प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2016
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास-मुलाक़ात

 

अनमोल- आप एक समृद्ध ग़ज़लकार भी हैं। आपके नज़रिये में ग़ज़ल की प्रवृति कैसी होनी चाहिए? आज की ग़ज़ल के बारे में क्या कहेंगे?
सौरभ जी- इस विधा को लेकर मेरे लिए 'समृद्ध' जैसे विशेषण का प्रयोग न ही करें तो मुझ पर महती कृपा होगी। यह अवश्य है कि ग़ज़ल जैसी विधा को लेकर मेरे मन में पवित्रता के भाव हैं। मैं अपने इस भाव को सहज, सामान्य शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकता। यह अवश्य है कि मैंने ग़ज़लें कही हैं, यदि आप उन्हें ग़ज़लें कहें तो। वहीं, ग़ज़ल की विधा और उसकी प्रवृति को लेकर मैंने आलेख भी लिखे हैं। उन पर व्यापक और सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ आयी हैं। वस्तुत: ग़ज़ल मनोदशाओं को पढ़ने और उस समझ को अभिव्यक्त करने की एक संश्लिष्ट विधा है। ग़ज़ल वस्तुत: पद्य के अनुशासन और उसकी सीमाओं में 'परस्पर बतियाने' की विधा है। ग़ज़लों पर भाषा, भूभाग और ग़ज़लकार के व्यक्तिगत संस्कारों का सापेक्ष प्रभाव पड़ता है। चूँकि, ये आत्मीय संवाद की विधा है, अतः इसकी बुनावट में किसी प्रकार की बनावट के लिए कोई स्थान नहीं है। होना ही नहीं चाहिए। इसी के साथ हमें यह भी देखना चाहिए कि आज ज़माना तो बदल ही रहा है, आज के लोगों की सोच उससे भी तेज़ ढंग से लगातार बदल रही है। बोलने-चालने से लेकर लोगों के व्यवहार तक में आश्चर्यजनक बदलाव दिखता है। इसलिए आज की ग़ज़लें न तो संस्कृतनिष्ठ शब्दों का अन्यथा भार वहन करना चाहती हैं, न ही उर्दू के नाम पर फ़ारसी और अरबी के दुरूह शब्दों के असहज जमावड़े की तरह दिखना चाहती हैं। आमजन की गझिन भावनाओं को, सुखों-दुखों को, समस्याओं को, उपलब्धियों को, हताशा को, उछाह को आम शब्दों में प्रस्तुत कर देना किसी ग़ज़लकार की प्रमुख विशेषता होनी चाहिए। न कि, उर्दू के भारी-भरकम शब्दों से वे आतंकित करती दिखें। सही मानिये, तो ग़ज़लें हिन्दी के सहज तत्सम और कई बार अत्यंत प्रचलित हो चुके तद्भव शब्दों के सटीक प्रयोग से पाठकों और श्रोताओं को उसके समाज और आस-पास के विभिन्न आयामों के प्रति सोचने के लिए आवश्यक तत्व मुहैया कराती दिखना चाहती हैं।
एक ग़ज़लकार के लिए ग़ज़लों की वैधानिकता का निर्वहन आवश्यक तो है ही, कथ्य में भी वास्तविकता को इंगितों के माध्यम से नयी ऊँचाइयों तक ले जाने में सक्षम होना चाहिए। वैधानिकता या अरूज़ को लेकर हुआ कोई समझौता ग़ज़ल की परिचयात्मकता से ही बिगाड़ करने या खिलवाड़ करने के बराबर है। दूसरे, ग़ज़ल पद्य के साँचे में गद्यात्मक विन्यास को साधने की अद्भुत विधा है। इस बिन्दु के प्रति एहतराम इस्लाम साहब अत्यंत स्पष्ट हैं और वे ये बार-बार कहा करते हैं। उनके इस कथ्य पर ग़ज़ल के अभ्यासियों को न केवल गहराई से मनन करने की, अपितु तदनुरूप अभ्यास करने की भी आवश्यकता है। ग़ज़ल संवादों की विधा होने से इसके मिसरों के विन्यास में शब्दों का संयोजन भरसक गद्यात्मक ढंग से ही होना चाहिए।
 
अनमोल- बहुत सधी हुई जानकारी दी आपने ग़ज़ल के बारे में। मज़ा आ गया!
