प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

मुस्लिम समाज की चिंता और हंस: सुमित कुमार झा


भारतवर्ष अनेकता में एकता को स्थापित करने का विश्वास दिलाने वाला एकमात्र राष्ट्र हैI अनेक धर्मों के होने के उपरांत भी दो ही धर्म सर्वथा विचार और विमर्श के मुद्दे बने रहेI शायद यही कारण रहा होगा की कबीर ने भी विचार करते हुए लिखा-

हिन्दू मुआ राम कही, मुसलमान खुदाईI
कहे कबीर सो जीवता, जे दुहु के निकट न जाईII

इन दो धर्मों के सांप्रदायिक टकराव के कारण जिन समस्याओं का सामना लोगों ने किया था, हंस पत्रिका ने अपने विशेषांकों के द्वारा उसकी एक छवि प्रस्तुत करने का प्रयास कियाI इस प्रयास का उद्देश्य मुस्लिम समाज की समस्याओं से देश को रूबरू कराना थाI


राजेन्द्र यादव जी मुस्लिम समुदाय को भी 'हंस' के विमर्श में ले आयेI अगस्त 2003 का विशेषांक 'भारतीय मुसलमान: वर्तमान और भविष्य' शीर्षक से प्रकाशित हुआI हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक विशेषांक के माध्यम से भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यक को लेकर विचार-विमर्श हुआI इस विशेषांक का जोरदार स्वागत हुआI अतिथि संपादक की जिम्मेदारी हिंदी के सशक्त उपन्यासकार असगर वजाहत साहब ने संभालीI राजेन्द्र यादव ने नए लेखकों को लिखने के लिए प्रेरित कियाI नए लेखक स्वातंत्रयेत्र कालीन समस्याओं को लेकर कुछ लिखना चाहते थे और समाज में स्थित व्यवस्था को शब्दों में बांधना चाहते थेI राजेन्द्र यादव ने नए लेखकों की मानसिकता को विचार में लेकर अगस्त 1986 से 'हंस' का संपादन करना शुरू कियाI विगत ढाई दशक की लम्बी यात्रा 'हंस' के लिए विचार-मंथन की यात्रा दृष्टिगोचर होती हैI स्वयं राजेन्द्र यादव कहते हैं कि- "इस समय हम एक भयानक रचना विरोधी दौर से गुजर रहे हैंI साहित्य में ही नहीं पूरे आर्थिक और औद्योगिक सोच में भीI अपनी ज़मीन और ज़रुरत से चीजों का विकास न करके आसान लगता है विकास को आयात कर लेनाI वैचारिक, रचनात्मक और आर्थिक क्षेत्रों के आसान रास्ते हमें दरिद्र, कर्जदार और परोपजीवी बनाते हैंI इस माहौल में एक रचना मिश्रित पत्रिका की बात दुस्साहसिक प्रयोग ही हैI लेकिन कोई नहीं जानता कि कब कौनसा प्रयोग 'सही सुर' पकड़ लेI रचना और विचार के प्रति विनम्र सम्मान और सरोकार ही 'हंस' की आधारनीति हैI" 1

