प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2016
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

बाल साहित्य की उपेक्षा का अर्थ: शशांक शुक्ला

अक्सर मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि भारत जैसे देश में जहाँ कहानी साहित्य के माध्यम से समृद्ध बाल साहित्य की परंपरा रही है, वहाँ पर आज बाल साहित्य की उपेक्षा क्यों है? पंचतंत्र, हितोपदेश या वृहत्तकथा, कथासरितसागर जैसे ग्रन्थ मूलतः बाल साहित्य ही हैं। अतः बाल साहित्य हमारे साहित्य के प्रस्थान हैं। फिर बड़े -बुजुर्गों द्वारा सुनी-सुनाई जाने वाली कहानियों का केंद्र बिंदु भी तो  'बाल समाज' ही है। ऐसी स्थिति में 'बाल साहित्य' की उपेक्षा किस बात का संकेतक है?
मुझे तो 'बाल साहित्य' और 'गंभीर साहित्य' जैसा वर्गीकरण भी बहुत सार्थक प्रतीत नहीं लगता। क्या हमारे मस्तिष्क में भी कोई ऐसा कोना नहीं, जो हमारे  बालपन को सुरक्षित रखता हो? चेख़व, पुश्किन, प्रेमचंद, टैगोर या अन्य साहित्यकारों की कुछ कहानियों को बाल कहानी कहा जाता है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर इस पर आपत्ति है। 'ईदगाह' को क्या आप बाल साहित्य में रखेंगे? सिर्फ इसलिए कि उसका मुख्य पात्र हामिद नामक बच्चा है? या रवीन्द्रनाथ की प्रसिद्ध कहानी 'काबुलीवाला' को हम बाल साहित्य कहेंगे?


प्रश्न है कि क्या ऐसे साहित्य सिर्फ बच्चे पढ़ते हैं? प्रश्न यह भी है कि हम बाल साहित्य किसे कहें? बच्चों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य (जानवरों, राक्षसों या काल्पनिक रूपक कहानियों के आधार पर रचित)? बच्चों द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य? बाल संवेदनाओं को केंद्रित करने वाला साहित्य....घनीभूत करने वाला साहित्य? बाल संवेदना के बहाने हमारे अपने हृदय का विस्तार करने वाला साहित्य?....यानी कहने का अर्थ यह है कि बाल साहित्य का सामान्य अर्थ या संकीर्ण अर्थ हम 'चंदामामा', 'चम्पक'...में प्रकाशित रूपक कथा या जानवरों की कहानियों से लगा लेते हैं, जो हमारी नासमझी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस सम्बन्ध में टैगोर हों, प्रेमचंद हों या प्रसाद या कोई अन्य साहित्यकार उन्होंने गंभीर/आधारभूत प्रयास किए हैं, जो बाल साहित्य के प्रति हमारी संकीर्ण सोच का ही विस्तार करते हैं।
कहा जाता है कि 'बच्चे समाज के भविष्य' हैं। यानी उनकी 'सम्भावना का प्राकट्य क्षेत्र भविष्य' है। तो क्या हमारा भविष्य लगातार सिकुड़ा है? क्या हम अपने बच्चों की संवेदना के प्रति जागरूक हैं? प्रश्न है कि बचपन खोने के क्या निहितार्थ हैं? क्या हम उत्तर-आधुनिक जीवन में रहकर आसानी से हर चीज की समाप्ति की घोषणा कर देते हैं? और उसी क्रम में 'बचपन के समाप्ति' की घोषणा? कितने खतरनाक हैं इस तरह के कथन।
एक ओर साहित्य का नकार तो दूसरी ओर जीवन सम्भावना का नकार। न जीवन समाप्त होता है न सम्भावना...न बचपना। तो बाल साहित्य की सम्भावना का प्रश्न कहीं हमारे भीतर के नकार की प्रतिक्रिया का ही सूचक तो नहीं? एक बात तो स्पष्ट है कि बाल साहित्य तो नहीं समाप्त हो रहा...समाप्त हो रही है हमारी प्रतिबद्धता...हमारी मासूमियत...हमारे भविष्य के सपने...क्योंकि जो हमारे बचपने का भवितव्य है, वह ही हमारा भविष्य है।