आज हिन्दुस्तानी ग़ज़ल को किस मुकाम पर पाते हैं आप? इस क्षेत्र में युवाओं से क्या आशा है और युवा ग़ज़लकारों से कितना संतुष्ट हैं?
सौरभ जी- जैसा कि अभी-अभी मैंने निवेदन किया है, ग़ज़ल भाषा और अपने समाज के अनुसार कहन के बिन्दु हासिल करती है। यही बिन्दु उसकी प्रवृति का द्योतक हुए उसकी कथ्यधारा और स्वरूप का निर्धारण करते हैं। आज की ग़ज़लों में आज के संदर्भों का होना अत्यंत आवश्यक है। विधा कोई हो उसकी रचना का रचनाकार अपने दौर की ही पैदाइश होता है। किसी अग्रज या वरिष्ठ या पुरोधा के लिखे से प्रभावित होना या उसके लिखे को स्वीकार कर रचनाकर्म के प्रति प्रवृत होना एक बात है, और अपने दौर को संतुष्ट करते हुए अपनी रचनाओं में आज के बिम्बों और प्रतीकों का सार्थक प्रयोग करना नितांत अलहदी बात है। ऐसे प्रयास ही किसी रचना को प्रासंगिक ही नहीं उस दौर की आवाज़ बनाते हैं। आज के दौर का समाज कई ऐसे डिवाइसों और वस्तुओं का आदती हो चुका है जिसकी कल्पना तक आज से बीस वर्ष पूर्व नहीं की जा सकती थी। ग़ज़लें ही नहीं, आज की हर रचना इन वस्तुओं को बिम्बों के तौर पर स्थान दे। यही बात किसी ग़ज़लकार को प्रासंगिक और पठनीय बनायेगी। इसी के साथ ग़ज़ल की शैली को लेकर एक अत्यंत ज़रूरी बात यह साझा करनी है, कि ग़ज़ल कभी एक गीत या कविता नहीं होती। ग़ज़ल और गीतों के बीच वैधानिक और वैन्यासिक ही नहीं सोच को लेकर भी भारी अंतर हुआ करता है। इसे हर हाल में समझना आवश्यक है।
आज के ग़ज़लकारों से यह बात रेखांकित कर कहनी है, कि गेय कविता या फिर गीतों की शैली ग़ज़ल की शैली के समकक्ष नहीं हुआ करती। गीतों में भाव-निवेदन के साथ-साथ भाव-आवृति की महती भूमिका हुआ करती है। जबकि ग़ज़लों के अंदाज़ में भावों की प्रच्छन्नता आम है। इसके साथ ही यह भी जानना आवश्यक है कि ग़ज़लों के प्रस्तुतीकरण का एक अलग ही अंदाज़ हुआ करता है। यह अंदाज़ ही ग़ज़लियत कहलाती है, जो गज़ल के माध्यम से यदि अभिव्यक्त या संप्रेषित न हुई तो ऐसी कोई अभिव्यक्ति सबकुछ हो सकती है, ग़ज़ल नहीं हो सकती। इसके सपोर्ट में यही कहना चाहूँगा, कि जिस समय शब्द अपने अर्थ की सीमाओं को फलाँग कर अन्यान्य कथ्य की ओर इंगित करने लगें, ग़ज़लियत वहीं से शुरु हुई मानी जाती है। इसके निर्वहन के क्रम में कथ्य का विन्यास किसी तरह की बनावट या कृत्रिमता को वहन नहीं कर सकता। अन्यथा प्रस्तुति का सत्यानाश तय है। इसी के साथ यह भी उतना ही सही है, कि सहजता यदि आरोपित या ओढ़ी हुई हो तो विकृत अहंकार का अत्यंत शातिर प्रदर्शन हुआ करती है। इसे हमें एक ग़ज़लकार के तौर पर समझना ही होगा। आज के कई एक ग़ज़लकार आगे बड़े फ़लक पर बहुत बड़ी भूमिका निभाने को तैयार दिख रहे हैं। इनमें से कइयों को तो मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ, तो कइयों की ग़ज़लों को मैंने पढ़ा-सुना है। हाँ, यह गाँठ बाँध कर रखनी होगी, कि ज़माना बदल गया है। उस्तादों की भूमिका में आज हर माध्यम से, विशेषकर नेट के माध्यम से, विपुलता में उपलब्ध आलेख और साहित्य हैं। हम चाहे परम्पराओं की जितनी ही दुहाई देते रहें, इस तथ्य को किसी तौर पर नकार नहीं सकते। अत: आज के ग़ज़लकारों पर सचेत होकर सीखने और अभ्यास करने का दायित्व बहुत ही बढ़ गया है।
 
अनमोल- आप लम्बे अरसे से साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। अपनी युवावस्था के समय और वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक परिदृश्य में क्या अंतर पाते हैं?
