सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- मंगली

मंगली नाम था उसका, जबकि उसके जीवन में कुछ भी मंगल न था। जबसे होश संभाला, तबसे उसकी देखभाल के लिए लाई गई सौतेली माँ की देखभाल कर रही है। उससे छोटे भाई-बहनों की शादी हो चुकी है लेकिन उसकी शादी की चर्चा पर माँ घर में कलह करती, फिर बाप तीन-चार दिन ठेके पर ही सोता।

आज चौराहे पर शनिचरा नशे में एक तेज गाड़ी से बचते-बचते नाले में गिर पड़ा। मंगली ने उसे उठाकर हाथ मुंह धुलाया। ये बात जैसे ही घर में पता चली, माँ और भाईयों ने मिलकर लात, जूतों और डंडों से उसकी खूब मंगलकामना की और कमरे में बंद कर दिया।

रात गहराई तो छप्पर हटा मंगली पुल पर पहुंच गई। रेलिंग पर चढ़कर कूदने ही वाली थी कि पीछे से आवाज आई, "कौन है क्या कर रहा है?"
पलटकर देखा तो शनिचरा था, हाथ में बोतल लिए फुटपाथ पर लेटा हुआ।
"मरने जा रही हूँ, तू क्या कर रहा है यहाँ बेवड़े??" वो रेलिंग पर खड़े-खड़े चिल्लाई।
"हा हा हा! मैं भी मरने ही आया था, बोतल में आधी बची थी तो सोचा खत्म कर लूं, थोड़ी देर रूक जा फिर साथ मरते हैं।"
अबकी जोर से खिलखिलाई वो, "तुझे चढ गई है, साथ-साथ जीते तो सुना था, मरना पहली बार सुन रही हूँ।"
लड़खड़ाते हुए वो एकदम पास आकर खड़ा हो गया, "तू साथ देगी तो जी भी लेंगे।"

उसकी आवाज की लरज मंगली का वजूद हिला गई, वो चुपचाप रेलिंग से नीचे उतर आई।
शनिचरा कंधा मिलाकर खडा हो गया, "देख तू नीचे आई तो मुझ शनिचर का भी मंगल हो गया।" बोलते-बोलते शनिचरा की नजरें मंगली की नजरों की तरफ गई तो उसे हाथ में पकड़ी बोतल को घूरते पाकर सकपका गया। बोतल पुल के नीचे उछालता हुआ बोला, "ये साला अलग शनिचर है दो-दो शनिचर देख के कंफ्यूज हो रही है तो ये ले अब सिंगल शनिचर सिर्फ तेरा।"

मंगली ने उसकी बाहों में हाथ डाल दिया, "अब तू शनिचर नहीं रहा तेरा मंगल हो गया है।"





लघुकथा- बेसन


जगेसर दुकान पर बैठे मक्खियां उड़ा रहे थे कि तभी परवतीया छाता लेकर आती दिखाई दी। ग्राहक देखकर संभल कर बैठ गए। गांव के रिश्ते से जगेसर जेठ लगते हैं इसलिए परवतिया ने पल्लू संभालते हुए कहा, "एक पाव खेसारी बेसन दे दीजिए।"
जगेसर ने चिमकी में करके बेसन तौला और काउंटर पर रखते हुए कहा, "सत्ताइस रूपा हुआ।"
परवतिया ने मुंह में पल्लू दबाया, "पैसा त अभी नै है बाद में दे जाएंगे, दे दीजिए उ धरना देकर बैठे हैं प्याजुआ खाने के लिए।"
जगेसर ने चिमकी उठाकर वापस तराजू पर रख दिया, "अब ऐतना पूंजी थोड़े है की उधार दें।"

तभी सरैया वाली काकी दुकान पर चढी तो परवतिया चुप होकर साइड में खड़ी हो गई। जगेसर ने अभिवादन किया, "राम राम काकी ई मेघ में कहाँ घूम रही हो, बचकुन को भेज देती, कहीं गिर उर गई तो राम नाम सत् हो जाएगा।"
काकी हँसी, "तोरे पोते-पोती खेला की जाएगी काकी, चल एक किलो बेसन दे चना वाला।"
जगेसर उसी चिमकी में बेसन डालने लगा तो परवतिया का दिल बैठ गया। चिमकी लेकर काकी मुडी तो जगेसर ने पूछा, "बचकुन सब कहाँ है?"
काकी दीवाल के सहारे नीचे उतरते हुए बोली, "उ सब त बाले बच्चे भोरे से बिरार लेकर धनरोपनी में लगा है, त हम सोचे बेरियां में आएगा त कुछ बना दें।"
काकी के जाते ही परवतिया ने टोन मारा, "एखनिए त कह रहे त उधार नहीं देते और किलो भर बेसन दे दिए, हम का घर ले के भाग जाएंगे।"
जगेसर ने माचिस से तीली निकालकर कान में डालते हुए कहा, "हे कनिया उका बाल बच्चा कमाई करने गया है और तोरा भतार जुआनी में खटिया तोड़ रहा है, ऐसन निठल्लन के उधार दीं त हमरा घरे प्याजुआ छनाईल बंद हो जाई।"
परवतिया अपना-सा मुंह लेकर रह गई। उसे समझ नहीं आया की कचरी प्याजुआ की पति की मनुहार या जगेसर की लताड किस पर खीजे। खड़ी देखकर जगेसर भी डोल गए। फिर से चिमकी में बेसन तौलकर देते हुए कहा, "एमकी भर तोहर मुंह देखकर दे रहे हैं, कह दिहअ उ कोढिया के।"

बेसन लेकर छम से भागी परवतिया। जगेसर मुसकुराते हुए अपने दिन याद करने करने लगे कैसे बियाह के बाद दिनभर कोठरी में पड़े रहते थे बाबूजी की गालियों का स्टॉक खत्म होने तक।


- कुमार गौरव

रचनाकार परिचय
कुमार गौरव

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