प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2016
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल की बात

ग़ज़ल की बात (किश्त 8)


साथियो नमस्कार,

ग़ज़ल की बात की आठवीं किश्त आप सभी ग़ज़ल प्रेमियों को समर्पित है। इस किश्त में हम ग़ज़ल की भाषा की बात करेंगे। मैं कोई बड़ा ग़ज़लकार नहीं हूँ, केवल ग़ज़ल साधक भर हूँ, इसलिए मैं किसी धारणा एवं मत को स्थापित न करते हुए केवल अपना अनुभव साझा कर रहा हूँ। मेरे अध्यन्न में आई लोकप्रिय ग़ज़लों में मुझे भाषा का सरलतम स्वरूप मिला है।

* ग़ज़ल के मिसरे सरल और गद्यात्मक होने चाहिए, छंद से उनकी गति मंद न हो। देखें–
तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ
यह मिसरा किसी प्रेमपत्र की गद्यात्मक पंक्ति जैसा सरल और प्रवाहित है।
छंद 122 – 122 – 122 – 122 इसकी गति में बाधक नहीं है।


* ग़ज़ल में जो सहज ध्वनित हो, वही वर्ण-विन्यास रहे तो ज्यादा अच्छा है। ग़ज़ल लिखी नहीं जाती, कही या गाई जाती है, अतः सरल उच्चारण रहना चाहिए। जैसे स्कूल, स्मार्ट, हॉस्पिटल आदि बोलने पर इस्कूल, इस्मार्ट, अस्पताल से उच्चारित होते हैं।
मध्कालीन कवि जनकवि थे, उनकी भाषा के दोहे और भजन आज भी संस्कृत के श्लोकों से ज्यादा लोकप्रिय है। भारतेंदु के बाद जो हिंदी सामने आई, उसमें छायावादियों और मुक्तछंद वालों ने काफ़ी विद्वतापूर्ण लेखन किया। लेकिन गाँव में लोक में आज भी मीरा– सुर– दादू– तुलसी– कबीर ही गुनगुनाए जाते हैं।


* ग़ज़ल में तद्भव शब्दावली का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है। ग़ज़ल में शब्द का उच्चारण वह नहीं हो जो शुद्ध प्रमाणिक शब्दकोश में लिखा हो अपितु वह हो जो ठेठ देहाती भी सहजता से बोल पाए। श्लोक, आयतें आदि विद्वानों की ईश आराधना के विषय होने से भाषा के शुद्धतम दैविक रूप में हैं, जबकि ग़ज़ल, दोहे, भजन आदि जनमानस के शिक्षण के लिए होने से भाषा का लौकिक स्वरूप रहता है। पद्य में तद्भव का उत्कर्ष तुलसी के ‘मानस’ में और गद्य में तद्भव का उत्कर्ष आप रेणु के ‘मैला आँचल’ में देख सकते हैं। ये लंबी ग़ज़लें ही हैं।
उर्दू के विद्वान (ग़ज़लकार नहीं) हिंदी ग़ज़लों में आए उर्दू–फ़ारसी शब्दों की शुद्धता पर आँखें तरेरते हैं, तो हिंदी के पंडित (ग़ज़लकार नहीं) उर्दू वालों को हिंदी शब्दों को विकृत करने का उलाहना देते रहते हैं। सत्य यह है कि भाषा का लौकिक स्वरूप तो दोहों में बहुत पहले ही स्वीकार्य हो चुका है।


ब्राह्मण, बरहमिन (उर्दू शैली) होने से बहुत पहले ही ‘बामन’ हो चुका है। इसी तरह क्षत्रिय भी छत्री, वैश्य भी बेस और शुद्र भी सूद हो चुका है।
यमुना, जमुना (उर्दू रूप) होने से बहुत पहले युग= जुग, यज्ञ= जग, योग= जोग हो चुका है। य= ज ही नहीं, व= ब, ष= ख, ड़= र और ण= न भी बहुत पहले से दोहों और तुलसी के मानस में भी आ चुके हैं। यथा–
वर्षा= बरखा, वचन= बचन, वर्ष= बरस, लड़ाई= लराई, भेष= भेख, बाण= बान, पीड़ा= पीर, वन= बन आदि।
यही नहीं लोक में  ज= द भी देखने को मिला है, जैसे कागज़= कागद।
इसलिये हिंदी–उर्दू के झगड़े बेमानी हैं। ग़ज़ल लोक की होकर ही लोक कल्याणकारी हो सकती है। ग़ज़ल पढ़ने वाले कम, गाने और सुनने वाले ज्यादा हैं। देखें–
कृष्ण को प्रेम-पत्र भेजा।
किशना को पेम पाति भेजी।
पहला वाक्य किसी व्यापारी या विद्वान राज्यकर्मी का लगता है।
दूसरे वाक्य की सुन्दरता मोहित करती है और किसी विरहन या प्रेमी के भाव सहज परगट है।
अतः हमें ‘शह्र को शहर’ या ‘कृष्णचन्द्र’ को किशनचंदर कर देने की बहस में नहीं उलझना चाहिए। ग़ज़ल को सहज उच्चारित जनभाषा में ही कहा जाए।


