प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2016
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

दर्द भरी वादी – सुकून या सितम
कहते हैं कि वादियों में जाकर जमाने भर का दर्द दूर हो जाता है। एहसासों का ऐसा मंजर जो सिर्फ़ और सिर्फ़ वादियों में जाकर ही अपने मकाम तक पहुंचता है। लेकिन यह वादी दर्द समेटे कई कहानियां भी खामोशी के साथ कहती है। सवाल यह है कि सुकून देने वाली वादियां सितम का जब रूख अख्तियार कर लेती है तो फिर जिंदा रहते हुए भी मौत-सी महसूस क्यों होने लगती है?
 
मुझे याद है जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्राचार की पढ़ाई कर रहा था तब मैं महीने में दो या तीन बार घूमने के लिए कभी उत्तरांचल ..तो कभी हिमाचल की वादियों में चला जाता। कभी अपनी फिल्म के लिए कहानी की तलाश में निकल पड़ता तो कभी गर्म दिल्ली की ट्रैफिक की चिल्लपौं से निजात पाने के लिए लैंस डाउन पहुंच जाता। गर्मी के मौसम में एक बार मैं बस से लैंस डाउन की तरफ जा तो रहा था लेकिन बार बार खिड़की से बाहर वादियों में बने घर को बड़े ताज्जुब के साथ देखता और फिर इसी सोच में घंटों निकाल देता कि.. यहां के लोगों को इन गड्ढों में रहनें में क्या मजा आता है। बीच-बीच में बस में बज रहा गाना ...ये हसीं वादियां ये खुला आसमां...मुस्कान की वजह बन जाता। रास्तों में पैदल जा रहे औरतें, बच्चों को देखकर कभी तरस भी आता क्योंकि उन्हें झुककर चलते देखने की आदत ना थी। खैर, अपनी उथल-पुथल मन में समेटकर सिगरेट के आखिरी कश के साथ होटल तो पहुंचा लेकिन शाम होते ही... मैं पैदल लैंस डाउन के निचले इलाके की ओर चल पड़ा।
 
हल्की-हल्की बारिश मानों वहां फिजाओं ने एक अजीब सी धुन छेड़ रखी हो....जिसे सुनकर कभी मन भाव विभोर सा हो जाता तो कभी रूककर, कभी देर तक अनवरत खुद को ढूंढता रहता। नई जगह और नई कहानी की तलाश में, मैं घंटों पैदल चला.. काफी दूर जाने के बाद मुझे एक जगह अलाव जलता नजर आया जिसे देखकर जान में जान आई। वहां पहुंचते ही 74 साल के वृद्ध पुरुष ने मुस्कुराहट के साथ मेरा स्वागत किया और बैठने के लिए दो ईंटे भी लगा दीं।
 
लैंसडाउन गढ़वाल राइफल्स के रंगरूट प्रशिक्षण केन्द्र के लिए खानपान हेतु अंग्रेजों द्वारा विकसित किया गया था जिसका असर वहां के परिवेश में बखूबी दिख रहा था।अभी अपनी कहानी की उधेड़बुन में लगा ही था कि तभी उस बुजुर्ग ने कांपती आवाज में कहा, "बाबूजी चाय पियोगे?" मैनें हाथों में जल रहा सिगरेट, लज्जित होकर बुझा दिया और उनसे कहा, "अगर ज्यादा वक्त लगेगा तो नहीं... हां अगर जल्दी मिले तो फिर पी लूंगा।" उस बुजुर्ग ने तेज आवाज में पुकारते हुए कहा, "मालती, जल्दी से 2 चाय ले आ।" इसी दरम्यान मेरी नजर घर के छत की ओर गई जो टीन का बना हुआ था और हल्की बारिश की वजह से बूंदों की आवाज टन टन करती हुई किसी मधुर संगीत -सी सुनाई पड़ रही थी। मुझसे रहा नहीं गया...मैं बुजुर्ग से पूछ बैठा..."बाबा, ये पानी के बूंदों की आवाज तो आपके मन को शांत कर देती होगी।" मेरा सवाल खत्म होते-होते वो बुजुर्ग पहले तो मुझे कुछ पल के लिए गुस्से में देखता रहा फिर एक अजीब सी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा ..."ठीक कहते हो बाबूजी ...आप लोगों को ये मधुर लगती है... लेकिन क्या पता किसी को कर्कश भी लग सकती है।" उसकी आवाज में एक व्यंग्य तो था ही लेकिन एकाएक उसमें कंपन के साथ दर्द भी महसूस हुआ। तभी अंदर से चाय लेकर वो लड़की आई और चाय देते हुए कहा कि सोने का वक्त हो गया, दादा जी चलो।
 