राजेन्द्र यादव ने विगत ढाई दशक से इस आधारनीति को अपनाते हुए ही ‘हंस’ का संपादन किया थाI कहना ज़रुरी नहीं कि अपने रचनाकाल में राजेन्द्र यादव ने 'हंस' को जनचेतना का प्रगतिशील मासिक बना दियाI यह रचनाकाल सांस्कृतिक संकट का रहा है, देश का जनमानस अन्दर ही अन्दर घुमड़ रहा है और सत्ता केन्द्रित राजनीति ने देश को भंवर में फंसा दिया हैI ऐसे रचनाकाल से गुजरते हुए 'हंस' ने एक साहित्यिक पत्रकारिता का मंच खड़ा कियाI स्वाधीनता संघर्ष में कमाए गये मूल्य एक एक कर हमारे हाथों से फिसल रहे थे कि उसी वक्त राजेन्द्र यादव ने 'हंस' के माध्यम से इन मूल्यों की रक्षा हेतु प्रयास कियाI राजेन्द्र जी द्वारा सम्पादित 'हंस' अगस्त 2003 का अंक 'भारतीय मुसलमान: वर्त्तमान और भविष्य' विशेषांक इन्हीं मूल्यों को हमारे सामने प्रस्तुत करता हैI भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श छेड़ने का श्रेय हिंदी पत्रकारिता में 'हंस' पत्रिका को जाता हैI इसे मानना होगा विवेच्य विशेषांक में पिचानवे प्रतिशत से अधिक मुस्लिम अल्पसंख्यक लेखक, इस्लामिक स्टडीज, इतिहास, समाजशास्त्र, अंग्रेजी, उर्दू और पत्रकारिता के अध्येताओं की रचनाएँ प्रकाशित हुई हैंI हिंदी पत्रकारिता में ऐसा चित्र पहली बार दिखाई दियाI इस संदर्भ में राजेन्द्र यादव का कथन दृष्टव्य है- "जैसे ही हमने विशेषांक की घोषणा की कि लेखों का सिलसिला शुरू हो गयाI अधिकांश गैर-मुस्लिमों का उत्साह देखने लायक थाI नामवर सिंह, शमीम हनफी और शम्शुर्रहमान फारुखी की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए हमें बार-बार याद दिलाना पड़ा कि चाहे स्त्री हो या दलित हम संसार के हर विषय के विशेषज्ञ हैं, कुछ उन्हें भी तो बोलने दिया जाये जिनकी यह समस्या हैI आप देखेंगे कि विशेषांक में पिचानवे प्रतिशत उन्हीं की रचनाएँ हैI" 2

विवेच्य विशेषांक में प्रकाशित अधिकतम रचनाएँ मुस्लिम लेखकों द्वारा लिखी गयी हैंI तेरी मेरी उसकी बात, अतिथि संपादक की कलम से, मुस्लिम समाज: विचार और जीवन, कविताएँ/ नज़्म/ ग़ज़लें, कथा जगत की बाग़ी मुस्लिम औरतें आदि उपशीर्षक मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श का परिचय देते हैंI मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श को 'हंस' के माध्यम से यादव जी ने साहसिक और सार्थक ढंग से उजागर किया और साथ ही पुनरुत्थानवादियों को दो टूक जवाब दियाI 'हंस' ने अपनी रचनाओं द्वारा समाज को मानसिक रूप से जीवित रखने का प्रयास किया है और अपनी एक विचारधारा बनायी हैI इस विचारधारा से पाठक समाज में फैली बुराइयों से लड़ने के इरादे को और मजबूत कर रहे हैंI राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित अगस्त 2003 के विशेषांक में मुस्लिम पीड़ितों और शोषितों के प्रति एक सहज स्वाभाविक चिंता की परंपरा अपनाई हैI इसलिए यह जुझारूपन की परंपरा भी हैI इसमें समझौते और अवसरवाद के लिए जरा भी गुंजाईश नहीं हैI 'हंस' की भूमिका नये जीवनमूल्यों के निर्माण में उसके योगदान, उच्चस्तरीय रचनात्मक हस्तक्षेप, उसका आन्दोलनकारी तेवर और आज के ज़माने की मांगों को उजागर करती हैI 'भारतीय मुसलमान: वर्त्तमान और भविष्य' शीर्षक वास्तव में मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज का एक्स-रे हैI

