प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2016
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

परिपक्व अनुभूतियों की प्रतिध्वनि है 'मध्यांतर': के. डी. चारण
 


चिंतन-मनन और स्मृतियों के बीहड़ में ही अनुभूतियां परिपक्व होती हैं और उन्हीं के मध्यांतर में जो प्रतिध्वनि होती है, वहीं से कविता का अंकुरण होता है और धीरे-धीरे यह एक वृक्ष का रूप ले लेती है। एक ऐसा महावृक्ष बन जाती है, जिसके नीचे गोपियों को प्रेम प्राप्त होता है, बुद्ध को ज्ञान प्राप्त होता है, सबरी को सेवा, न्यूटन को गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त और अलेखों लोगों को अलग-अलग चीजें। यह सब इस मध्यांतर में ही क्यों होता है, इसका कारण प्रीति 'अज्ञात' अपनी पहली रचना में ही दे देती है कि महज हृदय के टूटने से ही कोई कवि नहीं बन जाता है बल्कि उसके पास वैचारिकता, संवेदनाएं, अहसास, सच कहने का साहस और शब्दों को पचा पाने का सामर्थ्य भी नितांत आवश्यक है।

प्रीति 'अज्ञात' के सद्यप्रकाशित काव्य संग्रह 'मध्यांतर' में व्यक्ति और उसके इर्द-गिर्द हो रहे गौण या मुख्य सभी परिवर्तनों में सकारात्मकता लाने की आवाज़ें बार-बार शब्दों में से गूंजती-सी प्रतीत होती हैं। उन्हें जाति-धर्म में बंटे समाज से नहीं, मानवीय धर्म से पुष्ट समाज से प्रीति है और ये गूँज कहीं मद्धम नहीं पड़ती है बल्कि शुरू से अंत तक जारी रहती है। 'चर्चा हो' नामक कविता में वो सारे भेद खोल देती हैं कि आजकल तथाकथित बुद्धिजीवी और शासक वर्ग किस तरह आवश्यक मुद्दों को सिर्फ चर्चा में बदलकर लोगों को उलझाये रखते हैं। यह सही है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता पर एक विचार पूरे समाज को बदलने में समर्थ बन सकता है, पर इसके लिए आदमी को अन्याय के ख़िलाफ़ बोलना पड़ता है,अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने पड़ते हैं और इस स्वार्थी समय में जिसमें हम जी रहे हैं बेमतलब बोलने का ख़तरा कौन मोल ले, इसी को वो शब्द रूप देती हुई कहती हैं-

किसी दुर्घटनास्थल से गुज़रते समय
हमारी उपस्थिति को निरर्थक बताते हुए
शरीर के साथ ही धीरे-धीरे
सरक जाते हैं सवाल
फिर वही प्रलाप
मुझे क्या करना
कहाँ है फ़ालतू समय
पुलिस का चक्कर
बेकार के पचड़े
क्या फर्क पड़ जाएगा? (टुकड़ा-टुकड़ा तथ्य)


वहीं 'अभी जारी है' कविता में वो स्त्रियों को मुखर होने का दो टूक आह्वान करते हुए कहती हैं कि तुम अब 'बेचारी' नहीं हो, अतः तुम्हारे ऊपर मढ़े गए हर कुतर्क और उपहास का करारा और वाजिब जवाब दो।
ख़ास बात यह है कि इस काव्य संग्रह में स्त्री-विमर्श को आधार बनाकर जितना कुछ भी लिखा गया है, कवयित्री अधिक सावचेति बरतती है। वह उल-जुलूल बातें न करके या फ़ालतू शब्दजाल न रचकर बड़ी साफ़गोई से यह बताती है कि आधी आबादी का हिस्सा होने के कारण जितने तुम्हारे अधिकार महत्वपूर्ण हैं उतने ही कर्तव्य भी महत्वपूर्ण हैं।
पूरे काव्य संग्रह में सरल और सामान्यतया प्रचलित शब्दावली का इस्तेमाल करके ये ज़ाहिर कर दिया है कि वे शब्द चयन के प्रति पूर्णतः सजग हैं, क्योंकि उन्हें अपनी बात से हर पाठक के ज़हन में प्रश्नानुकूल वातावरण बनाना है ताकि वो खुलकर सोच सके कि कविताएँ क्या कह रही हैं।


मौन और एकांतता की अद्भुत छाया 'मध्यांतर' की कविताओं पर दिखती है, जो यह बताती है कि इनकी कविताएँ चिंतन-मनन के ग्राइंडर में घूमकर संवेदना के छींटे लेकर ही काग़ज़ की प्लेट में परोसी गयी है। कहने का मतलब यह है कि थोथी बयानबाजी से परे अनुभूतियों का आवरण इनकी कविताओं पर साफ़-साफ़ दिखाई देता है, जो कवि कर्म की सार्थकता है। 'ज़िंदगी', 'माँ कहती थी' और 'मध्यांतर' सरीखी रचनाएँ इसका प्रमाण हैं।
वर्तमान दौर की पत्रकारिता ने जिस तरह विज्ञापनों को ही ख़बर में कन्वर्ट कर दिया है और सनसनीखेज समाचारों का लिबास ओढ़ा है, कवयित्री तंज कसते हुए 'सच या झूठ' कविता में एक चित्र-सा प्रस्तुत करती है-


हाँ। झूठ के बाज़ार में
यही तो बिकता आया है
जो सामने दिखा, वही सत्य
आदमी के भीतर के आदमी को
भला कौन जान पाया है।


विषयों की दृष्टि से विविधता से भरा यह 'मध्यांतर' कब खत्म हो जाता है और जिंदगी के नाटक का अगला हिस्सा कब शुरू हो जाता है पता ही नहीं चलता है लेकिन हम सबको अपने-अपने हिस्से के सवाल थोप जाता है। मानवता, देश, समाज, वैश्वीकरण, आम आदमी, स्त्री-विमर्श, एकांत चिंतन, मौन, युद्ध, आतंकवाद, स्वार्थीपन में लिपटे राजनीतिक चोंचले तथा बहुतेरे विषयों पर विचार करने के लिए पाठक को ऊँगली का इशारा करता यह काव्य संग्रह निःसंदेह प्रभावी एवं सुफल सिद्ध होगा ऐसी कामना है और यही हार्दिक इच्छा रखता हूँ कि आने वाले समय में प्रीति जी लेखन में इसी तरह प्रतिबद्ध रहते हुए शब्द यात्रा जारी रखे। शुभकामनायें!!!



समीक्ष्य पुस्तक- मध्यांतर (2016)
विधा- कविता
रचनाकार- प्रीति 'अज्ञात'
प्रकाशक- हिन्दयुग्म
मूल्य- 120 ₹


- के.डी. चारण