प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2016
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
हिंदी का पुनर्प्रतिष्ठा काल
 
 
वर्तमान समय को हिंदी का पुनर्प्रतिष्ठा काल कहना अधिक उचित प्रतीत होता है क्योंकि आज इसकी लोकप्रियता और साख पूरे विश्व में व्याप्त है। तमाम व्यावसायिक कंपनियां अपने विज्ञापनों में हिंदी का गर्व के साथ प्रयोग कर सफल हो रहीं हैं। वे जनता की नब्ज़ को अच्छे से जान इसका पूरा लाभ ले घर-घर पहुँच चुकी हैं। यद्यपि इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि भारत में अंग्रेज़ी को हमेशा से ही अधिक मान मिलता रहा है। यह हमारी 'अतिथि देवो भवः' की सभ्यता का परिणाम है या कुछ और, इस पर वर्षों से मनन, चिंतन होता आया है। निश्चित रूप से अंग्रेजी, भाव प्रेषण और अभिव्यक्ति के माध्यम की स्वीकृत वैश्विक भाषा है और इसे जानना भी उतना ही आवश्यक है जितना हिंदी को। दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि हम भारतीयों ने आंग्ल भाषा को बुद्धिमत्ता से जोड़कर हिंदी की मिट्टी पलीद करने में कोई क़सर नहीं छोड़ी और परिस्थिति इतनी गंभीर हो गई कि हिंदी माध्यम से पढ़े विद्यार्थियों को हेय दृष्टि और अंग्रेजी माध्यम वालों को अतिरिक्त सम्मान के साथ देखा जाने लगा। हमारे इसी सौतेले व्यवहार ने हिंदी भाषियों के आत्मविश्वास में कमी के साथ उनके ज्ञान पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। सर्वविदित है कि भाषा ज्ञान रुपी सागर में गोते लगाने का मात्र यंत्र भर है।
 
अंग्रेजी के आधिपत्य ने कई प्रतिभाओं को कुंठित-सा कर दिया था। सब कुछ जानने-समझने के बावजूद भी कई मेधावी एवं योग्य पात्र इस कारण पीछे रह जाते थे क्योंकि उनकी भाषा में हर स्तर पर लिखना-पढ़ना संभव न था।
बदलते समय ने बहुत कुछ बदला और अब इस वस्तुस्थिति को भलीभांति समझा जाने लगा है कि ज्ञान किसी विशेष भाषा का मोहताज़ नहीं होता। पहले तकनीकी दुनिया में तमाम परेशानियों के चलते अंग्रेजी का ही बोलबाला था लेकिन अब हर जानकारी हिंदी में उपलब्ध होने के कारण सोशल मीडिया से अधिकाधिक लोग जुड़कर, हिंदी का निस्संकोच प्रयोग कर गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। तमाम वेबसाइट्स हैं जो हर भाषा में जानकारी उपलब्ध करा उन उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित कर रही हैं जो स्वयं को हीन समझ कहीं दूर सुप्तावस्था में चले गए थे। ये सभी अब जागृत हो, अपनी भाषा के प्रयोग से अपना भविष्य संवारने में लग गए हैं। जिन दरवाजों पर दस्तक़ देने से उन्हें पहले हिचकिचाहट हुआ करती थी, अब उनमें सुरक्षित प्रवेश कर चुके हैं।
 
बीते दशक में जो संकोच प्रत्यक्षत: दिखता था, इन दिनों विलुप्त हो चुका है तथा विज्ञान और तकनीक भाषाई बंधनों से मुक्त हो, शहर से निकल गाँव, कस्बों की गलियों में गुनगुना रहे हैं। अपना नाम हिंदी में रख, यूजर गर्व का अनुभव करते हैं। मोबाइल, कम्प्यूटर और तमाम गैजेट्स में हिंदी अपनी पैठ बना चुकी है। हमारी अपनी भाषा से जुड़ी पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाओं ने पाठकों का मन मोह लिया है। ये हिंदी की ताक़त ही है कि अब यह विश्व में चौथी लोकप्रिय भाषा बन जन-जन के हृदय में बस चुकी है। हर स्थान पर इसकी उपस्थिति स्पष्ट तौर पर दृष्टिगोचर होने लगी है तथा अन्य देशों के नागरिकों में भी इसे सीखने की इच्छा जागृत हो रही है।
 
