प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2015
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मालकिन
छोटे साब की उम्र जैसे-जैसे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे वह ज़िद्दी होते जा रहे थे। जो मर्ज़ी में आता वह करते। घर के नौकरों पर चिल्लाते और गुस्से में सामान इधर-उधर फेंक देते। उनकी एक आवाज़ पर अगर कोई हाज़िर न होता तो समझ लो सब की शामत आई। फिर तो जो मुँह में आता, वो बकते और नौकरी से निकाल देने की धमकी दे डालते। घर के सारे नौकर छोटे साब से उम्र में बड़े थे। मगर इस बात का उन्हें ज़रा भी लिहाज़ न था। अपनी कही गयी उल्टी-सीधी बातों पर कभी उन्हें पछतावा नहीं हुआ। कई नौकर इससे पहले आये और उनके व्यवहार की वजह से काम छोड़कर चले भी गये।
छोटे साब घर में इकलौते थे। शादी के दस साल बाद पैदा हुए थे। बड़ी दुआएँ की और करवाई गयीं थी।
 
आखिर ईश्वर ने छोटे साहब के रुप में मालिक और मालकिन को एक बेटा दिया। मुझे याद है कितना जश्न मनाया गया था। दावत का इंतज़ाम किया गया था। सारे गाँव की दावत की गयी थी। कई तरह के पकवान बने थे। सब ने खूब छककर खाया था। उस दिन जैसे स्वर्ग की सारी खुशियाँ इसी घर में उतर आयीं थीं।
समय गुज़रता गया। मालिक का देहांत हो गया। मालिक के देहांत के बाद से मालकिन भी बीमार रहने लगी। दिन-रात कमरे में एक बिस्तर पर पड़ी रहती। छोटे साहब बड़े हो गए थे। दिनभर दोस्तों के साथ बस इधर-उधर घूमा करते और आधी रात घर पहुँचते। कभी खुद आकर माँ का हाल-चाल न लेते। लेकिन मालकिन तब तक न सोती, जब तक उन्हें छोटे साब के आने के बारे में बता न दिया जाता।
 
महीनों बीत जाते मगर छोटे साहब मालकिन के कमरे में पैर तक न रखते। मालकिन को मैंने छुपकर अकेले में रोते कई बार देखा था। अपने ही बेटे को देखने के लिए तरस जाती। बात करने के लिए तरस जाती। लेकिन शिकवा-शिकायत उनकी जुबान से कभी नहीं सुना। हाँ, कभी-कभी वो मुझ से पूछ लिया करती थी - "छोटे साब मेरी ख़ैरियत पूछते हैं कि नहीं।"
मैं उन्हें झूठा दिलासा दे देता- "जी मालकिन, अभी कल ही पूछ रहे थे आपके बारे में।"
मालकिन भली तरह समझती थी कि मैं झूठ बोल रहा हूँ फिर भी मेरी झूठी बातों को वह सच मानने की कोशिश करती।
 
मुझे मालकिन की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी। उनको दवा समय पर देना। नाश्ते और खाने का इंतज़ाम करना आदि। लेकिन दवाइयों का कोई असर उन पर नहीं हो रहा था। उन्हें वैसे तो कोई जानलेवा बीमारी नहीं थी लेकिन दुःख जरूर था। छोटे साब का रवैया अपनी माँ के लिए भी नरम न था। अगर कभी आते भी तो उन पर चिल्लाकर जाते। उनके इस व्यवहार का नतीजा था क़ि मालकिन की तबियत दिन-प्रतिदिन खराब होती गयी। तमाम तरह के वैध, हकीम और डॉक्टर बदले जा चुके थे लेकिन उनकी तबियत में सुधार न हुआ।
एक दिन मैंने बड़ी हिम्मत करके छोटे साहब से कहा- "छोटे साहब आपको मालकिन बहुत याद करती है। ज़रा उनकी ख़ैरियत ले लो।"
छोटे साहब ने मेरी बातें अनसुनी कर दी और मुझे घर के दूसरे काम बता दिए।
 
