नवम्बर 2016
अंक - 20 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

कविता- गाँव की ओर

अब तो मेरे मन में आता,
जोडूं अपने घर से नाता।
खेत और खलिहान बुलाते,
गेहूॅं, सरसों, धान बुलाते।
बौरों वाले आम बुलाते,
लेकर मेरा नाम बुलाते।
नदी नाव के घाट बुलाते,
सबके सब दिन-रात बुलाते।
राधा के घनश्याम बुलाते,
साता के श्रीराम बुलाते।
शहर छोड़ अपने घर आया,
जीवन का सच्चा सुख पाया।।


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कविता- बस्ता

मम्मी कैसे इसे उठाएॅं,
बस्ता मेरा भारी।
रोज लादना पड़ता इसको,
यह मेरी लाचारी।
बीस किताबें और कापियॉं,
कैसे इसे उठाऊॅं?
मन करता है छुट्टी लेकर,
बिस्तर पर सो जाऊॅं।
थक जाता मैं इसे उठा कर,
खेल नहीं फिर पाता।
पढ़ना लिखना भी मुश्किल है,
इतना मुझे सताता।
जैसे-जैसे बच्चा बढ़ता,
बस्ता बढ़ता जाता।
मजबूरी में छोटा बच्चा,
फिर भी इसे उठाता।
बस्ता और पढ़ाई दोनों,
में यह कैसा नाता?
बस्ते के कारण ही बच्चा,
पढ़ने से घबराता।।


- परशुराम शुक्ल

रचनाकार परिचय
परशुराम शुक्ल

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कविता-कानन (1)