अंतरजाल के अधिकाधिक प्रयोग, मान्यता और इस पर हिंदी की उपलब्धता ने उन लोगों में भी इस भाषा के प्रति रुझान उत्पन्न कर दिया है, जो पहले इसे इतना रुचिकर नहीं समझते थे। कितने ऐसे उदाहरण हैं जो सोशल साइट्स पर आने के बाद 'लेखक' बनकर उभरे हैं। कइयों की हिंदी अब पहले से बेहतर हो गई है क्योंकि इससे सम्बंधित साइट्स के शब्दकोष या अनुवाद हिंदी को न सिर्फ उसके मूल रूप में प्रस्तुत करते हैं बल्कि इसके सही उच्चारण और अर्थ की भी उदाहरण सहित व्याख्या करते हैं। ब्लॉगिंग (चिट्ठा-लेखन) की दुनिया में हिंदी का वर्चस्व है। ई-पुस्तक, वेब पत्रिकाएँ एवं देश के सभी मुख्य समाचार-पत्र अब हिंदी में ऑनलाइन पढ़े जाते हैं।
 
आशा तो यही है कि जैसे हमारे लिए अंग्रेजी जानना अच्छा रहा, वैसे ही हमारी हिंदी भी अन्य देशों के लिए लाभदायी हो। हमारी भाषा का भी उतना ही सम्मान हो, जितना हम अन्य भाषाओं को देते रहे हैं। हिंदी का मजाक बनाती एवं इसकी आलोचना से भरपूर सामग्री भी यदा-कदा दिख जाती है। ऐसे लोगों को इस मानसिकता से उबरना अत्यंत आवश्यक है कि उनकी श्रेष्ठता किसी को नीचा दिखाकर या निकृष्ट कह देने से सत्यापित नहीं हो जाती बल्कि सबको उसके हिस्से का सम्मान देने से ही मिलती है। हिंदी की अच्छाई इसकी सरलता, सहजता और ग्राह्यता है। ये हमारी धरोहर है, हम  हिंदी में सोचते, बोलते, लिखते और पढ़ते हैं इसीलिए इसे आसानी से प्रयोग में ला पाते हैं। लेकिन यदि कोई इसका अपमान करे तो हमारा कर्त्तव्य और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि ऐसी सोच का विरोध किया जाए। जिसका हम स्वयं ही उपहास करें, तो औरों से उसके सम्मान की उम्मीद कैसे की जा सकती है! अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति से जुड़ना किसी भी परिस्थिति में कमतर नहीं आंका जा सकता।
 
हिंदी का सम्मान बनाए रखने के साथ हमें यह भी ध्यान रखना है कि इसका मूल रूप भी संरक्षित रहे। उर्दू, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी के शब्दों को हमारी भाषा ने अत्यंत अपनेपन के साथ स्वीकृति दी है और आम बोलचाल में इनकी उपस्थिति मिठास ही भरती है लेकिन जब 'हिंदी साहित्य' की चर्चा हो, तो हमें इनकी बहुलता से बचना होगा कि हिंदी का अस्तित्व यथावत रहे।
हिंदी ने हमें हमारी भाषा दी, अभिव्यक्ति का सहारा बनी, हमारे जीवन से साँसों की तरह बिंध गई है 'हिंदी'
अब हम सबकी बारी है, यह सोचने की.....
कि हमने हिंदी को क्या दिया? इसके उत्थान के लिए और क्या कर सकते हैं?
 
जन्म हिंदी, स्वप्न हिंदी
मन,वचन, सुख, कर्म हिंदी
जीवन की लय, शब्दों की तान
भावों का हर मर्म हिंदी 
 
गौरव बनी, सम्मान है
ये स्नेह पथ का राग है
वीणा की धुन, जैसे शगुन
भाषा नहीं, अनुराग है
 
बोल हिंदी, जान हिंदी
तेरा-मेरा कर्त्तव्य हिंदी 
आओ, चलो संकल्प लें
राह भी और लक्ष्य हिंदी
 

- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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