प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2016
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बाल कविता: समकालीन परिदृश्य


कविता बच्चों के हृदय में आनंद का संचार इस तरह करती है कि बच्चा उसे अपनी लम्बी उम्र के तहखाने में समेटे रहता है और जब तब वह उसे अपने मित्रों में बाँटता भी हैl यानि मधुमक्खी में जिस तरह पराग संचयन की प्रवृत्ति होती है, उसी तरह बच्चों में आनंद-पराग संचयन की प्रवृत्ति होती हैl कविता अपने वैविध्यता के साथ आनंद-रस बिखेरती हैl कभी खेल में तो कभी मौसम, कभी बात करती जीवन की समस्या से, तो कभी खाद्य पदार्थों सेl कभी रिश्ते-नाते तो कभी चंदा-तारेl कभी नदी-पहाड़ तो कभी फूल-पौधों का संसारl कभी मित्रता तो कभी राष्ट्र प्रेमl
बाल जीवन का कोना-कोना छूती स्वातंत्र्योत्तर बालकविता में कभी बच्चों को महापुरुषों का जीवन आकर्षित करता है तो कभी माता-पिता काl कभी बच्चा यथार्थ जीवन जीना चाहता है तो कभी कल्पना लोक में विचरणl कभी वह पढ़ना या कुछ शिक्षा ग्रहण करना चाहता है तो कभी शिक्षा से दूर मनोरंजनl कभी वह खिलखिलाता है तो कभी रूठता हैl
बालकविता बालसाहित्यकार के हृदय में ऐसा ही बच्चा बनकर बैठ जाती है और बिखेरती है विविधवर्णी इंद्रधनुषी ज्ञान-विज्ञान और भावना प्रधान कविता के रंगl किन्तु आज स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बालकविता को समकालीन परिदृश्य में बिन्दुवार अवलोकन करने की महती आवश्यकता है, जो निम्नांकित है-

सत्य पर उतरती बालकविता- कविता के तेवर 'शिक्षा के अधिकार' नियम कानून में भी बदलते दिखाई दे रहे हैंl अब बच्चे को फेल करना नियम के विरुद्ध है, यह बिना पढ़े-लिखे लोग भी जानने लगे हैंl यादराम 'रसेन्द्र' की पराग में प्रकाशित बाल कविता 'पास करो' का मिज़ाज देखें-


भोलूराम मिश्र का बेटा
हुआ मिडिल में फेल
पहुँच गए स्कूल मिश्र जी
लगा लट्ठ में तेल
कहा अकड़कर अरे मास्टर
मुझे गया क्या भूल
पास करो लौंडे को या फिर
बंद करो स्कूल


इस कविता में वर्तमान समय में शिक्षक की लाचारी या कहें दुर्दशा स्पष्ट परिलक्षित हैl फिर भी कविता में 'लौंडे' जैसे शब्दों से परहेज होना चाहिएl

मध्यप्रदेश के हिंदी बालकविताकारों ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है, भले ही वे व्यंगात्मक लिख रहे हों किन्तु शब्दों की सीमा रेखा लांघते प्रतीत नहीं होतेl डॉ. राष्ट्रबंधु की पराग में प्रकाशित 'भतीजावाद' शीर्षक कविता में देखिये-


हम साहस  के बेटे हैं
खाना खाकर लेटे हैं
शक्ति हमारी माता है
लड़ना भिड़ना आता है

***************

चाचा नेहरू आते याद
जिंदाबाद भतीजाबाद


अमीरों के ठाठ देखकर गरीब परिवार के बच्चों की संवेदनाएं कवि को झकझोरती हैंl धनिक वर्ग हर मौसम का आनंद उठाता है, निर्धन को वह नसीब कहाँ? राष्ट्रबंधु जी की कविता ऐसा ही व्यक्त करती है-

रुपयों से ही मौज-मजे हैं
मौसम पर अधिकार


समकालीन जीवन में प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही हैl इस पर भी राष्ट्रबंधु जी ने क्या खूब व्यंग्य किया है-

बिल्ली मौसी पढ़ी नहीं थी
रहती अपटूडेट
पढ़े लिखों के कान काटती
खाती मक्खन केक
चिट्ठी बाँच नहीं पाती तो
करती नया बहाना
अपना चश्मा भूल आई हूँ
कल पढ़वाने आना


समकालीन हिंदी बाल कविता में कुछ नये विषय स्कूटर, कार, राशन कार्ड, टी.वी. और अखबार जैसे विषय भी शामिल हो गए हैंl डॉ. सुशील गुरु की कविता 'क्या इतना तेज मीडिया वाला' इसका अच्छा उदाहरण है-

बन्दर नाई की दुकान पर ले अख़बार बैठ गया थोड़ा
शेर बड़ा सकपका के बोला क्या अखबार में छपवा डाला!
अभी अभी पूंछ खींची थी क्या इतना तेज मीडिया वाला!


