अक्टूबर 2016
अंक - 19 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

बेटी का अपशगुन

भागम भाग ले जाती हुई
एक निर्भागी लड़की की अर्थी
ना "राम नाम सत्य है" की आवाज़
ना बहुत बड़ी टोली पीछे
बस जल्द से जल्द
अंतिम संस्कार के इंतजाम में
जुटे हैं चंद आदमी
ना रिश्तेदार बुलाये
ना पड़ोस में बात छिड़ी
ना माँ ने चूं की
ना बाप सिसका
कुछ पहले फाँसी से उतारी
अब चल दी राख होने को
गुनाह बस ये रहा
शादी से पाँच दिन पहले
कार्ड बांटने गया मंगेतर
सड़क दुर्घटना में मारा गया
पड़ा रहा रात भर सड़क किनारे
लोग आते रहे ,जाते रहे
जाने कहाँ मर गयी संवेदना
लोग हैं या पत्थर!
मदद कोई नहीं करता
तमाशा सब देखते हैं
लुटा एक घर का लाल
मगर कोसा सबने लड़की को
अपशगुनी,निर्भागी कहा
"खा गयी शादी से पहले ही
तू मर जाती उसकी जगह
अब कौन करेगा तुझसे रिश्ता"
ज़मीन में गड़ी वो लड़की
ब्याही रही ना कुँवारी
उठा शादी की चुनरी
विवाह कर गयी मौत से
और ले गये घर वाले
चुपचाप उठाकर
कहीं पुलिस न आ जाये
फूँक आये मिनटों में
बेटी का अपशगुन


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सम्मान


छाती तक घूंघट ताने
नन्ही बिटिया संग
बानो पैर घसीटती
कहीं जा रही थी
मैंने रोक कर पूछा,
"बानो कहाँ जा रही हो?"

वो हँसकर बोली,
"दीदी स्कूल जा रही हूँ
बुलाया है
15 अगस्त पर हम माँ बेटी को
सम्मानित करेंगे
इस साल जिन्हें बेटी हुई है
उनका सम्मान होगा।"

मैं बोली, "तो पैर क्यूँ घसीट रही हो?"
बानो बोली,
"दीदी कल ये आते ही खाना माँग रहे थे
छुटकी रो रही थी
मैं दूध पिलाने लगी
तो जूते समेत पैर मारा ज़ोर से।"


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आखिरी दर्द

दसवां महिना
पहला बच्चा
और आखिरी दर्द,
डरती बानो
पति से बोली,
"बहुत डर लग रहा है
जाने कैसे होगा"
पति ने झिड़का,
"तू कोई न्यारा जनेगी
दुनिया के होते हैं"

करहाती पहुँची सरकारी अस्पताल
लेबर रूम,
अनजान नर्सें,
तेज उठते दर्द
चीख उठी सत्रह बरस की बानो
नर्स ने एक मारा थप्पड़
और बोली,
"चुप कर हरामजादी!
चिल्लाती है
क्यूँ सोयी थी खसम के साथ
तब नहीं रूका गया"

बानो ने होंठ भींच लिये,
मुट्ठियाँ कस लीं
और तोड़ दी पेट से
एक ओर बानो
फिर हर महीने टपकने को
फिर लेबर रूम में तड़पने को


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मैं और धरा

मैं और धरा एक-सी
हँसती-खिलती चुपचाप-सी
किसी बात पर निराश-सी
कभी प्रेम से पूजा गया,
कभी टुकड़ों में काटा गया,
कस्सियां चलीं कभी,
कभी दान में बाँटा गया,
खोदा गया,
रोपा गया,
कभी पूछकर
बोया गया
कुछ ना उगा पायीं तो
बंजर कह छोड़ा गया

दिनभर थूका पीक मुझ पर
फिर रात को धोया गया
मेरी मखमली घास पर
रखे आदमी सिर तान कर
रौपता है बीज अपने
बस वंश अपना मानकर

सुन आदमी!
अब धरा पर जलजले भी आएँगे,
डूबेगा तेरा आशियाँ
जब तेवर खींचे जाएँगे
मत चलवा कैंचियाँ कोंख पर
वरना मैं और धरा दोनों फट जाएंगे
चटकेंगे ये अम्बर-तारे
घर पानी में बह जाएंगे


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मजबूत नींव


तुम्हारा क्रोध मुझपे
अहंकार है तुम्हारा
बात बिन बात
हक समझते हो
यूं ताड़ना
तुम्हारे संस्कार हैं
जो पूर्वजों से लाये हो
खुश तो होते होगे तुम
औरत को डरा कर।

सुनो!
मेरी चुप्पी कोई डर नहीं,
ये संस्कार हैं
रिश्तों को बाँधे रहने के
मेरी चुप्पी हार नहीं,
जीत है ये
संबंधों पर
मेरी चुप्पी संयम है
तेरे अमानवीय होने पर।
और फतह है
घर को घर बने रहने पर

मैं कमज़ोर नहीं,
मजबूत नींव हूँ
तेरे शीशे के घर की।

 


- सुनीता करोथवाल

रचनाकार परिचय
सुनीता करोथवाल

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