* ग़ज़ल में मिश्र शब्दावली यानि सभी भाषाओं के शब्द, जो जनभाषा के अंग हैं, शामिल कर सकते हैं। तुलसी रामायण में आपको ग़रीब नवाज़ जैसे कई उर्दू शब्द मिलेंगे। उर्दू के रचनाकार भी मुरली, बंशी से परहेज़ नहीं करते हैं। अकबर इलाहाबादी और अदम साहब की ग़ज़लों में इंग्लिश शब्द भी सरल रूप में कहे गए हैं।

मेरे अनुभव में ग़ज़ल में निम्न विशिष्टता पाई गई है।

1) तद्भव शब्दावली
2) गद्यात्मक मिसरे
3) ध्वनित वर्ण-विन्यास
4) मिश्र शब्दावली (बहुभाषी शब्द)
5) लौकिक अर्थ
6) गेयता


तद्भव शब्दावली— ग़ज़ल ही नहीं मध्यकालीन गीतों, दोहों और भजनों में भी तत्सम के स्थान पर तद्भव शब्दों को तरजीह दी गई है। साधक सबसे ज्यादा भ्रमित  ऋ,  रेफ, पदेन, और सयुन्क्ताक्षर (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र) में होते हैं। हो भी क्यूँ नहीं, ये संस्कृत निष्ठ शब्द मध्य और रीति कालीन कवियों से लेकर भक्ति कालीन संतों सूर, कबीरा, मीरा, रैदास, नानक, दादू तक को भ्रमित करते रहे हैं। आज तो हमारी हिंदी में अंग्रेजी, अरबी, फारसी, पुर्तगाली, उर्दू आदि के अनेक पर्याय शब्द मौजूद हैं, किन्तु उन विभूतियों के पास तो संस्कृत के तत्सम ही थे। तब संस्कृत ग्रन्थों का ज्ञान आमजन तक पहुँचाने की कड़ी में तद्भव शब्दों का विकास हुआ। ग़ज़ल भी आमजन की पीड़ा की बयानी होने के कारण इसमें भी हम तद्भव के नियम लागू कर सकते हैं।

साथियों ये तद्भव के नियम आपको किसी किताब में लिपिबद्ध नहीं मिलेंगे, ये तो कवि परम्परा में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वाध्याय से पहुँचे हैं। मुझे आपके साथ साझा करके अपार हर्ष हो रहा रहा है।


ऋ के नियम--- ‘ऋ’ अगर मूल रूप में है, तो उसका तद्भव रूप रि हो सकता है। यथा- ऋण=  रिण, ऋषि =रिषी, ऋषभ= रिषभ
ऋतिक= रितिक, ऋतु= रितु।

‘ऋ’ अगर मात्रा के रूप में हो तो ( ृ ) होता है तथा छोटी मात्रा (लाम)= 1 होता है। ऐसे शब्दों का तद्भव बनाने के लिए ‘ृ’ को हटाकर वर्ण पर इ की मात्रा लगा देते हैं। यथा- कृपा= किपा, तृण= तिन (इसी से तिनका बना है)
कृष्णा=  किशना, कृपाण=  किपान,  पृथ्वी= पिथ्वी


रेफ के नियम--- रेफ में र्  हलन्त यानि आधा होता है, यह बाद वाले वर्ण के ऊपर लग जाता है। जैसे- क र् म= कर्म
रेफ के बाद का वर्ण यदि छोटी मात्रा वाला हो तो रेफ से पहले वाले वर्ण की मात्रा बड़ी करके र् को हटा देते हैं। यथा- कर्म= काम
सर्प= साप (बाद में साँप हो गया), चर्म = चाम।

यदि रेफ के बाद वाला वर्ण बड़ी मात्रा वाला हो तो र् को पूरा वर्ण करके पहले वाले वर्ण के साथ उच्चारित करते हैं। यथा- वर्षा= वर षा कालांतर में बर सा फिर बर खा
नर्मी= नर मी, सर्दी= सर दी


पदेन के नियम--- पदेन में र तो पूरा होता है, किन्तु र से पहले वाला वर्ण आधा या हलन्त होता है जैसे चक्र= च क् र
उपरोक्त रेफ के नियम पदेन पर भी लागू होते हैं। पदेन के बाद का वर्ण यदि छोटी मात्रा वाला हो तो पदेन से पहले वाले वर्ण की मात्रा बड़ी करके र् को हटा देते हैं। यथा- चक्र= चाक
यदि पदेन के बाद वाला वर्ण बड़ी मात्रा वाला हो तो र् को पूरा वर्ण करके पहले वाले वर्ण के साथ उच्चारित करते हैं, यथा- चक्री= च क् री=  चक री।
आप में जो स्वाध्यायी हैं, उन्होंने कबीर, मीरा आदि के पदों में ये तद्भव रूप देखें ही होंगे।