सौरभ जी- देखते-देखते कितना कुछ बदल गया है। तब के समय में अमृतलाल नागर, जानकी वल्लभ शास्त्री, धर्मवीर भारती, बच्चन, अज्ञेय, शरद जोशी, निमल वर्मा, भीष्म साहनी, गोविंद मिश्र, भवानी प्रसाद मिश्र आदि-आदि जैसे नाम राष्ट्रीय स्तर पर दैदिप्यमान नक्षत्र की तरह शोभायमान थे और हम इन नामों के प्रति सहज भाव रखते हुए बड़े हो रहे थे। 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' और ’सारिका’ के माध्यम से उपरोक्त में से अधिकांश नाम हर सप्ताह अपने बीच उपस्थित होते रहते थे। ये अपनी रचनाओं के माध्यम से न भी आयें तो भी इनका होना बना रहता था। जबकि मुझे ज़ाती तौर पर ज़रूर महसूस होता था कि ये सभी सामान्य लोग नहीं हैं। ये साहित्यिक मनीषी हैं। आज भी कई वरिष्ठ साहित्यकार हैं। उनसे रोज़ का सम्पर्क नहीं होता लेकिन इनका होना आश्वस्त करता है कि साहित्यिक संसार बना-बसा है। यही तो संसार का संचरण है। जो कुछ बीत गया और रीत गया वो सब कुछ बस कल की ही बात लगती है। अस्सी के दशक में रंगीन दूरदर्शन हमारे बीच आने की राह पर था। उसके माध्यम से कवि-सम्मेलन के कार्यक्रम, साहित्यिक परिचर्चाएँ हुआ करती थीं। तब जो नाम थे आज 'उस दौर' के नाम कहलाते हैं। तब के युवा रचनाकार अब वरिष्ठों की श्रेणी में सम्मान पाते हैं। आज तो सारा कुछ और भी तेज़ी से बदलता हुआ दिख रहा है।
आज लेखन के साधन और इसकी आदत भी पूरी तरह से बदल चुकी है। मैं ही अब क़ाग़ज़ से पूरी तरह से दूर हो चुका हूँ। मेरा रचनाकर्म सीधे लैपटॉप के माध्यम से शब्दाकार पाता है। अब पाण्डुलिपि का अर्थ भी पूरी तरह से बदल चुका है। लेखन, इसके प्रति सोच और इसके प्रस्तुतीकरण में व्यापक बदलाव आ चुका है। तब प्रकाशन बहुत बड़ी बात हुआ करती थी। आज प्रकाशन अत्यंत सहज प्रक्रिया है। पत्रिकाओं में व्यावसायिक पत्रिकाओं, लघु-पत्रिकाओं, साहित्यिक पत्रिकाओं के साथ-साथ ई-पत्रिकाएँ भी अपनी उपस्थिति ही नहीं, धमक तक बनाने लगी हैं। आज ई-पत्रिकाओं के माध्यम से कई ऐसे सार्थक और महती कार्य हो रहे हैं, जिनके लिए कभी भारी धन की आवश्यकता हुआ करती थी। वेब-पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्य-संवर्धन का काम ही नहीं हो रहा, इनके माध्यम से नवोदितों को ताकतवर मंच भी मिल रहा है। लेखन आज वरिष्ठों का मुखापेक्षी नहीं रह गया है। साहित्यिक परिदृष्य को प्रिण्ट के माध्यम से संचालित करने वाले मठाधीश आज भौंचक हैं। प्रिण्ट-पत्रिकाओं की पहुँच तक पर अब सवाल उठने लगे हैं। आज का सचेत और मेहनती लेखक वेब-पत्रिकाओं के माध्यम से या सोशल-साइट के पटल पर कहीं अधिक पढ़ा जा रहा है, बनिस्पत पत्रिकाओं के लेखक के! ऐसी फिनॉमिना मन में जहाँ सकारात्मक भाव पैदा करती है, तो वहीं नकारात्मक भाव भी पैदा करती है। वैसे एक तथ्य तो आज भी उतना ही सही है, और वो ये कि जो लम्बी रेस के उपयुक्त होगा और बचेगा, वही साहित्य का अंग होगा। कुछ भी लिखा हुआ साहित्य का अंग तभी होगा, जब उसमें तथ्य, कथ्य, विचार, शिल्प और गठन यानी प्रस्तुतीकरण का संतुलित मेल होगा। बाकी सारा कुछ आज के दौर के वेगवती प्रवाह की खर-पतवार है। अलबत्ता इनकी भी महती भूमिका तय है, सड़ गयीं तो परिवेश को उपजाऊ बनाने में वे खप जायेंगीं!