सोने के नाम पर जब मैंने घड़ी देखी तो रात के 11 बज चुके थे। जल्दी -जल्दी में चाय पीकर जैसे ही जाने को उठा तभी उस बुजुर्ग ने मेरा हाथ पकड़ लिया...एकाएक इस हरकत से मैं घबरा गया लेकिन उन्होंने अपने घर के अंदर आने का न्योता दिया जिसे मैं ठुकरा नहीं पाया। हालांकि मैं लगातार 4 घंटे उस बुजुर्ग से पहाड़ों में रहने वालों की जिंदगी के बारें में ही पूछता रहा कि कैसे रहते हैं, कैसे खातें हैं...उनके जीवन जीने का तरीका क्या है? जब घर के अंदर पहुंचा तो देखा टीन के बने छत के नीचे 20 बाय 16 फुट का एक कमरा जिसमें 3 चारपाई लगी हुईं थीं...जिसपर 2 औरतें और 1 बच्चा लेटा हुआ था। मेरे घर के अंदर पहुंचते ही दोनों औरतें उठकर बैठ गई और बच्चा तो रोनी सूरत लेकर पहले से लेटा हुआ था। तभी बुजुर्ग ने कहा... कि साहब ये देखो मेरा परिवार है.... दोनों का मरद यानि मेरा बेटा यहीं आर्मी में है... दिन होता है तो खुशियां भर-भर के परिवार में दिखती है...लेकिन जैसे ही रात होती है तो मायूसी छा जाती है। अचरज भरी निगाहों से देखते हुए पूछा, ऐसा क्यों। उस बुजुर्ग ने कहा... साहब ये बारिश जो है ना... सालों भर रूक रूक कर होती रहती है.. और रात में अक्सर होती है। तभी बच्चा एकाएक रोने लगा और औरतों ने जब चुप कराने की कोशिश की तो वहऔर भी तेज रोते हुए बोला, "बाबा.... ये बारिश कब रूकेगी...आज भी नींद नहीं आ रही।"
भोली सूरत में बोलते उस बच्चे को देखकर मेरा हृदय पसीज गया। और तेजी से मैं दरवाजे के बाहर आकर बिना किसी की परवाह किए सिगरेट सुलगाने लगा। तभी बुजुर्ग बाहर आकर बोला... "बेटा, जिस बारिश की आवाज आपको संगीत लगती है वही बारिश मेरे परिवार को वर्षों से सुकून की नींद नहीं लेने देती। अब तो बस रात होती है तो डर सा लगने लगता है कि कहीं बारिश ना आ जाए..और अगर बारिश आ गई... तो ...पानी की बूंदें अपनी टन-टन के साथ सोने नहीं देंगीं। उस बुजुर्ग की आवाज में ऐसा दर्द था जिसे मैं रोते हुए इंसान में भी महसूस ना कर सका था।
 
मैं बिना कुछ कहे तेज कदमों के साथ बारिश में भीगता हुआ होटल की ओर चल पड़ा। सोच की गहराई में लगातार मेरा दिमाग उलझता जा रहा था जिसे पानी की बूँदें आवाज के साथ लगातार परेशान भी कर रही थीं। तेज कदमों के साथ छोटी-छोटी गलियों से निकलते हुए मैं लगातार उन झोपड़ीनुमा घरों को देख रहा था जो बारिश में रहने के लायक नहीं थे। लौटते कदमों के साथ उन मासूम लोगों को भी ऐसे जीते हुए देख रहा था। जैसे ही होटल पहुंचा तभी आर्मी के तेज सायरन की आवाज आई..  जिसे सुनकर मेरा दिल छलनी हो गया..एक.तो पानी की बूंदें और दूसरा सायरन... साथ ही  सोचने लगा कि ये वादी घूमने फिरने के लिए बस 4 दिन ही अच्छी है ..अगर यहां जिंदगी गुजारने को कहा जाए तो फिर मैं यहां नहीं रह सकता। मैंने उसी वक्त सामान पैक कर इस फैसले के साथ टैक्सी पकड़ ली कि मैं इस वादी में कभी लौटकर नहीं आऊँगा क्योंकि उनकी जिंदगी बदलने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। बस डायरी पर चंद शब्द ही लिख पाया उस वक्त...
 
"टीन की उस झोपड़ी में...
बूंदों की टप-टप ने
छेड़ दी है अपनी राग
संगीत-सी लगती थी अब तक
लेकिन अब तुझे 
मल्हार कहूं या मातम"

- रजनीश बाबा मेहता
 
रचनाकार परिचय
रजनीश बाबा मेहता

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