मुस्लिम समाज के सामाजिक आचार-विचार और संस्कार आदि पर मुस्लिम रचनाकारों ने अपनी बात रखी हैI वह अधिक प्रासांगिक लगती हैंI विशेषांक के सन्दर्भ में अतिथि संपादक असगर वजाहत का कथन दृष्टव्य है- "हंस के प्रस्तुत विशेषांक का उद्देश्य न केवल मुस्लिम समाज की गहरी पड़ताल करना है बल्कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदायों के बीच संवाद की स्थिति भी पैदा करना हैI निश्चित रूप से जानकारी के अभाव में अविश्वास पैदा होता है, जिनके कारण सांप्रदायिक शक्तियों को घृणा और उन्माद फैलाने का मौका मिल जाता हैI सांप्रदायिक शक्तियों और दलों को छोड़कर पूरा देश यह मानता है कि सम्प्रदायिकता और हिंसा से किसी तरह की कोई समस्या नहीं सुलझ सकती बल्कि साम्प्रदायिकता देश के विकास, एकता और अखंडता के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा हैI" 3 कहना सही होगा कि सांप्रदायिक शक्तियों को 'हंस' के माध्यम से खदेड़ा है और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को मुख्यधारा में लाने का प्रयास हुआ ऐसा परिलक्षित होता हैI
राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित 'हंस' का रचना परिवेश धार्मिक कट्टरपन, नैतिकता का ऊँचा आदर्श, बड़े-बूढों के नियंत्रण में विवाह, बाल-विवाह आदि मान्यताओं के ऊँचे दुर्ग तोड़ता हुआ परिलक्षित होता हैI समसामयिक चेतना तथा आधुनिक भावबोध विवेच्य विशेषांक के रचना परिवेश में निर्मित रचनाओं में गहराई से उभरा हैI मुस्लिम रचनाकारों ने सामाजिक विषमता और राजनीतिक संघर्ष के उद्घाटन से सामाजिक चेतना को प्रस्तुत किया हैI भारतीय मुस्लिम समाज की समस्याएं और चिंताएं पाठकों के सामने रखना इस विशेषांक का प्रमुख उद्देश्य रहा है "किसी भी देश में जब धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या राजनीतिक सन्दर्भ में की जाती है तो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का वर्गीकरण कई आधारों पर किया जाता हैI धर्मनिरपेक्षता के सन्दर्भ में अल्पसंख्यकों को धार्मिक आधार पर ही रखा जा सकता हैI भारत में यूँ तो अनेक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय हैं परन्तु मुस्लिम समुदाय के अतिरिक्त अन्य समुदायों की संख्या इतनी कम है कि देश की राजनीति में वे महत्वपूर्ण कारक नहीं बन पाएI" 4


मुस्लिम समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के साथ-साथ राजनीतिक और धार्मिक स्थिति भी इतनी अच्छी नहीं रही हैI अतहर फारुखी, असगर अली इजिनीयर, परवेज़ अनवर, जोया हसन और नसरीन हुसैन आदि मुस्लिम चिंतकों ने विवेच्य विशेषांक में अपने विचार मुस्लिम समाज के सन्दर्भ में रखे हैं, जो आज अधिक प्रासंगिक लगते हैंI "धार्मिक अनुभूति स्वतः प्रमाण हैI वह स्वतः सिद्ध हैI वह अपना परिचय स्वयं देती है लेकिन धार्मिक द्रष्टाओं को अपने आतंरिक विश्वासों को इस तरह प्रमाणित करना पड़ता है कि वे विश्वास युग की विचारधारा को संतुष्ट कर सकेंI" 5
भारतीय मुस्लिम समाज की विचारधारा परिवर्तनकामी परिलक्षित होती हैI भारतीय मुस्लमानों का आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ापन ही अनेक समस्याओं का कारण है, इस बात को मानना होगाI सीताराम येचुरी कहते हैं कि- "भारतीय मुसलमानों का भविष्य धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर निर्भर करता हैI यदि भारत में धर्मनिरपेक्षता सफल रहती है, तब ही भारतीय मुसलमानों को बराबर के अधिकार मिल सकते हैं और मिलेंगेI" 6