हमने रेफ/ पदेन और ऋ की मात्रा के तद्भव के नियम पढ़े हैं। अगर ये नियम आपकी समझ में आ गये हों तो लगभग समान नियम सयुन्क्ताक्षर पर लागू होते हैं।


सयुन्क्ताक्षर के तद्भव के नियम-- त्र (त्+र) और श्र (श्+र) के नियम--- इन दोनों में पदेन की तरह र पूरा है और र से पहले का वर्ण आधा/ हलन्त है। अतः पदेन की तरह ही इनमें भी 'र' के बाद वाला वर्ण छोटी मात्रा वाला हो तो 'र' के पहले वाले वर्ण की मात्रा बड़ी करके 'र' को हटा देंगे।
यथा- मित्र= मीत,  पुत्र= पूत, सुत्र= सूत,  पत्र= पात, गोत्र= गोत, पत्री= पाती।
यदि 'र' के बाद वाला वर्ण बड़ी मात्रा का हो तो 'र' को पूरा करके पहले वाले वर्ण के साथ उच्चारित करते हैं। यथा- छत्री= छत री, मिश्री=  मिशरी

यदि सयुन्ताक्षर शब्द के आरंभ में ही हो तो आधे/ हलन्त पर 'र' वाली मात्रा लगाकर 'र' को भूल जाते हैं। जैसे–
त्रिशूल= त् रि शूल यहाँ र के साथ इ की मात्रा है (र्+इ) यह इ की मात्रा हलन्त् त पर लगाकर र को हटा देंगे यानि
त्रिशूल = त् रि शूल= तिशूल कर देंगे। इसी तरह–
श्रमण= शमन, श्रमिक= शमिक, त्रिलोक= तिलोक।

उपरोक्त नियम संयुक्ताक्षर ‘क्ष’ पर भी लागू होते हैं। नियम लगने के बाद ‘क्ष’ को क, ख या छ कर देते हैं।
यथा- क्षमा= छमा या खमा (छमा बड़न को चाहिए)
पक्ष= पाख, अक्ष= आख फिर आँख, लक्ष= लाख।

संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ को ‘गिय’ की तरह उच्चारित होते देखा गया है। यथा–
ज्ञानी= गियानी, अज्ञात= अगियात

जिस तरह ‘ण’ को ‘न’ कर लेते हैं, उसी तरह ‘ड़’ भी ‘र’ कर लेते हैं।


अब बात करते हैं संयुक्त व्यंजन की। संयुक्त व्यंजन के लिए दो नियम स्वीकार्य कर लेने चाहिए। इनसे उच्चारण सहज हो जाएगा।
* संयुक्त व्यंजन के आधे वर्ण से पहले वाला पूर्ण वर्ण यदि लघु स्वर (अ, इ, उ) से युक्त हो तो आधे वर्ण को उसके साथ एक ही शिरोरेखा (upper line) के नीचे रखें।
यथा– रस्ता= रस ता= 2 2,  कच्चा= कच चा= 2 2, क़िस्सा= क़िस सा= 2 2
रिश्ता= रिश ता= 2 2, फिक्र= फिक र= 2 1, हिज़्र= हिज़ र= 2 1, भ्रम= भर म= 2 1 आदि।

* संयुक्त व्यंजन के आधे वर्ण से पूर्व, पूर्ण वर्ण यदि दीर्घ स्वर (आ, ई, ए, ओ, ऊ) युक्त हो तथा आधे वर्ण के बाद लघु स्वर युक्त वर्ण हो तो आधे वर्ण को पहले वाले दीर्घ वर्ण के साथ एक ही शिरोरेखा में रखें। यथा-
दोस्त= दोस त= 2 1, ताम्र= ताम र= 2 1, काष्ठ= काष ठ= काठ= 2 1

* सयुंक्त व्यंजन में आधे वर्ण के पहले और बाद में दोनों तरफ दीर्घ स्वर युक्त वर्ण होने पर, आधे वर्ण के बाद वाले वर्ण के साथ एक ही शिरो रेखा के नीचे रखते हैं। यथा–
दोस्ती= दो सती= 2 12, रास्ता= रा सता= 2 12

* उर्दू के अलिफ़ वर्ण को भी सरल करके लिखने पर वज्न (मात्रा क्रम) सही कर सकते हैं।
मुद्दा= मुद दआ= 2 12,  शमा= शम अ= 21



