हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2016
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

खून के दो घूंट पी कर रह गए

झंडियां थामें
बाँह दोनों कट गईं
गर्दनें किसकी बचीं
टहनियों-सी छंट गईं
लहू की नदियाँ बहीं
खून के दो
घूंट पी कर रह गए

एक चूल्हा इक रसोई
एक थी दहलीज
निवाले शिवाले छीन कर
बो गए विष बीज
साझी विरासत की सखे
धज्जियाँ उड़ीं
खून के दो
घूंट पी कर रह गए

झेलम गई रावी गई
चिनाव के तटबंध टूटे
व्यास सतलज सिंध के
भरतवंशी बँधु छूटे
घाटियों की सभ्यताएँ
यशोधर्मी सदियाँ गईं
खून के दो
घूंट पी कर रह गए

कौन संगी कौन साथी
बहिना किधर था किधर भाई
अम्मा हमारी कहाँ भटकी
छोड़ दद्दू की कलाई
मातमी धुन बैंड बाजे
आमोद की प्रमोद की
कहानियाँ गढ़ीं
खून के दो
घूंट पी कर रह गए

कलाये सिराये
गाँठ धागों में पड़ी
स्वागत शिविर में मिली
शरणागती पगड़ी
गुमशुदा औलाद की
पर्चियां मिलीं
खून के दो
घूंट पी कर रह गए

मंजीरे बजाते रह गए
सत्याग्रही उपवास
ढो रहीं थी रेल गाड़ी
जली अधजली लाश
मरघटी इतिहास की
प्रतियाँ बंटीं
खून के दो
घूंट पी कर रह गए


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रोटी का अधिकार मिला

भरी जवानी बूढ़े लगते
टहनी-सी टाँगें
पसली नीचे पेट धँसा है
आँखें रात-रात जागें
क्या खाते हो
क्या पीते हो
भैया राम रतन?

आटे की थैली खाली है
तसला खूँटी पर लटका
बुझे हुए चूल्हे पर काला
बड़ा तवा उल्टा पटका
खुली रसोई में बिखरे हैं
टूटे-फूटे बर्तन

कुएँ बावली अंटे हुए हैं
जोहड़ का पानी सूखा
बालू-रेती नदियाँ ढोतीं
नहरों का माथा दूखा
बोतल का बाजार गरम है
कमा रहे मिस्टर जोहन

दस बीघे का खेत तुम्हारा
सौ कर्जे लादे
सात बेटियों का कुनबा है
धर्म करम साधे
मूल-सूद की माँग कर रहा
मक्खी चूस महाजन

जर्जर थिगड़ी वाला कम्बल
ओढ़ा और बिछाया
बोरी जैसा कुर्ता ढीला
पेट काट सिलवाया
महरारू को हुई तपेदिक
चाट गई ठिठुरन

जो होना था बीत गया अब
कैसा शिकवा और गिला
बैठ चैन से पढ़ो सुर्खियाँ
रोटी का अधिकार मिला
राशन की दूकान बन्द है
दूध पी गया दुर्योधन
भैया राम रतन


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राजी ख़ुशी भेजते रहना


राजी ख़ुशी भेजते रहना
बेटा राम खिलावन
तुम कैसे हो
क्या  करते हो
कहाँ पकाई रोटी
पूछ रहे हैं बड़के काका
अपने राम रिझावन

सूखी धरती यहाँ चटखती
घिरे नही हैं बादल
राखी भेज न पाई बहिना
सूखा बीता सावन

ऊँची- नीची पगडण्डी पर
बापू फिसल गए
पैदल चलना भूल गए
हाथों के बल घिसट रहे
दस रुपये में मालिश करते
वैदराज चितपावन

छुटकी बेटी हुई सियानी
मिला वजीफा पढ़ने जाती
गुन-गुन करती
जन मन गन का गीत सुनाती
खोटी नजर लगाए चक्कर
दलितों के घर वामन

मैला ढोने लगी बहुरिया
चौका देखें दादी
पैर हमारे सूज गए हैं
मोटी पड़ी बिवाई
बाकी कुशल रामजी जाने
अपना रखना ध्यान
हम सह लेंगे और झिड़कियाँ
देता रोज महाजन

पहली मिले पगार
भोग परसाद चढ़ाना
सुनते अब तो बहुत बन गए
दिल्ली में वृंदावन


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दिन आ रहे मधुमास के

शीत है भयभीत
खुशनुमा वातावरण
ले रहा अँगड़ाइयाँ
तोड़ हिम के आवरण
कह गई कोकिला
कान में कुहास के
दिन आ रहे मधुमास के

गुनगुनी-सी धूप होगी
मधुभरी-सी सुनहरी
मंजीरे बजाने आ रही
मधुमती-सी मधुकरी
मकरंद लेकर झूमते
झोंके झुके सुवास के

तितलियों से भर गईं
क्यारियाँ फुलवारियाँ
कलियाँ सियानी मारती
रस गंध की पिचकारियाँ
ढपली बजाते मधुप चंचल
फागुनी उल्लास के

अब जलेंगीं अवदमन की
थरथराती होलियाँ
देखना है राजपथ पर
कब तक बँटेंगीं थैलियाँ
द्वार खुलने को विवश हैं
अब नए आवास के

 


- डॉ. मनोहर अभय
 
रचनाकार परिचय
डॉ. मनोहर अभय

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