 
अनमोल- वेब पत्रिकाएँ, ब्लोग्स, सोशल साइट्स.....एक रचनाकार का अपने पाठकों से सीधा संवाद होता है अब। पत्र-पत्रिकाओं और 'पत्र के माध्यम से संवाद' के ज़माने से कितना अलग पाते हैं आज के परिवेश को?
सौरभ जी- पत्र का लिखा जाना, उसका मिलना और उसके प्रति आत्मीयता की खुश्बू व्यक्तिगत उपलब्धि हुआ करती थी। साहित्यिक पत्र हों या व्यक्तिगत चर्चापरक पत्र, उनके माध्यम से जो व्यावहारिकता बनती थी, वह अत्यंत तोषकारी हुआ करती थी। अपेक्षाकृत नये अभ्यासी भी बहुत दिनों तक ब्लॉग को व्यक्तिगत डायरी से अधिक नहीं मानते रहे थे। आज भी मेरा व्यक्तिगत ब्लॉग नहीं है। जब इसके लिए एक समय कई कोनों से मुझ पर बहुत ज़ोर बना था। चूँकि मैं ओबीओ का सदस्य हो चुका था। उस पटल पर मेरा मन ऐसा और इतना रमा कि फिर व्यक्तिगत चाह हावी हो ही नहीं पायी। यह ज़रूर था कि मैं कई ब्लॉग के माध्यम से अपनी कोशिशों में भरपूर सहयोग भी पाता रहा। उनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण ब्लॉग ’सुबीर संवाद सेवा’ का नाम अवश्य लेना चाहूँगा, जिसका संचालन सिहोर (मप्र) से पंकज सुबीर करते हैं। इस ब्लॉग के माध्यम से हमारे सामने ग़ज़ल के अरूज़ को लेकर कई गुत्थियाँ खुलती चली गयीं थीं। आज यह तथ्य सर्वमान्य है कि अंतर्जाल के कारण साहित्य के दरवाज़े हर आम व्यक्ति के लिए खुल गये हैं। साहित्य लेखन के लिए विधा और विधानों पर ही नहीं, विन्यासों को लेकर भी हर तरह के पाठ और आलेख उपलब्ध हैं। जैसी प्यास वैसा और उतना ही पानी आज उपलब्ध है। अब क्या सही है और क्या ग़लत, इसका निर्धारण मैं नहीं करना चाहूँगा। अपनी कमियों के प्रति आँखें मूँदे लोग तब भी थे, जब क़ाग़ज़-कलम की एकांगी दुनिया थी, तो आज भी हैं जबकि लेखन की लगभग सभी विधियों के विधान और नियम क्लिक भर की पहुँच में हैं। लोग आज के दौर को परिवर्तन का दौर कहते हैं। मैं आज के दौर को मात्र परिवर्तन का दौर न कहकर, इसे साहित्य का संक्रान्तिकाल कहता हूँ। आगे जाने किस नाम से वर्तमान कल परिभाषित होगा। आज स्थापितों को नवोदित अपनी लेखन-क्षमता से ही नहीं, प्रस्तुतीकरण के ज़ोर से भी स्पष्ट चुनौती दे रहे हैं। चाहे कथाओं की मनोवैज्ञानिकता हो, उपन्यास का विन्यास हो, गीत की सार्थकता हो, नवगीत के कथ्य हों, ग़ज़ल का बेलागपन हो, हर जगह हड़बोंग मचा है। मानों उत्पात मचा हुआ है लेकिन संवाद का आज भी अपना सनातनी महत्व है। अलबत्ता संवाद का ढंग बदल गया है। यह ग़लत है या सही, इसका निर्णय भविष्य के गर्भ में है।
वेब-पत्रिकाएँ अपनी पहुँच और कलेवर के धरातल पर ही नहीं, अपने माध्यम के लिहाज से भी बहुत बदलाव कर रही हैं। इण्टरनेट का माध्यम साहित्य के लिए एक नया माध्यम अवश्य है, लेकिन यह क़ाग़ज़ों और छपाई वाले माध्यम से कहीं अधिक सशक्त और प्रभावी है। इसकी पहुँच एकबारगी चकित कर देती है। साथ ही, यह माध्यम इतना खुला और इतना स्वतंत्र है कि प्रयोगकर्ताओं में आत्म-अनुशासन न हो तो पूरे परिदृश्य