कहा जाता है कि हमारे जीवन निर्माण में हमारे प्रारंभिक 5 साल सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं। संस्कार निर्माण के प्रभावी 5 वर्ष...और फिर उस संस्कार का विस्तार जीवन। इसलिए यदि हम किसी बच्चे को कुछ भौतिक चीजें भलें न दे पायें किन्तु उसे अपने सपने ज़रूर दे दें; क्योंकि यदि हमारे पास सपने हैं तो हम हर चीज़...मंज़िल को अवश्य हासिल कर लेंगे। हमारे सपने ही हमारे पाथेय होते हैं। बच्चों की आँखों में पल रहे सपने ही हमारे भविष्य हैं। बच्चों का खो चुका...मर चुका जीवन ही अतीत बन जाता है। लेकिन वहीं जिन बच्चों ने 'संघर्ष की स्मृति' को जी लिया है, वे अतीत और भविष्य के बीच सेतु निर्माण कर लेते हैं...कुछ नहीं भी कर पाते। यानी 'स्मृति और सपने का होना ही अतीत और भविष्य का होना' है।

कभी-कभी यह विरोधाभास लगता रहा है कि आज के समय में, जो भविष्य के केंद्रण पर है, बच्चों के भविष्य खोने की चिंता? दूसरा प्रश्न यह कि उत्तर आधुनिक जीवन में क्या वाकई 'भविष्य के सपने' हैं या 'भविष्य का भय' है? 'भय' और 'काल' में वो समय सबसे भयानक होता है ,जब 'भविष्य में भय'
 होता है। अतीत का भय हमें निराश करता है, लेकिन प्रतिबद्ध भी करता है। वर्तमान का भय 'सिजोफ्रेनिक' बनाता है...निराशाएं ज़्यादा प्रगाढ़ हो जाती हैं...किन्तु फिर ऐसे व्यक्तित्व भविष्य की ओर चले जाते हैं। वर्तमान का भय वैचारिक दर्शन की ओर हमें ले जाता है...किन्तु भविष्य का भय? 'भविष्य का भय' हमारी 'वैचारिकता के धुंधलेपन' का ही संकेतक है। इसलिए बालपन के सिकुड़ने को मैं 'अतीत' के रूप में नहीं, 'भविष्य' के सिकुड़ने के रूप में देखता हूँ।


प्रश्न उठता है कि बालपन की अवधि क्या छोटी होती जा रही है? नौकरी...प्रतियोगी परीक्षाओं के अतिरिक्त दबाव ने बचपने को वार्धक्य में रूपांतरित कर दिया है। इसीलिए मुझे लगता है कि बाल जीवन के सिकुड़ने का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा है। हमारा आज का जीवन अपने वितान...व्याप्ति में दिन-प्रतिदिन जटिल होता जा रहा है। जटिल जीवन स्थितियां 'वार्धक्य-विकास के अति -विस्तार' (विकास नहीं ) का ही सूचक है। जटिल जीवन स्थितियों में यदि हम अपनी कोमलता, मासूमियत को हाशिए पर कर रहे हैं, तो समझा जा सकता है।
हाँ, लेकिन एक बड़ा प्रश्न यह है कि 'कौतूहल वृत्ति का आधिक्य' ही क्या बालमन के केंद्र में होता है? मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि 'बच्चों का मस्तिष्क' सीखने की प्रक्रिया में ही सर्वाधिक गतिशील होता है। वे प्रकृति के ज्यादा करीब हैं, उन्हें जानवरों का साहचर्य विशेष पसन्द है...यानी जो भी प्राकृतिक है, वह बालपन को ज़्यादा आकर्षित करता है। तो यहाँ हम दो वर्गीकरण स्पष्ट रूप से कर सकते हैं। एक, बालमन को ध्यान में रख लिखा जाने वाला साहित्य और दूसरा बालमन पर केंद्रित साहित्य।
जरुरी नहीं कि बालमन पर लिखा जाने वाला साहित्य बाल साहित्य भी हो। 'ईदगाह' को हम किसी भी प्रकार से बाल साहित्य नहीं कह सकते। इसी प्रकार 'आपका बंटी' के केंद्र में भले ही बंटी या बाल मनोविज्ञान है, किन्तु वह बाल उपन्यास नहीं है। बाल साहित्य के अंतर्गत वही साहित्य आयेगा, जिसमें बालमन की 'उर्ध्वात्मक गति' को पकड़ने का प्रयास उनकी मानसिक गति के अनुरूप किया जायेगा। मुझे बार-बार लगता है कि हमारे देश में जीवन का प्रारंभिक चरण बहुत बंधनग्रस्त है...उन्हें अपनी सोच, क्रिया एवं कल्पना के लिए भी बहुत कम स्पेस मिल पाता है। हमारे साहित्यकारों के मन में भी यह धारणा बैठ चुकी है कि बच्चों के ऊपर लिखना 'अ-गंभीर कार्य' है।


