ़ा और मधुमक्खियों के बनाए छते पर जाकर छते को हिलाने लगा और मधुमक्खियों से शरारत करने लगा। मधुमक्खियाँ बोली, "यदि तुम्हें शहद ही खाना है तो खा लो। लेकिन छते को मत छेड़ो। इसमें रानी मधुमक्खी के बहुत से बच्चे हैं, जो कुछ समय के बाद आंखें खोलने वाले हैं। कृपया इन बच्चों की जान बख्श दो।"
इतना सुनने की ही देरी थी कि भोलू ने एक बड़ी-सी टहनी तोड़ी और उससे छते पर जोरदार प्रहार करके उसे पेड़ से नीचे गिरा दिया। इस प्रहार के कारण बहुत सारी मधुमक्खियाँ और बच्चे मर गए। गुस्से में आग-बबुला मधुमक्खियों ने उसे खूब काटा लेकिन उसे इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। वह पेड़ से नीचे उतरा और चुनु को शहद खाने के लिए कहने लगा। इस पर चुनु ने कहा, "पिता जी, मैं यह शहद नहीं खाऊँगा। आपने बेवजह ही इतनी सारी मधुमक्खियों के साथ साथ उनके बच्चों को भी मार दिया। यह बहुत गलत किया आपने।" यह कहकर चुनु वहाँ से जाने लगा तो भोलू ने उसे रोककर उससे वादा किया कि वह आगे से ऐसा काम कभी नहीं करेगा। चुनु को यह सुनकर बहुत अच्छा लगा। वह अब अपने पिता के साथ घर के लिए रवाना हो गया।
भोलु ने अपने बच्चे से बहुत झूठ बोला था। अगले दिन सब कुछ भुलाकर भोलू फिर अपने काम में लग गया था। इस वक्त उसका बेटा उसके साथ नहीं था। वह एक पेड़ पर चुपके से चढ़ा और बेचारी चुनमुन चिडि़या के घोंसले से सारे अण्डों को नीचे जमीन पर फैंक दिया। चुनमुन जब वापिस आई तो अपने अजन्मे बच्चों की यह हालत देखकर बहुत रोई और भालु को बहुत बुरा-भला कहा।
सभी जानवर भोलू से बहुत दुखी थे। वे उसे समझाने के बहुत सारे उपाय कर चुके थे लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हो रहा था। अब वह और ज्यादा बेफिजूल शरारतें करने लगा था। चुनु ने भी अपने पिता को समझाने के सब उपाय कर लिए थे। लेकिन सब व्यर्थ। वह निर्दयता की सारी हदें पार कर चुका था। सभी जानवरों के डर-डर के दिन बीत रहे थे।
एक दिन सुबह-सुबह ही भोलू इधर-उधर दौड़ रहा था। वह बदहवास-सा यहाँ-वहाँ कुछ खोज रहा था। उसे ऐसी हालत में पहले किसी ने नहीं देखा था। वह जोर-जोर से चुनु को आवाज लगा रहा था। इसका साफ अर्थ था कि उसका चुनु कहीं खो गया है। उसे चुनु का कहीं कोई सुराग नहीं मिल रहा था। यहाँ-वहाँ दौड़-दौड़ कर भोलू की सांस फूलने लगी थी। किसी को भी चुनु के बारे में कुछ पता नहीं था। सभी पशू-पक्षियों को प्यारे-से चुनु की फिक्र हो रही थी। चुनु के बारे में किसी अनजान डर की सोच केे कारण भोलू को रोना आ रहा था। उसे किसी अनहोनी की आशंका हो रही थी। वह अभी अपनी इसी उधेड़बुन में ही था कि इतने में चुनमुन चिडि़या उड़ती हुई भोलू के पास आई और उसने बताया कि चुनु नदी किनारे बेसुध पड़ा है। उसे शायद शिकारियों ने न मार गिराया हो। चुनमुन ने अपनी आशंका जाहिर कर दी थी।