को वे अपनी उच्छृंखलता के कारण जंगल बनाकर रख दें! यह दुर्भाग्य ही है कि ऐसे में पुराने साहित्यकार इस सबकुछ को समझते हुए भी इस माध्यम को स्वीकारने में बलात आनाकानी कर रहे हैं। इसके महती कारणों में से एक तो कम्प्यूटर और नेट पर उनका उतना सहज न होना है। लेकिन यह कोई बहुत बड़ा कारण नहीं है। वस्तुत: जो मुख्य कारण समझ में आता है, वह इस नये माध्यम के चलते साहित्य के विशिष्ट और परिसीमित क्षेत्र में आमजन की उदार पहुँच के कारण उन मठाधीशों के द्वारा सायास बनाये गये अधिपत्य को मिल रही लगातार चुनौती है! ऐसी कोई मठाधीशी कई तरह के 'वाद' की निकृष्ट और निरंकुश उपज हुआ करती है। तमाम 'वाद' और 'विमर्श' के नाम पर या उसकी ओट में फैलाये जा रहे कूड़े से सद्साहित्य का कितना नुकसान हो रहा है, या साहित्यांगन कितना प्रदूषित हो रहा है, यह खूब समझ में आने के बावजूद संयत और निर्पेक्ष लोग निरुपाय और असहाय-से देखते रह जाते हैं। वह अधिपत्य, जो छपाई वाले माध्यम में दुराग्रह और कई बार तो निरंकुश सनक में पूरी धमक के साथ दिखायी देता था। इसके विरुद्ध एक नवोदित लेखक कई बार निर्निमेष देखता रह जाता था! बेचारा कई बार कुछ कह तक नहीं पाता था। अत: साहित्य के परिक्षेत्र में वेब-पत्रिकाओं का होना और लगातार सशक्त होते जाना ऐसी मठाधीशी को प्रत्यक्ष चुनौती देने के समकक्ष है। संप्रेषण हेतु सहज सुलभ इस नये माध्यम में अब ऐसी किसी सनक के लिए कोई जगह नहीं है। इस उदार वातावरण को सभी तथाकथित वरिष्ठ जितनी सहजता और शीघ्रता से स्वीकार कर लें, उनके लिए उतना ही श्रेयस्कर है।
 
अनमोल- 'ओपन बुक्स ऑनलाइन' जो पिछले छः वर्षों से सोशल साईट पर बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है। आप इसकी प्रबंधन टीम से जुड़े हैं। हमारे पाठक जानना चाहते हैं इस उपक्रम के बारे में।
सौरभ जी- जैसा कि मैंने अभी-अभी कहा, अपनी भावनाओं और अपने विचारों को सोशल-साइटों पर अपलोड करने वाले 'रचनाकारों' की एक नयी और बड़ी जमात सामने आयी है। इसके मन में अभिव्यक्ति के नाम पर कुछ भी मनोहारी कहने को 'लेखन' समझ लेने की भूल पैठ बनाने लगी है। वैसे, ओबीओ के पटल के हवाले से हमारा मानना रहा है कि हर रचनाकर्मी एक भावुक व्यक्ति भले होता हो, हर भावुक व्यक्ति रचनाकर्मी नहीं हो सकता। रचनाकर्म निरंतरता के साथ दीर्घकालीन अभ्यास की माँग करता है, जिसके लिए इस जमात के अधिकांश रचनाकार तैयार ही नहीं होते। इसलिए उनके द्वारा साहित्य को मिल रही तथाकथित 'सेवा' 'रक्षा में हत्या' अधिक साबित होती है। किन्तु यह भी उतना ही सही है कि ऐसी जमात के कई सचेत लोग साहित्य को गंभीरता से लेते हुए इसकी कसौटियों को स्वीकार करने को तैयार दिखते हैं। लेखन के प्रति शौकिया रूप से सचेष्ट आग्रही व्यक्तियों  'साहित्य-संस्कार' की आवश्यकता होती है। इस आलोक में यह समझना सहज हो जाता है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन या ओबीओ की प्रासंगिकता क्या है?