बालमन को परखती कविताएँ- बच्चे हमेशा यह चाहते हैं कि सभी उनकी परवाह करेंl वे अपनी अनदेखी पसंद नहीं करतेl भगवती प्रसाद द्विवेदी ने 'हम बच्चों पर अत्याचार' शीर्षक कविता में यह बात क्या खूब उकेरी है-

भला किसी को क्या परवाह
स्वयं हमारी भी कुछ चाह
कविता में रुचि तो देते
डॉक्टर बनने की कड़ी सलाह


पाश्चात्य शैली में रमती बालकविता- आज जीवन शैली में तेजी से बदलाव आ रहा हैl पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे जीवन पर इस कदर पाँव पसारे हैं कि बालकविता में भी इसका प्रभाव दिखाई देने लगा हैl चंद्रपालसिंह 'मयंक' की 'मेरी पुस्तक' कविता में यह द्रष्टव्य है-

चींटी बोली मेहनत करके
चाय पत्तियां लाओ
या फिर मैं जाती हूँ लेने
बच्चे तुम्हीं खिलाओ


बालकविता में बेटियां- आज लड़कियां लड़कों से भी आगे बढ़कर माँ-पिता के सपने साकार कर रही हैं, इसलिए उन्हें अब हीन दृष्टि से नहीं बल्कि गर्व की दृष्टि से देखा जाता हैl रामवचनसिंह आनंद का बेटी के जन्म पर यह स्वागत गीत मन को आनंदित करता है-

बड़ी सयानी होगी सचमुच
घर बाहर की नूरी
पी.टी. ऊषा, मदर टेरेसा
दुर्गा सीता क्यूरी
है आशीष यही फलदायी
स्वागत! स्वागत!


बाल समस्या को उजागर करती बालकविता- शिक्षा पद्धति में इस कदर बदलाव आया है कि बच्चे से ज्यादा बोझ अब बस्ते का होने लगा हैl हरीश निगम की 'भैया बस्ते जी' में भी यही भाव दृष्टिगत होते हैंl डॉ. सुधा गुप्ता 'अमृता' की कविता भी बाल समस्या को उजागर करती संवेदनशील बन पड़ी हैl 'बस्ता' कविता की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

भारी बस्ता बोझ बना है
कर देता है हालत खस्ता
नहीं खेलने जाने देता
नहीं सुहाता मुझको बस्ता
आता हूँ जब शाला से
माँ कहती ट्यूशन जाओ
कोई नहीं समझता मुझको
आफत लगता है बस्ता


बालकविता में मौज मस्ती- बच्चों के खेल निराले होते हैंl कभी पतंगें उड़ाना, कभी क्रिकेट तो कभी पानी में कागज की नाव चलानाl हालाँकि ये खेल पुराने हो गए हैं किन्तु इन खेलों का आनंद ही कुछ और हैl बच्चे तो कभी कभी छड़ी को भी घोड़ा बनाकर कल्पनालोक की सैर कर आते हैंl लड़कियों के खेल भी निराले होते हैंl इनका एक खेलगीत डॉ. राष्ट्रबंधु की कलम से निकला है, जो बड़ा ही रोचक है-

चाँई-माँई खेलो, चाँई-माँई खेलो
हाथों में हाथ हो, सबका ही साथ हो
दीदी से कह दो, पापड़ ना बेलो


बालकविता में शिक्षा अभियान- विद्यालयों में पढाई का ट्रैंड बदलने का प्रयास हो रहा हैl शिक्षा अब शिक्षा केंद्रित न होकर बालक केंद्रित की जा रही हैl और इस प्रयोग के चलते खेल-खेल में शिक्षा प्रभावी हो रही हैl बच्चों को अब शिक्षा बोझ नहीं लगती, वे आनंद के साथ शिक्षा ग्रहण करते हैंl डॉ. सुधा गुप्ता 'अमृता' की कविता 'मधुर मधुर मुस्काई बिटिया' की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

अम्मा बोली क्यों निराश तू
खेल खेल में पढ़ना बिटिया
पढ़ लिखकर विद्वान बनेगी
तब अम्मा को लिखना चिठिया
अम्मा की जब बात सुनी तो
मधुर मधुर मुस्काई बिटिया


बालकविता में विज्ञान- स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बालकविता में विशेषतः मध्यप्रदेश में बालगीत के विषयों में समय के साथ तेजी से बदलाव आया हैl गुड्डे-गुड़िया, चाँद-सितारे से हटकर ध्यान अब चंद्रयान, मंगल गृह की ओर जाने लगा है यानि विज्ञान का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा हैl डॉ. परशुराम शुक्ल की कविता 'मंगल ग्रह पर जाएंगे' की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

