प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2016
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़बरनामा

‘आईना-दर-आईना’ गजल-संग्रह का वि‍मोचन व परि‍संवाद
 



जन संस्कृति मंच की ओर से हिन्दी के चर्चित कवि डी. एम. मिश्र (सुल्तानपुर) के नये गजल संग्रह ‘आईना-दर-आईना’ का विमोचन 15 सितम्बर, 2016 को लखनऊ के जयशंकर प्रसाद सभागार, कैसरबाग में किया गया। कार्यक्रम का आरम्भ लोक गायिका व ग़ज़लकार डॉ. मालविका हरिओम के डी. एम. मिश्र की ग़ज़लों के सस्वर पाठ से हुआ। उन्होंने पहली ग़ज़ल ‘मुहब्बत टूटकर करता हूँ मगर अंधा नहीं बनता, खुदा से भी अपना प्यार इकतरफा नहीं करता।’ इसके बाद दूसरी गजल ‘कभी लौ का इधर जाना कभी लौ का उधर जाना, दीये का खेल है तूफान से अक्सर गुजर जाना’ सुनाकर खूब तालियां बटोरीं। उन्होंने कहा कि श्री मिश्र की ग़ज़लें अदम गोंडवी की परंपरा को आगे ले जाती हुई दिखती हैं। उनकी रचनाएं प्रगतिशीलता का परिचायक हैं।

इस अवसर पर डी. एम. मिश्र ने भी अपनी ग़ज़लों का पाठ किया। उन्होंने पहली ग़ज़ल में कहा, ‘नम मिट्टी पत्थर हो जाए ऐसा कभी न हो, मेरा गांव शहर हो जाए ऐसा कभी न हो।’ इसी तरह अगली रचना में कहा, ‘गांव का उत्थान देखकर आया हूँ, मुखिया का दालान देखकर आया हूँ।’ उन्होंने अपने लेखन का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने काव्य लेखन खासतौर से छंदमुक्त कविता से शुरू किया। बाजारवाद के हमले और समाज में मची हलचल को अभिव्यक्त करने तथा लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के क्रम में छंद और लय की तरफ गया। गीतों की रचना की, ग़ज़लें लिखीं। लोगों ने सराहा, उससे ऊर्जा मिली।

विमोचन और परिसंवाद कार्यक्रम प्रसिद्ध कथाकार संजीव की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। संजीव ने डॉ. मिश्र में वह चिंगारी देखी, वह ताप देखा, जो किसी भी कवि को उसकी परंपरा से अलग चमक देकर महत्वपूर्ण बना देता है। उन्होंने कई उदाहरणों के साथ डॉ. मिश्र को जनता का कवि बताया। उनका मानना था कि आप कविता जनता के लिए ही करते हैं और अगर जनता उसे मान्यता प्रदान करती है तो आपकी रचना सार्थक है। उसके लिए जो संक्षिप्ति, जो त्वरा, जो स्पार्क्स जरूरी हैं, वे डॉ. मिश्र की ग़ज़लों में दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने कविता की गेयता की वकालत की और उनकी वापसी के प्रति आशा जताई।
इस संग्रह की गजलों का चयन, इस संग्रह का शीर्षक निश्चय और इसका ब्लर्ब स्वयं संजीव ने लिखा है। उन्होंने आगे कहा कि डी. एम. मिश्र ग़ज़ल की उस बड़ी दुनिया के ग़ज़लकार हैं जो उर्दू व हिन्दी की साझी संस्कृति से बनी है। मौजूदा दौर ऐसा है जब हर अच्छी चीज को गंदला किया जा रहा है। डी. एम. मिश्र की ग़ज़लों के आईने में इसे देखा जा सकता है। इसके अहसास को महसूस किया जा सकता है। इनकी गजलों में जो रवानगी और उदात्तता है, वह इन्हें बड़े शायरों से जोड़ती है। इनकी नजर इस हत्यारे समय पर है। उनके अन्दर परिवर्तन की चाह और मानवद्रोही हालात के प्रति आक्रोश है। वे कहीं से निराश नहीं हैं। वे जूझते हैं और कहते हैं ‘लंबी है ये सियाहरात जानता हूँ मैं/ उम्मीद की किरन मगर तलाशता हूँ मैं।’ कवि डी. एम. मिश्र जहां अपनी शायरी में इस उम्मीद को जिलाए रखते हैं, वहीं अपने लिए और बेहतर की उम्मीद को भी बनाए रखते हैं।