ओपन बुक्स ऑनलाइन वस्तुत: किसी एक व्यक्ति द्वारा संचालित ब्लॉग नहीं है, बल्कि यह एक ’साहित्यिक मंच’ है, जिसका प्रारम्भ साहित्य को लेकर अनायास बन गयी उच्छृंखल परिस्थितियों में सकारात्मक बदलाव के लिए एक सार्थक कोशिश के रूप में हुआ था। इस मंच की शुरुआत 1 अप्रैल 2010 को ई. गणेश जी बाग़ी जी ने की। इसका मुख्य उद्येश्य साहित्य के विकास और इसके सकारात्मक प्रचार-प्रसार हेतु भरसक योगदान करना तथा उपयुक्त माहौल बनाना, रचनाकर्म के लिए प्रयुक्त विधाओं के मूलभूत विधानों और आवश्यक नियमों के प्रति रचनाकारों को जागरुक करना तथा साहित्य-संवर्धन के लिए आवश्यक तत्वों को इकट्ठा कर आवश्यक आलेखों, सुझावों-सलाहों या अन्य उपयुक्त प्रक्रियाओं के माध्यम से उपलब्ध कराना है। इसका दर्शन है, साहित्य के क्षेत्र में संकुचित सोच से भरे व्यक्तियों, समूहों या मठाधीशों की धमक और इनके प्रभावों से मुक्त कराना, ताकि सुगढ़, विधासम्मत, तार्किक रचनाकर्म हो सके। प्रधान-सम्पादक योगराज प्रभाकर जी की गरिमामय उपस्थिति से इस मंच का लगातार विस्तार होता चला गया। इस मंच पर पाँच प्रबन्धक और छः कार्यकारिणी के सदस्यों की टीम कार्यरत रहती है। ओबीओ पर प्रति माह चार इण्टरऐक्टिव कार्यक्रम जैसे कि काव्य-महोत्सव, तरही मुशायरा, चित्र से काव्य तक-छन्दोत्सव तथा लघुकथा गोष्ठी आयोजित होते हैं। ओबीओ का यह मंच वास्तव में नवोदितों को न केवल आकर्षित करने में सफल हुआ है, बल्कि साहित्य हेतु नवोदितों को संस्कारित करने तथा सुगढ़ रचनाकर्म हेतु प्रेरित करने में भी सफल रहा है। यह कहने में कत्तई गुरेज़ नहीं है कि ओबीओ के कारण कई नये गंभीर साहित्यकार सामने आ पाये हैं। लेखन के प्रति साहित्येतर लोगों के मन में भी सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ सार्थक भाव बनने लगा है। इस विचार को अनवरत सुदृढ़ करता हुआ ’ओबीओ’ निरंतर अग्रसर है।
 
अनमोल- अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए। क्या परिवार में आपके अलावा और कोई सदस्य भी साहित्य से जुड़ा है?
सौरभ- मेरे नानाजी का आशीर्वाद हमें मिला, लेकिन तब हम ऐसे नहीं थे कि विधाओं के गूढ़ संयोजनों और विन्यासों पर उनसे कोई चर्चा कर पाते। उम्र के साथ-साथ अपनी समझ की औकात भी छोटी थी। आज मेरे अनुज शुभ्रांशु पाण्डेय, जो कि इलाहाबाद हाइ कोर्ट में एडवोकेट हैं, व्यंग्य लेखन और लघुकथा विधा में नैसर्गिक समझ रखते हैं। उनकी कई रचनायें हमने पढ़ी हैं। उनका मेयार वाकई आश्वस्तिकारक है। ये दोनों विधाएँ न केवल विशिष्ट शिल्प की पक्षधर हैं, बल्कि विशेष दृष्टि की भी चाहना रखती हैं। अन्यथा, न व्यंग्य लेखन सध पायेगा, न ही लघुकथा वैन्यासिक हो पायेगी। अनुज शुभ्रांशु इस क्षेत्र में कितनी मेहनत करते हैं और तदनुरूप अपनी रचनाओं के माध्यम से सुधी समाज को उपलब्ध होते हैं, यह उनकी संलग्नता के साथ-साथ दीर्घकालिक प्रयासों पर निर्भर करेगा। मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ सदैव उनके साथ हैं।
 
अनमोल- जीवन का ऐसा कोई ख़ास पल या यादगार घटना जो अभी तक स्मृतियों में अंकित है?