हम चूंकि बद्ध-मनोदशा में ही सोचने के अभ्यासी ज़्यादा रहे हैं। अतः हमको लगता है कि जब तक हम जीवन के किसी गुरु-गंभीर दार्शनिक विषय का चुनाव नहीं करेंगे, हम बड़े लेखक नहीं बन सकते। जबकि सच्चाई यह है कि हम सामान्य जीवन दशाओं को भी गहराई से देखकर बड़ी बात लिख सकते हैं। इसके विपरीत दार्शनिक विषय पर भी हम सतही बात कर सकते हैं। दरअसल बाल जीवन को अपने कथ्य का विषय न बना पाने की मुख्य वजह यह भी रही है कि हम 'गतिशील जीवन-स्पंदनों' को पकड़ने की क्षमता से प्रायः वंचित रहे हैं। सूरदास जैसे भक्त कवि (यानी दार्शनिक-गंभीर कह लें) जब कृष्ण के बहाने वात्सल्य को केंद्रित कर रहे होते हैं तो यह बात ही पुष्ट होती है कि सघन भाव को वही साहित्यकार जी सकता है, जो क्षण-प्रतिक्षण बदल रहे जीवन-स्पंदनों को पकड़ सके। यहाँ एक तथ्य समझने का है कि क्लासिक(?) परम्परा का लेखक क्षण-प्रतिक्षण के परिवर्तन को पकड़ने का प्रयास नहीं करता। उसके लिए 50/100 वर्ष काल के लंबे इतिहास में खो जाते हैं। जैसा कि हज़ारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहास दृष्टि में हम देख सकते हैं। भक्तिकालीन पृष्ठभूमि के प्रसंग में सिंध आक्रमण (712 ई.), 8-9 सदी का दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलन और 11वीं सदी के महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण को उन्होंने एक-दूसरे में अंतर्भुक्त कर दिया है।
यहाँ क्लासिक परम्परा और स्वच्छंद परम्परा के अन्तर्सम्बन्ध पर बात करना विषय का अतिरिक्त विस्तार ही होगा। संकेत रूप में इतना ही कि स्वच्छंद परम्परा का लेखक क्षण-प्रतिक्षण के संवेगों को शाश्वत सत्य के मुकाबले ज़्यादा प्रश्रय देता है। चूंकि हम एक साहित्यकार से गंभीर, बड़ी बातें सुनने के आग्रही रहे हैं, इसलिए भी 'बाल मनोविज्ञान' की बातें करना हमें 'बचपना' लगता रहा है।
ऐसी मानसिकता में यदि बाल साहित्य उपेक्षित हो तो कोई आश्चर्य नहीं। आख़िर हम ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग हैं। प्रश्न यह भी है कि बाल साहित्य के माध्यम से क्या गंभीर बात नहीं की जा सकती? (हुई भी हैं...) जो बच्चा हमारे भीतर के ममत्व...वत्सल को जगाने में माध्यम बनता है, वह क्या अपने भीतर व्यक्तित्व का प्रकाश नहीं बिखेरेगा?


- डॉ. शशांक शुक्ला
 
रचनाकार परिचय
डॉ. शशांक शुक्ला

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