संजीव के अध्यक्षीय वक्तव्य के पूर्व विशिष्ट अतिथि साहित्यिक पत्रिका ‘युगतेवर’ के संपादक और साहित्यकार कमल नयन पांडेय ने डॉ. मिश्र को एक साधक कवि बताया। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें सिद्ध कवि नहीं कहता, क्योंकि वे स्वयं शब्द को साधना तक ले जाने की बात करते हैं। श्री पांडेय ने कहा कि कविता दूर और देर तक तभी टिक सकती है, जब उसमें श्रवणशीलता हो। उसे याद किया जा सके। ग़ज़ल को सीमित दायरे में रखना भी ठीक नहीं है। ग़ज़ल का दायरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। उन्होंने ग़ज़ल के सफर पर रोशनी डालते हुए कहा कि ग़ज़ल जब अरबी से फारसी तक पहुंची तो उसे एक चेहरा मिला। यही ग़ज़ल जब उर्दू के पास आई तो खूब फली-फूली। ग़ज़ल जब हिन्दी के पास आती है तो जनता की सांस-सांस से जुड़ती है। ग़ज़ल बाहरी और आंतरिक दोनों चीजों को बदल देती है। ग़ज़ल कविता के शीर्ष पर है।
वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि श्री मिश्र की रचनाओं में मार्मिकता और संवेदनशीलता बहुत दिखी। उनकी इन पंक्तियों को ही देखिये, ‘जवानी थी कमाता था तो देता था तुम्हें बेटा, बुढ़ापा आ गया तो मांगता हूँ क्या करूं बेटा।’ एक दिन उनकी लिखी पंक्तियाँ चुनाव के दौरान युवक को बोलते हुए सुना तो लगा कि कुछ तो बात है। ये पंक्तियाँ थीं, ‘जब तक दारू नोट नहीं, तब तक कोई वोट नहीं।’ शिवमूर्ति ने उनकी पांच शेर वाली एक रचना से दो पंक्तियाँ निकालीं और कहा कि इन दो पंक्तियों से भी पूरी बात कही जा सकती है तो ज्यादा लंबा खींचने की जरूरत नहीं। कवि एवं गायक डॉ. हरिओम ने कहा कि ग़ज़लें पढ़ने के बाद लगा कि श्री मिश्र यथार्थ के करीब हैं। सरकारी योजनाओं की तह तक जाने की कोशिश की है। उन्होंने आभासी यथार्थ को बहुत बहादुरी से पेश किया है। यह कोशिश करें कि यथार्थ की परतों में भी उतरें।


वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि सुभाष राय ने कहा कि अच्छी कविता के लिए संगीत का होना जरूरी है। संगीत के जरिए बहुत आसानी से लोगों तक पहुंच सकते हैं। संग्रह को पढ़ने के बाद लगा कि श्री मिश्र आइना लेकर चलते हैं, जो खुद भी देखते हैं और दूसरों को भी दिखाते हैं। इस मायने में शीर्षक बहुत महत्वपूर्ण है। चेहरा बदलने का भाव भी नजर आता है। वह राजनीतिक विद्रूपताओं पर लगातार हमले करते नजर आ रहे हैं। मशहूर शायर ओमप्रकाश नदीम ने ‘हवा के साथ उड़ने का…’ और अंधेरा जब मुकद्दर बनके…’ जैसी रचनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि इनमें उम्मीद की किरन नजर आती है। आशावादी दृष्टिकोण दिखता है। श्री मिश्र की फिक्र का अहम हिस्सा जनपक्षधरता है। वह हिन्दुस्तानी जबान का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। भाषा के मुहावरों की गलतियां कुछ जगहों पर जरूर हैं, फिर भी उनकी ग़ज़लें खुद ही बोलती हैं।
संचालन कर रहे जन संस्कृति मंच के प्रदेश अध्यक्ष एवं कवि कौशल किशोर ने बताया कि डी. एम. मिश्र की कविता की पहली किताब 27 साल पहले ‘आदमी की मुहर’ आई थी। अब नौवां ग़ज़ल संग्रह सामने आया है। इसमें उनकी 109 ग़ज़लें शामिल हैं। डी. एम. मिश्र हिन्दी ग़ज़लों की उस परम्परा से जुड़ते हैं जो दुष्यन्त कुमार, अदम गोण्डवी, शलभ श्रीराम सिंह से आगे बढ़ी। इनकी कविताएं प्रेम, करूणा के साथ प्रतिरोध और अन्याय के प्रतिकार को स्वर देती हैं तथा व्यवस्था की विद्रूपता को उदघाटित करती है। यह ऐसा आईना निर्मित करती है, जिसमें आवेग व त्वरा है जिसमें हम अपने को देख सकते हैं, अपने समय और बदलते दौर को देख सकते हैं। हमारा लोकतंत्र किस तरह लूटतंत्र में तब्दील हो गया है, आम आदमी तबाह बर्बाद किया जा रहा है इस सच्चाई को सामने लाती है। मौजूदा सियासत के प्रति इनकी ग़ज़लों में गहरे नफरत का भाव है, वहीं आम जन व उसके श्रम-सौंदर्य के प्रति अथाह प्यार है। इनकी ग़ज़लों में इस सौंदर्य का भाव देखते ही बनता है जब वे कहते हैं ‘बोझ धान का लेकर वो जब हौले-हौले चलती है/धान की बाली, कान की बाली दोनों संग-संग बजती है’।


इस अवसर पर गिरीशचंद्र श्रीवास्तव, दयाशंकर पांडेय, नसीम साकेती, सुधाकर अदीब, ज्ञानप्रकाश चौबे, राकेश, विजय राय, राम किशोर, नाइश हसन, संध्या सिंह, श्याम अंकुरम, केके वत्स, तरुण निशांत, कल्पना, आदियोग, लालजीत अहीर, एसके पंजम, प्रज्ञा पांडेय, अजीत प्रियदर्शी, महेश चंद्र देवा, सुशील सीतापुरी बी. पी. शुक्ल आदि उपस्थित रहे।

प्रस्तुति- वि‍मल कि‍शोर
संपर्क- एफ- 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ – 226017

 


- सुरेन बिश्नोई