सौरभ जी- बड़ा ही निजी प्रकृति का प्रश्न है यह! साहित्यकारों की रचनाओं पर कई लोग विवेकपूर्ण टिप्पणी नहीं करते कि वे कायदे से पढ़ते नहीं। इस प्रश्न के बरअक्स मेरे कुछ कहने पर कौन पढ़ना या सुनना चाहेगा? ख़ैर, आपने पूछा है, तो बताता हूँ। देखिये परिवार कोई हो, उसके सदस्य किन-किन घटनाओं से कब-कब और कैसे-कैसे प्रभावित होते हैं, इसकी चर्चा हम आये दिन सुनते रहते हैं। कई घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनका प्रभाव लम्बे समय तक मन-मस्तिष्क में बना रहता है। लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी भी होती हैं जिनका होना चमत्कृत तो करता ही है, वे क्यों और कैसे हुईं का प्रश्न एक अबूझ पहेली की तरह सदा अनुत्तरित रह जाता है। ऐसी कोई घटना हमारी सोच तक को प्रभावित कर देती हैं।
बात 1999 की फरवरी की है, मैं पापा सफ़र के लिए तैयार थे। उनको ट्रेन में बैठाकर इलाहाबाद स्टेशन से अपने स्कूटर पर लौट रहा था। रास्ते में यमुना नदी पर बना लोहे का बड़ा पुल पड़ता है। तब आज का नया पुल नहीं हुआ करता था। पुराने पुल पर एक साइकिल-सवार अपनी साइकिल के कैरियर पर बँधे एक बड़े से गट्ठर को लिए हुए ठीक मेरे ऊपर गिर पड़ा। लाज़िमी था कि मैं असंतुलित होकर गिर पड़ता। गिर पड़ा। एक तो लोहे के गार्डरों का पुल, दूसरे चलती हुई गाड़ी से बेतुके गिरना, भयंकर चोट तो लगनी ही थी। इससे भी बुरा यह हुआ कि मेरे ठीक पीछे आती हुई एक प्रीमियर-पद्मिनी कार मुझ पर चढ़ गयी। यह सब इतनी तेज़ी से घटित हुआ कि जब तक मैं कुछ समझ पाता, स्वयं को उस कार के नीचे दबा हुआ महसूस किया। कार के आगे एक चक्का मेरे नीचे दबे होने के कारण हवा में उठ गया था। उस कार के पीछे आर्मी वालों की ट्रक थी। जिसके जवानों ने कार को आगे से उठाकर मुझे बाहर खींचा। आनन-फानन में वो कार वाले सज्जन मुझे लेकर अस्पताल जाने को तैयार हो गये। लेकिन रास्ते में ही मैंने उन्हें वहाँ न ले जाकर अपने एक परिचित पारिवारिक डॉक्टर के पास ले चलने को कहा। ऐसी घड़ी में कौन मेरे जैसे की सुनता है, जो किसी क्षण बेहोश हो सकता था या प्राण त्याग सकता था? लेकिन आश्चर्य ये हुआ कि वो साहब मेरे बताये रास्ते पर लगातार चलते गये। उन आपद्क्षणों में मैंने जो कुछ अनुभव किया, वह मुझे ये समझाने के लिए काफी था कि मृत्युतुल्य कष्ट क्या होता है! और मृत्यु के अत्यंत नैकट्य की अनुभूति कैसी होती है! मेरी आँखों से दिखता हुआ सारा कुछ रंगहीन प्रतीत हो रहा था। मस्तिष्क में ड्रम की घोष ध्वनि की लगातार बजती प्रतीत हो रही थी। मैं बुरी तरह से घायल था। खैर, आगे इसके विस्तार में नहीं जाना चाहूंगा। लेकिन ये प्रश्न अवश्य है कि ऐसा क्यों हुआ? वे सज्जन उन क्षणों में भी मेरे उन 'निर्देशों' पर इतना भरोसा क्यो कर रहे थे? स्वास्थ्य लाभ करने के उन दिनों