साथियों इन सभी नियमों की विशेषता यह थी कि मूल तत्सम का वज्न (मात्रा क्रम) पकड़ में आ जाता था और बोलने में सरलता रहती थी। वैसे भी ग़ज़ल लिखी नहीं जाती है, कही/बोली जाती है। जब हम लिपिबद्ध करें तो मूल शब्द ही लिखें, मात्रा क्रम में हुई असुविधा दूर करने के लिए इनका अभ्यास कर सकते हैं।

रोचक जानकारी---- छोटी ह (ह्  हलन्त) का कमाल आपको राजस्थानी भाषा में खूब देखने को मिलेगा। यथा-
शह्र= शहर= श ह् र= 2 1 अब राजस्थानी में शहर= सेर= 21  सही है।
हिंदी वाले इसे श हर= 1 2  में बाँधने की गलती कर जाते हैं।
इसी तरह ज़हर= ज़ह् र= 2 1  और राजस्थानी में ज़हर= ज़ेर= 21 सही है।
हिंदी वाले ज़ हर में बाँधकर इसके साथ लहर (12) काफिया भिड़ाकर उपहास के पात्र बन जाते हैं। इसी तरह बह्र= बेर, कह्र= केर, मह्र= मेर, महबूब= मेबूब और महमूद= मेमूद जैसा सुनाई पड़ता है।


दो बिंदु और याद आ रहें हैं। मध्यकालीन कवियों ने आधे क को ग तथा ण को न भी किया है। यथा–
भक्त= भग त= 2 1, बाण= बान
एक रोचक शब्द देखिए  ‘पर्ण’
रेफ़ के तद्भव नियम के अनुसार प की मात्रा बड़ी होकर र हट जायेगा अतः पर्ण= पाण हो जाएगा और ण  को न करेंगे तो पाण= पान हो जाएगा।
सही है न पर्ण= पाण= पान (पान खाए सय्याँ हमार....)


इसी तरह हिंदी का ह उर्दू में दो होता है एक छोटी ह दूसरी बड़ी ह। एक मात्रा (स्वर) की तरह लगती है। यथा–
मेहमान को दो तीन बार बोलें इसका उच्चारण मेमान की तरह हो जायेगा।
अतः मेहमान= 2 1 2 1 न होकर 2 2 1 हो जाएगा। देखें–

कन्हैया= कनैया, जुन्हाई= जुनाई, चेहरा= चेरा इसी कारन उर्दू में चेहरा= 2 1 2  न होकर चेरा=  2 2 होता है।
इसी तरह ‘खंडहर’ को दो तीन बार उच्चारण करें तो ‘ह’ का लोप होकर ‘खंडर’ ध्वनित होता है। इसी तरह ‘परवाह’ भी ‘परवा’ सा बोला जाता है।

मेरे गाँव के भायले (मित्र) मुझे महावीर की जगह मावीर, मावीर  करते रहते हैं। तब मुझे यकीन हो जाता है कि ग़ज़ल महफ़िल (मेफ़िल) की चीज़ नहीं है, ग़ज़ल आमजन के दर्द की बयानी है। बाप के घावों पर पट्टी करने वाली मासूम बेटी है।


साथियों आप अगर मंगल या यूनिकोड हिंदी फॉण्ट या गूगल हिंदी इनपुट टूल से हिंदी में टाइप करते हैं, तो आपको कई सारे तथ्य मिलेंगे।

ka= क लेकिन k= क् यानि आपको क्यारी लिखना है तो kyari लिखेंगे kayari लिखने पर कयारी आएगा यानि क्+अ= क

आपको क्ष टाइप करना है तो ksh लिखना पड़ेगा यानि क्ष= k+sh= क्+ष
इसी तरह-
त्र= t + ra= त् + र
श्र= sh + ra= श् + र
ज्ञ= gya= ग् + य (संस्कृत में ‘ज्ञ’ = ज् + ञ का उच्चारण रहा होगा किन्तु अब ‘ग्य’ ही है, हिंदी में, ज् + ञ का तद्भव ग्य मान लेना चाहिए।)

ह् (छोटी हे) एक मात्रा है यह गूगल टाइपिंग में स्वयं सिद्ध होता है-
k + h = kh = ख = क् + ह्
g + h = gh = घ = ग् + ह्
j + h= jh = झ = ज् + ह्
p + h = ph = फ = फ्  + ह्


मुझे आशा है कि यह लेख आगामी समय में हिंदी ग़ज़ल में आ रही तत्सम शब्दावली की समस्या को दूर करने में सहायक सिद्ध होगा। ऐसा हुआ तो मेरा श्रम सफल हो जाएगा।

मित्रों (मीतों) मुझे बहुत हरख है कि मैं निज रिद्य की बात आपके समख (समक्ष) रख पाया।

धनबाद (धन्यवाद)
आपका


- ख़ुर्शीद खैराड़ी