मुझे मालकिन पर दया आती और छोटे साहब पर क्रोध। एक नज़र देखने में कितना समय लगता है? एक बार चल के ख़ैरियत पूछ लेने में क्या चला जायेगा? कौन सा मील भर पैदल चलकर जाना है? काश ये बातें छोटे साब समझ पाते।
मैंने कई बार सोचा नौकरी छोड़ दूँ। मुझे छोटे साहब का व्यवहार नापसंद था, लेकिन मालकिन को देखकर घर से कदम उठाने की हिम्मत न होती। मेरे बाद उनकी देख-रेख कौन करता। यह सवाल मेरे दिमाग में हमेशा गूंजता। उस घर से मेरा जुड़ाव मालिक और मालकिन की वजह से ही था। मालिक के रहने से कभी एहसास ही न हुआ कि मैं इस घर का नौकर हूँ। उनसे बहुत प्यार मिला। मालकिन भी वैसी ही थी। आज भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव न आया था। 
जिस बच्चे के लिए उन्होंने कितनी दुआएँ मांगी थी, कितना तप किया था। कितने व्रत रखे थे। कितनी परेशानियाँ उठाई थी। कितनी बातें सुनी थी। आज वही उनकी ओर एक नज़र उठाकर देखता भी नहीं। हाल पूछने एक कमरे से दूसरे कमरे तक नहीं आता। मालकिन के चेहरे से उनकी उदासी पढ़ी जा सकती थी। एक समय था जब उनको यह ग़म था कि उन्हें कोई बेटा नहीं है। और आज अपना बेटा होते हुए भी अपना नहीं था।
कितने लाड-प्यार से छोटे साब को उन्होने पाला था। छोटे साब को इस बात का ज़रा भी एहसास होता तो उनका रवैया कुछ और होता।
कई बार मैंने खुद छोटे साब को समझाने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा न हुआ, उल्टा मुझ पर बरस पड़ते- 'अपने काम से काम रखा करो। घर के अंदरूनी मामलों में दखल देने की ज़रूरत नहीं।
ऐसी बाते सुनकर दोबारा बोलने की हिम्मत न होती थी।
 
वक़्त बड़ी रफ़्तार के साथ गुज़र रहा था। बहुत सी चीज़ें वक़्त के साथ बदलती गयी। मगर एक छोटे साब थे जो न बदले। वही अकड़, वही तुनकबाजी। वही बदमिज़ाजी।
मालकिन ने अब पूरी तरह बिस्तर पकड़ लिया था। न उठ पाती थी, न बैठ पाती थी। बोलती तो कांपने लगती। उनकी तबियत दिन-प्रतिदिन और गिरती जा रही थी। वह इतनी कमज़ोर हो गयी थी जैसे उनके बदन में माँस ही नहीं बचा था। एक हड्डियो का ढांचा बन के रह गयीं थी।
बुढ़ापा भी क्या-क्या दिन दिखाता है। कितना आश्रित हो जाता है इंसान दूसरों पर।
 
उस रात घडी में नौ बजे थे। मालकिन ने दिन भर कुछ भी खाया-पिया न था।मैं उनकी कुछ दवाई लेने बाहर दवाखाने गया था। वहाँ से लौटकर जैसे ही घर की दहलीज़ पर कदम रखा तो सामने से घर का रसोइया आता दिखा। उसकी चाल में तेज़ी थी और चेहरे पर शिकन। मैं भाँप गया कि कुछ गड़बड़ है। मेरी धड़कन की गति बढ़ गयी।
"मालकिन?" रसोइया की बात सुनकर मैं मालकिन के कमरे की तरफ दौड़ पड़ा।
कमरे में अजीब-सा सन्नाटा था। कुछ एक नौकर मालकिन के आसपास ही खड़े थे। मालकिन का हिलना-डुलना बंद हो गया था।
रसोइया पास से ही डॉक्टर को बुला लाया।
डॉक्टर ने अपनी तरफ से जाँच करके उन्हें मुर्दा घोषित कर दिया।
 
मैं अवाक एक किनारे जाकर खड़ा हो गया। आँखों से आँसू जारी हो गए। उस दिन बहुत दुःख हुआ।
घर के दूसरे नौकरों से पता चला कि छोटे साब अपने किसी मित्र के घर जन्मदिन की पार्टी में गए है और जाने से पहले मालकिन पर खूब चिल्लाकर गए थे। मालकिन खूब रोई थी।
ग़म को बर्दाश्त करने की हिम्मत नहीं बची थी शायद उनमें। इसलिए आज उनकी साँसे टूट गयी थी।

- सिराज अहमद
 
रचनाकार परिचय
सिराज अहमद

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