कहाँ जायें हम? कहाँ जायें हम? सब माइक पर बोले
तभी दुखी हो बन्दर बोला, यहाँ न रह पायेंगे
मानव अभी नहीं मंगल पर, मंगल ग्रह को जाएंगे


स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बालकविता में आधुनिक विषयों का समावेश शुभ संकेत हैl डॉ. राजकुमार 'सुमित्र' की कविता 'कम्प्यूटर जी' द्रष्टव्य हैl इसी तारतम्य में डॉ. राजगोस्वामी की कविता 'चंद्रयान से जाएंगे' की बात करना भी महत्वपूर्ण है-

मामा जी मामी जी से हमको
ख़ुशी ख़ुशी मिलवाएंगे
चन्दामामा से मिलने हम
चंद्रयान से जाएंगे


समय ने करवट इस तरह बदली है कि अब जागरण के गीत, प्रभाती गीत खो से गए हैंl लोरी गीत का तो सर्वथा अभाव हैl

बालकविता में राष्ट्रप्रेम- राष्ट्रप्रेम के गीत अवश्य लिखे जा रहे हैं किन्तु उनमें वह जज्बा और रवानगी देखने नहीं मिलती, जो बाल कवि बैरागी के गीतों में मिलती हैl उनके एक गीत 'हम हैं पहरेदार' की बानगी देखिये-


जिस मिट्टी ने हमें बनाया
पाला पोसा गोद खिलाया
कभी नहीं भूलेंगे हम
उस मिट्टी का उपकार
वतन के हम हैं पहरेदार


कवि प्रदीप के राष्ट्रभक्ति से सराबोर गीतों को तो दुनिया याद करती है और करती रहेगी-

ऐ मेरे वतन के लोगो
देश के ऐ नौजवान बढ़े चलो
आओ बच्चो तुम्हें दिखायें झाँकी हिंदुस्तान की

जैसे सैकड़ों गीत मध्यप्रदेश की माटी में ही रचे गएl

माखनलाल चतुर्वेदी, श्री कृष्ण सरल, दुष्यंत कुमार, सुभद्राकुमारी चौहान ने अमर राष्ट्रप्रेम के बाल गीतों की रचना की, वहीं डॉ. राष्ट्रबंधु का अलग निराला अंदाज देखें-


बच्चो यह आजादी तुमको
मिली शहीदों की थाती
फूले फले सुखद बिरवा
बोए बाबा खाए नाती


बालकविता में मौसम, पर्व और त्यौहार- भारत की प्रमुख ऋतुओं, त्यौहारों पर भी वर्तमान बालसाहित्यकार खूब लिख रहे हैं और ये गीत बच्चों को खूब लुभा रहे हैंl बाल साहित्यकार जगदीश 'गुप्त' की कविता के तेवर कुछ अलग ही हैं-

ठण्ड का मौसम फलों का मौसम
बच्चों की सेहत का मौसम
पालक मैथी चने की भाजी
लाल टमाटर खाए आजी


सूरज जल्दी डूब के कहता
रात में दुबको रजाई का मौसम


गुप्त जी की कविता में दीवाली की चमक भी निराली है-

रंग बिरंगी आई दीवाली
धूम धड़ाका लाई दीवाली
नन्हें दीपक जलें शान से
रात अमावस काली काली


होली की रंग-बिरंगी छटा बिखेरते गीत भी खूब लिखे गए हैंl महेश सक्सेना की बाल कविता के रंग देखिये-

होली आई रे, होली आई रे, होली आई रे
रंग अबीर गुलाल उड़ाती होली आई रे


बालकविता में पर्यावरण- पर्यावरण पर चिंतातुर साहित्यकारों ने खूब बालगीत लिखे हैंl आज प्रदूषित होते वातावरण पर उनकी चिंता जायज हैl सुधा गुप्ता 'अमृता' की कविता ' एक ठूंठ पर तीन चिरैयाँ, जो बालहंस में प्रकाशित है, की कुछ पंक्तियाँ उदधृत हैं-

एक ठूंठ पर तीन चिरैयाँ
बैठी बड़ी उदास
खुसुर पुसुर कानों में वे
बातें करतीं खास

हाँ बहना अब तो देखो
सूखा ही सूखा है
अपना भी जीवन क्या है अब
प्यासा एक कुआँ है


कविता की अंतिम पंक्तियाँ आशा और विश्वास से लबरेज हैं-

इसी तरह गर सारे बच्चे
इक इक पौध लगाएंगे
महकेगा यह देश हमारा
सोए भाग जग जाएंगे


स्वातंत्र्योत्तर बाल कविता में सर्वत्र पर्यावरण के प्रति चिंता व्याप्त हैl

सारांशत: उपर्युक्त विवेचन विश्लेषण के आधार पर स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता समकालीन परिदृश्य के फलक पर स्वत: ही विविध विषयों के आधार पर वर्गीकृत होती है।


- डॉ. सुधा गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
डॉ. सुधा गुप्ता

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