सम्पूर्ण भारतीय समाज में सहिष्णुता निर्माण का कार्य होना आवश्यक हैI सहिष्णुता के कारण सामाजिक शांति स्थापित हो सकती हैI 'हंस' के विवेच्य विशेषांक में भारतीय मुस्लिम समाज की गरीबी, दुर्दशा, अन्धविश्वास और कुरीतियों, कर्ज के बोझ से दबे हुए किसानों उनके तीज-त्योहारों और सरल तथा निश्छल जीवन का वर्णन कर पाठकों के सामने सामाजिक चेतना के तत्व प्रस्तुत करने का प्रयास है इसमें "लोकतान्त्रिक समाज व्यवस्था के शिक्षा नागरिकों में विचार व्यक्त करने, भाषण करने, सभा आयोजित करने, संगठन बनाने, कहीं भी निवास करने, व्यवसाय-व्यापार, पेशा करके जीविका कमाने, अपने धर्म-उपासना पद्धति का पालन करने की स्वतंत्रता देती हैI प्रत्येक नागरिक में भाईचारे व एक दूसरे के प्रति आदर, विश्वास एवं सहयोग कि भावना का संचार होI शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ‘न्याय’ दिलाने का मार्गदर्शन देI" 7 कहना आवश्यक नहीं कि शिक्षा के कारण ही सामाजिक परिवर्तन संभव हो रहा हैI भारतीय मुस्लिम समाज का शैक्षणिक परिदृश्य कमजोर दृष्टिगोचर होता हैI मुस्लिम समाज में शिक्षा का महत्त्व स्थापित करने के लिए जो नए प्रयास हो रहे हैं उनका विस्तार के साथ उक्त विशेषांक में विवेचन हुआ हैI

जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति सय्यद शाहिद मेहदी, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति नसीम अहमद, हेडलाइन प्लस की संपादक शीबा फहमी, हबीब तनवीर आदि मुस्लिम विचारकों ने भारतीय मुस्लिम समाज की सच्चाइयों को पाठकों के सामने रखा हैI कैफ़ी आजमी, मोहम्मद अल्वी, अरमान नजमी, असलम हसन, रशीद तराज़ जैसे मानवतावादी साहित्यकारों की कविताएँ, नज़्म और ग़ज़लें भारतीय मुस्लिम समाज का सामाजिक सच सामने रखती हैंI 'मेरे आका' तहमीना दुर्रानी 8, 'पहला सजदा' किश्वर नहीद 9, 'मेरे बचपन के दिन' तसलीमा नसरीन 10 का आत्मकथ्य समकालीन मुस्लिम समाज की व्यवस्था को हमारे सामने रखता हैI

अतः कहना उचित होगा कि राजेन्द्र यादव और 'हंस' का यह प्रयास भारतीय मुस्लिम समाज की व्यवस्था के यथार्थ  को प्रस्तुत कर एक सुनहरे भविष्य के लिए सही मार्ग का निर्माण करना थाI यह प्रयास भारतीय मुस्लिम समाज के भविष्य के लिए निश्चित ही सही मार्गदर्शक तत्व बनेगाI



सन्दर्भ सूची-
1. सं. राजेन्द्र यादव, हंस, अंक अगस्त 1986, पृष्ठ-05
2. सं. राजेन्द्र यादव, हंस, अंक अगस्त 2003, पृष्ठ-04
3. वही
4. मणिशंकर प्रसाद- धर्म, धर्मनिरपेक्षता और राजनीति, पृष्ठ-178
5. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन- धर्म और समाज, पृष्ठ-12
6. सं. राजेन्द्र यादव, हंस, अंक अगस्त 2003, पृष्ठ-107
7. डॉ. एल.एन. शर्मा, भारत में शिक्षा के सामाजिक आधार, पृष्ठ- 24
8. सं. राजेन्द्र यादव, हंस, अंक अगस्त 2003, पृष्ठ-139
9. वही, पृष्ठ- 146
10. वही, पृष्ठ-149

 


- सुमित कुमार झा
 
रचनाकार परिचय
सुमित कुमार झा

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