अगस्त 2016
अंक - 17 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- पत्थर दिल

 
सुबह के 5 बजे होंगे। अचानक से दरवाज़े पर शोर सुनाई दिया।
"मेंम-शाब...मेम-शाब....जल्दी दरवाजा खोलो, जल्दी दरवाज़ा खोलो।"
पूजा एकदम से हड़बड़ाकर उठी
"क्या हुआ...कौन चिल्ला रहा है?"
दूसरी और से- "मैं रामू मेम-शाब!"
दरवाज़ा खुलते ही देखा कि रामू फूट-फूट कर रो रहा था
पूजा, "क्या हुआ बहादुर...क्या हुआ?"
रामू, "मेम-शाब..मेम-शाब..वो नहीं रही। चली गई मुझे अकेला छोड़कर। हमेशा के लिए चली गई वो। मैं उसको बचा भी नहीं पाया। नहीं बचा पाया मैं..ऊँ..ऊँ..ऊँ
 
उसका रोना सुनकर पूजा के पति, सास-ससुर सब इकट्ठे हो गये। चार मंजिल की ईमारत में 8 घरों के अलग-अलग फ्लैट थे। रामू एक नेपाली नौकर था। जिसे सब 'बहादूर' पुकारते थे। खाना बनाना, झाड़ू बर्तन, बाज़ार का काम सब जी-जान लगाकर करता था। फ्लैट में नीचे ही वह सर्वेंट क्वाटर में रहता था। उसके 2 बच्चे थे..छोटे-छोटे।
पूजा की अभी नई-नई शादी हुई थी। कुछ दिनों पूर्व जब वह कहीं जा रही थी तो देखा कि रामू की बीवी लेटी हुई थी। उसने सोचा यूँ ही कोई बात होगी। ऐसे ही कई दिनों से वो ये देख रही थी।
 
एक दिन....पूजा, "क्या बात है बहादूर! तुम टाइम से नहीं आ रहे..ना ही काम ढंग से करते हो?"
रामू, "नहीं मेम-शाब ऐसी कोई बात नहीं..दरअसल..हमारा औरत का तबियत खराब है।"
पूजा की सास, "क्या हुआ उसे? अभी तो हट्टी-कट्टी थी?"
रामू शरमाकर "मेम शाब वो पेट से है। उससे उठा नहीं जाता ,चक्कर आता रहता है हम क्या करें मेम शाब हमारे पास इतना पैसा नहीं है कि हॉस्पिटल ले जाये।"
 
पूजा की सास.."अरे..रे तो इसमें घबराने वाली कौनसी बात है! सब के साथ ऐसा ही होता है। हमने बच्चे पैदा नहीं किये क्या!!!
आजकल के लोग भी ज़रा-ज़रा सी बात मे डॉक्टर के चोंचले पाल लेवे है। चल काम कर, सब ठीक हो जावेगा।
चल पूजा, चाय बनाकर ला।"
 
जी माजी..कहकर वह चली गई। पर उसका मन बैचेन था। दूसरे दिन रामू नहीं आया काम पर। पूजा को दूसरे दिन राखी पर पीहर जाना था। गौरव के साथ फटाफट चली गई। अगले दिन भी रामू नहीं आया। तो पूजा ने नीचे जाकर देखा तो रामू बाहर ही सर पकड़कर बैठा था।
 
पूजा, "अरे, बहादुर क्या हुआ??
ऐसे क्यूँ बैठे हो?"
रामू यकायक रोते हुए, "मेम-शाब इसकी तबियत बहुत ख़राब हो गई है ब्लीडिंग हो रही है।"
पूजा, "ओ हो..कैसे हो तुम..जल्दी डॉक्टर के लेकर जाओ इसे।"
 
इतने में ही फ्लैट के अन्य लोग भी देख-देखकर चुपचाप जाते रहे। पूजा की नई -नई शादी हुई थी, इसलिये ज्यादा किसी से नहीं बोलती थी। अचानक उसने फिर रामू को हिदायत दी, "देखो बहादुर..! इसे अभी के अभी हॉस्पिटल ले जाओ..ठीक है?"
रामू, "हाँ ठीक है मेम-शाब।"
इतना कह पूजा किसी रिश्तेदार से मिलने गौरव के साथ चली गई।
 
अगले दिन उसने गौरव को इक दिन रुकने को कह घर भेज दिया। उस दिन देर रात को वह वापस ससुराल आई थी, सो आते ही सब सो गये।
सोने से पहले वह रामू के ही विचारों में डूबी थी कि कल उठते ही पहले उसकी औरत का हाल पूछकर आऊँगी। पता नहीं कैसी तबियत होगी इसकी। अब तक तो डॉक्टर को दिखाकर सब ठीक कर दिया होगा।
इसी उधेड़बुन मे उलझी कब आँख लग गई पता भी न चला और फिर सुबह भोर को 5 बजे ही ये घटना
 
पूजा बहूत दुःखी हो गई थी। उसे लगा कि कहीं न कहीं वो भी उसको न बचाने के लिए जिम्मेदार है। सब के सब उस मरती औरत को तमाशे की तरह देख जाते रहे।
मैंने भी सिर्फ हिदायत ही तो दी।
 
उसने रोते-रोते रामू से पूछा, "बहादूर! तुमने डॉक्टर को दिखाया था क्या फिर कैसे..ये सब..बोलो? रामू....बोलो!"
रामू मानो 'पत्थर का बूत' बन गया था
झकझोरने पर बोला, "नहीं मेम-शाब नहीं दिखाया हमने डॉक्टर को..नहीं दिखाया..पैसा नहीं था हमारे पास।"
पूजा, "क्यूँ नहीं था पैसा? इतने घरों में काम करते हो..कहाँ गया पैसा..बोलो..बहादुर..बोलो!"
 
रामू, "सब गाँव भेज देता हूँ में मेम शाब। बूढ़े माँ-बाप है वहाँ, बहन की शादी का कर्जा भी बहूत है हम अकेले ही कमाने वाले हैं मेम-शाब! हम गरीब है ना....सब हमको इंसान कम पत्थर ज्यादा समझते हैं। आप भी नहीं थी उस दिन....किसको कहता? सब तमाशा देखता है। भगवान भरोसे छोड़ दिया हमने अपनी जोरू को मेम-शाब...भगवान भरोशे। और आज उसे भगवान ने ही बुला लिया। सब खतम हो गया मेम-शाब...सब खतम।"
 
वहाँ खड़े सबकी आँखे बह रही थी। कोई भी एक-दूजे से नजरें नहीं मिला पा रहा था।
रामू काम छोड़कर बच्चों के साथ दूर ओझल हो गया, मानो गुनगुना रहा हो-

पत्थर के है लोग यहाँ के, पत्थर का जमाना
सोचा साया साथ देगा, वो भी निकला बेगाना

- प्रीति जैन

रचनाकार परिचय
प्रीति जैन

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कथा-कुसुम (1)