सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

रचना-समीक्षा

ज़िंदगी की रेलमपेल में भी सर्वोदय की राह दिखाती है गोपेश आर शुक्ला की कविताएँ: के. डी. चारण


हर युग में रचनाकार स्वयं की खोज में जुटा रहा है। वह न सिर्फ समाज के हालात या व्यवहार से क्षुब्ध होता है बल्कि इन हालातों के दिन-ब-दिन कुरूप होते सांचों से भी व्यथित होता है, परिणामतः वह सर्वप्रथम स्वयं के भीतर झांकता है और महसूस करता है कि इन स्थितियों के वर्तमान होने तक के सफ़र के लिए जितने अन्य लोग सहायक हैं, उतना वह भी है। ऐसे में उसके पास इन सबके ख़िलाफ़ सबसे ताकतवर चीज़ होती है.....समाज के तमाम विद्रुप हालातों के विरुद्ध डटकर मुकाबला करने वाली आवाज़!! जिसे वह कविता के रूप में जन-समूह के सामने रखता है।
लोग जिस साहित्य को समाज का आईना कहते हैं, वह महज़ आईना नहीं है बल्कि आधुनिक सन्दर्भों में उससे कहीं ज़्यादा बढ़कर है। आईना तो शरीर की सिर्फ स्थूल छवि ही दिखा पाता है, शरीर के भीतर की सुंदरता, कुरूपता या किसी गंभीर अंदरुनी बीमारी को आईना कभी नहीं दिखा पाता है। ऐसे में हम साहित्य को समाज का आईना कहें तो वह केवल एकांगी पक्ष होगा क्योंकि साहित्य तो समाज का रचनाकार द्वारा किया गया अनुसंधान और समाज का बारीक विश्लेषण होता है।


हस्ताक्षर पत्रिका के पिछले अंक को पढ़ा तो मेरी दृष्टि यकायक गोपेश आर शुक्ला की कविताओं पर आकर रुक गयी। चिंतनपरक और सूक्ष्म अवलोकन की क्षमता रचनाकार की तीनों कविताओं में उभरकर सामने आती है, शायद इसी कारण कवि का 'मैं' व्यष्टि से समष्टि में उतर आता है और वह निज से ऊपर उठकर सामाजिक सहृदय की पैरवी करता है।
कवि निज तक सीमित ऐसा सूर्योदय नहीं चाहता है बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने सत्यान्वेषण का हिस्सा बनाना चाहता है। कवि एक जगह स्वीकार करता है:-


मैं नहीं चाहता ऐसा सत्योदय
जो सीमित रहे एक हृदय तक,
मैं चाहता हूँ ऐसा ज्ञानोदय
रश्मियाँ जिसकी पहुंचे
हर घर-आंगन तक


शुक्ला जी का कविमन सत्योदय से ज़्यादा महत्वपूर्ण सर्वोदय को मानता है, इस हेतु वह गिरी-कंदराओं की तपस्या या गली-गली में दिए जाने वाले धार्मिक व्याख्यानों में विश्वास नहीं करता बल्कि धर्म व विज्ञान का सेतु बनाकर सम्पूर्ण मानवता को दुःखों के पार ले जाना चाहता है।
शुक्ला जी की दूसरी कविता 'सब कुछ भूल जाता है' मानवीय जीवन के कार्य-व्यापारों की उलझन को बयां करती है कि किस तरह जीवन की आपाधापी में व्यक्ति अपना अस्तित्व तक भूल जाता है। वह सिर्फ पैसा जोड़ने या खुद को श्रेष्ठ प्रमाणित करने के चक्कर में बचपन से कब युवा और युवा से कब चिरनिंद्रा तक का सफ़र तय करता है? उसे रिश्तों, इच्छाओं और अपने सपनों तक का ख्याल नहीं रहता है और वह:-


सारी आपा-धापियों से थक-हार कर
एक दिन वह इस तरह सो जाता है
कि जागना ही भूल जाता है


'दिया' नामक कविता में कवि ने जीवन की सार्थकता इसी में मानी है कि यह किसी के काम आये। प्रकृति में व्याप्त हर चीज़ क्षणभंगुर है लेकिन जो छोटे से जीवन में भी किसी जरूरतमंद के काम आ जाए, वही असल जीवन है। इसी कारण कवि शब्द चुनता है:-

देवालयों में निष्प्रयोजन
एक कतार में जलकर भी हमें
कभी उतनी खुशी नहीं होती
जितना आनंद किसी जरूरतमंद के लिए
जल कर बुझ जाने में आता है
जैसे सारा जीवन ही अर्थपूर्ण हो जाता है


शुक्ला जी की कविताओं का शिल्प भले ही पुरानी परंपरा का है लेकिन वे कहीं पर भी वाग्जाल नहीं रचते हैं बल्कि सीधे-सपाट तरीके से अपनी बात कहते हैं। उनकी कविता में शब्दों का चमत्कार या अलंकार भले ही नहीं है लेकिन जीवन की प्रत्याशा में भटकते एक राहगीर को सहारा है। विज्ञान और धर्म की सामंजस्यता और सत्योदय की अपेक्षा सर्वोदय को श्रेष्ठ बताना निःसंदेह उनके चिंतनपरक व्यक्तित्व को उजागर करती है।

हस्ताक्षर परिवार उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है और चाहता है कि पेशे से इंजीनियर यह रचनाकार इसी तरह सार्थक शब्द चयन से अच्छी और सामर्थ्यपूर्ण रचनाओं के रचाव-बसाव में रत रहें।

 

 

 

आप गोपेश जी की रचनाओं को इस लिंक पर जाकर पुनः पढ़ सकते हैं
http://www.hastaksher.com/rachna.php?id=498


- के.डी. चारण