यह सुनकर भोलू के होश उड़ गए। वह बिजली की फुर्ति के साथ नदी की ओर भागा। नदी किनारे जब वह पहुंचा तो उसने देखा चुनु सचमुच वहाँ अचेत गिरा पड़ा था। भोलू ने चुनु की हर नब्ज को टटोला लेकिन उसकी कोई भी नब्ज नहीं चल रही थी। भोलु की नजर में चुनु मर चुका था। वह चुनु को देखकर दहाड़े मार-मार कर रोने लगा। उससे अपने बेटे की मृत्यु का दुख सहन नहीं हो पा रहा था। इस वक्त तक सभी जानवर यहाँ इकट्ठे हो चुके थे। इस भीड़ में से गोल्डी बंदर बोला, "बच्चे की मृत्यु का दुख क्या होता है। अब पता लग रहा है इसे। तब तो सभी जानवरों, पक्षियों केे बच्चों को मारता फिरता था। उन्हे परेशान करता रहता था। अब पता लगेगा कितना कष्ट होता है। जब अपना कोई बिछड़ता है।" गोल्डी ने भोलू द्वारा अपने बच्चे को फैंकने का गुस्सा अब जाकर इस तरह से निकाला था।
भोलु को यह सब सुनाई दे गया था। उसे इस वक्त अपनी सारी गलतियाँ स्मरण हो आईं थीं। उसे याद आ रहा था कैसे उसने जानवरों व पक्षियों के बच्चों को तंग किया था, उन्हे मौत की नींद सुलाया था। उसे इस समय उनके माँ-बाप के दुखों का अहसास हो रहा था। वह दहाड़ें मार मारकर भगवान से एक ही विनती किए जा रहा था कि भगवान उसके बच्चे को जीवित कर दो। मैं अब किसी भी जानवर को तंग नहीं करुंगा। उन्हें जरा भी कष्ट नहीं पहुंचाऊंगा। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है। आस-पास खड़े सभी जानवर जान गए थे कि इस बार भोलु दिल से सब बातें कह रहा है। भोलू की अश्रुधारा थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। 
"पिता जी, क्या हो रहा है यहाँ। आप क्यों रो रहे हैं? और ये सब यहाँ क्यों इक्ट्ठा हुए हैं।" चुनु अपनी आंखें मलता हुआ यह सब कह रहा था। 
चुनु को जिंदा देखकर भोलू की खुशी का ठिकाना न रहा। वह उसे प्यार से चूमता जा रहा था। "बेटा तुम जिंदा हो! भगवान का शुक्र है।"
"अच्छा, हाँ........ वो पिता जी शिकारी आए थे और वे शेर मामू को पकड़ना चाह रहे थे। उन्होंने बेहोशी की सुई छोड़ी जो शेर के बजाय गलती से मुझे लग गई और मैं यहाँ झाडि़यों के पास बेहोश होकर गिर पड़ा। वे लोग शेर के पीछे भाग लिए।" चुनु ने सारी कहानी सुनाई।
"अच्छा तो यह बात थी। मैं तो डर गया था बेटा।" लेकिन भगवान जो करता है सब अच्छे के लिए ही करता है। इस घटना ने मेरी आंखें खोल दी हैं। मैं अब किसी भी जानवर या पक्षी के बच्चों को तंग नहीं करुंगा। मैं सबके साथ प्यार से रहूँगा। आप सब लोगों को अब मुझसे डरने की आवश्यकता नहीं है।"
यह बात सुनकर चुनु और जंगल के सभी प्राणी खुश हो गए थे। सबने भोलू के लिए तालियाँ बजाई।

- पवन चौहान
 
रचनाकार परिचय
पवन चौहान

पत्रिका में आपका योगदान . . .
हस्ताक्षर (1)कविता-कानन (1)कथा-कुसुम (1)ख़ास-मुलाक़ात (1)बाल-वाटिका (2)पाठकीय (1)यात्रा वृत्तांत (1)