में वो सज्जन कई दफ़े मुझसे मिलने आये थे। मैंने उनसे पूछा था कि अस्पताल ले जाने को हठात तैयार हो जाने के बावजूद अस्पताल न ले जाकर, वे मेरे निर्देशों पर इतना विश्वास कैसे कर पाये थे? वे कभी कुछ ठोस नहीं बता पाये। हर बार उन्होंने बस इतना ही कहा कि जाने क्यों उस वक़्त उनसे कुछ भी सोचा नहीं जा रहा था और उन्हें मेरे कहे पर भरोसा हो रहा था कि मैं प्राण नहीं त्यागूँगा! आपको और आश्चर्य में पड़ जायेंगे जब आपको यह पता चलेगा कि वे सज्जन न केवल इस शहर से थे, बल्कि एक बड़ी दवा कम्पनी के ज़ोनल अधिकारी थे! इस कारण उनकी पहचान शहर के कई डॉक्टरों से थी! वे कई अस्पतालों और नर्सिंग-होम से परिचित थे। इसे आप क्या कहेंगे? अब चूँकि आपसे बातें हो रही हैं यानी वो कोई फटाल दुर्घटना साबित नहीं हुई!
 
अनमोल- हमारे प्रयास 'हस्ताक्षर' पर आप क्या राय रखते हैं? आपसे कुछ सुझाव भी चाहेंगे ताकि हम इसे और बेहतर कर पाएँ।
सौरभ जी- 'हस्ताक्षर' का होना एक साहित्यिक सद्प्रयास है। यह संप्रेषण हेतु एक खुला और उदार वातावरण उपलब्ध करा रहा है। साथ ही इसके प्रबन्धकीय टीम में आप जैसे संयत सोच वालों का होना इसके भविष्य के प्रति आश्वस्त रखता है। आभासी तौर पर ही सही 'हस्ताक्षर' जैसी पत्रिकाएँ बहुत बड़ा 'यज्ञ' कर रही हैं, जिसके पण्डित विशिष्ट वर्ग से नहीं आते, लेकिन समाज को समरस, संयत और संतुलित बनाये रखने में वे बहुत बड़ा योगदान कर रहे हैं। ऐसे में मेरा कुछ कहना कहीं से उचित प्रतीत नहीं होता। यह अवश्य है कि आज जितना और जैसा साहित्य नेट के माध्यम से सामने आ रहा है, उससे बड़ा प्रारूप नेट से आज भी बहुत दूर है। गाँवों में रचनाएँ हैं। भले ही अनगढ़ हैं, लेकिन उनमें ज़मीनी खुश्बू है। उनमें भारतीय सोच है। 'हस्ताक्षर' जैसी पत्रिकाओं का यह दायित्व होना चाहिए कि ऐसे कलमकारों के साहित्य को पटल पर लाया जाय। उन कलमकारों की सोच और उनकी समझ भारती की मिट्टी और भारती के रस से अनुप्राणित होती है। भारतीयता सदा से सर्वसमाही रही है। भारतीय सोच के इस प्राकृतिक गुण पर आज सवाल उठ रहे हैं। कई दिशाओं से इस पर आघात हो रहे हैं। 'हस्ताक्षर' को साहित्य के दायरे में न केवल रचनाओं को बल्कि रचनाओं के प्रति सोच को सस्वर करना चाहिए। कलमाकरों से बन रहे संवादों पर भी व्यापक चर्चा होनी चाहिए। और क्या कहूँ?
 
अनमोल- आपने कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया, हम जल्द इस दिशा में काम करेंगे। अपना अमूल्य समय 'हस्ताक्षर' को देने के लिए आपका साधुवाद। चलते चलते हमारे पाठकों के लिए कोई संदेश?
सौरभ जी- उदार चरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम्! जय-जय!! शुभ-शुभ!!!

- सौरभ पाण्डेय
 
रचनाकार परिचय
सौरभ पाण्डेय

पत्रिका में आपका योगदान . . .
ग़ज़ल-गाँव (1)गीत-गंगा (3)ख़ास-मुलाक़ात (2)