अगस्त 2016
अंक - 17 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य

व्यंग्य लेख- सिपाही

 
बात उस समय की है जब मेरे पास एक फटीचर गाड़ी थी। अब गाड़ी तो गाड़ी ही होती है। चाहे अमीर के पास हो, चाहे गरीब के पास। और वो भी कार। हाँ, तो उस दिन मेरी हालत उस मृत-मृत आत्मा के जैसी थी, जिसे यमराज उसके कर्मों का दण्ड देने वाले थे। मेरे सामने चित्रगुप्त खड़ा था। मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोला-
"बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाय?"
मैं डरते हुए बोला-
"जो एक सिपाही दूसरे सिपाही के साथ करता है।"
"तुम कौनसे थाणे के सिपाही हो? और यदि सिपाही हो तो ये गाड़ी......ऐसा लगता है, तेरे ऊपर की कमाई छप्पर फाड़ कर होती है। यदि ऐसा है तो तुझे पता होना चाहिए कि रिश्वत लेना और देना दोनों कानूनन जुर्म है। अब तो ऐसे लोगों को, भ्रष्टाचारियों को अपने काम करने का तरीका बदलना पड़ेगा और.........।"
"आप मेरी बात तो सुनिए।"
"हाँ तो बता तेरी पोस्टिग कहाँ है?"
"आप....आप....गलत समझ रहे हैं, मैं आप जैसा सिपाही नहीं हूं।"
"वो तो तुम्हारे रंग-ढंग से ही लगता है कि तुम मोटे मुर्गे हो।"
"मैं.....मैं.....तो.....।"
"क्या बकरे की तरह मैं....मैं....लगा रखी है? जो बोलना है, जल्दी बोल।"
"मैं तो.....मैं तो कलम का सिपाही हूं।"
 
"कलम का सिपाही! ये नाम तो पहली बार सुना। तू ढंग से बता।"
"मैं...मैं....कलम से कहानी, कविता आदि लिखता हूं, इसलिए कलम का सिपाही कहलाता हूं।"
"तो यूं बोल ना कि तू लेखक है।"
"अरे भाई, क्या धूड़ का लेखक। इस जमाने में किसके पास वक्त है मेरी कविता सुनने का और कहानियां पढ़ने का। अब तो बस मोबाइल है ना। इस जादू के पिटारे में सब कुछ है, महबूब या महबूबा के हाथों की तरह ये भी.......।"
"अरे भाई, तेरी बकवास सुनने के लिए क्या मैं फालतू बैठा हूं? देखता नहीं मैं कितना व्यस्त हूं। चालान काटूं?"
"पर सिपाही तो सिपाही होता है। मुझे भी लोग कलम का सिपाही कहते हैं। जैसे एक नाई दूसरे नाई से हजामत के पैसे नहीं लेता, एक कंडक्टर दूसरे कंडक्टर से किराया नहीं लेता। थोड़ा अपनी बिरादरी का ध्यान तो सभी रखते हैं और फिर मेरी तो गलती ही क्या है?"
"गलती, अरे बच्चूजी, रईसजादोजी, साहबजी बताऊं क्या?"
"यदि गालियां ही निकालनी है तो फिर ये ’जी’ क्यूं लगाते हो जी?"
"तुम्हें पता नहीं क्या? अभी सद्भावना सप्ताह चल रहा है, सरकार की आज्ञा है। जी लगाना जरूरी है। अब काम की बात सुन, तेरी गाड़ी की आँखें फूटी हुई हैं, चालान तो कटाना ही पड़ेगा।"
"आँखें पूरी तरह थोड़ी फूटी है और अभी तो दिन है, गाड़ी को आँखें खुली रखने की अभी कहां जरूरत है?"
"तो तुम क्या ये सोच रहे हो कि मैं रात होने का इंतजार करूंगा? कलम के सिपाही होकर इतना भी नहीं समझते कि-
 
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलै होयगी, फेर करैगो कब?
 
बोल क्या करूं?"
"क्या करूं? आप कहना क्या चाहते हैं। समझ में नहीं आया।"
"एक तो फूटी लाइट और स्पीड हवाई जहाज जैसी.......अब......।"
"मेरी इस खटारा गाड़ी को हवाई जहाज उड़ाने वाला भी यदि पचास की स्पीड से चला कर दिखा दे, तो तुम मेरा चालान काट लेना।"
"मुझे लगता है कि ये गाड़ी चोरी की है। थाणे के सिपाही के पास तो गाड़ी नहीं और कलम के सिपाही के पास गाड़ी.......ये बात कुछ हजम नहीं होती।"
"अरे साब, मेरे हेपीबर्थ डे के दिन मेरे पिताश्री ने इसे खरीदा था। अब तो यह इतनी सुन्दर है कि यदि कोई चोर रात्रि में इसे चुरा कर ले जाये तो सूर्योदय से पूर्व इसे वापिस पहुंचा देता है। मेरे पूज्य पिताश्री ने हम दोनो की मरम्मत कभी नहीं की क्योंकि वे जानते थे कि.........।"
 
"अरे, फिर भाषण शुरू कर दिया। तूने जिस जगह ये गाड़ी खड़ी करी है, ये नो पार्किग की जगह है। चालान तो तुझे कटवाना ही पड़ेगा। नहीं तो कोई दूसरी बात कर।"
"हाँ ये हुइ न बात। कविता सुनना चाहोगे कि कहानी?"
"भाड़ में जाय तेरी कविता, कहानी। इससे पेट नहीं भरता। बच्चों के लिए कुछ मिठाई-सिठाई की बात कर। हाँ मगर तुम यह तकलीफ मत देखना। इस खटारा गाड़ी में कब जाकर लाओगे। तुम तो बस गांधीजी की फोटो वाले बड़े-बड़े पॉकेट में से निकाल लो। मैं जाते समय.......।"
"ओह! तो ये बात है। पर अभी तो तुम रिश्वत....भ्रष्टाचार.....कानूनी......जुर्म.......की बात कर रहे थे। अब ये सब.....किसी ने देख लिया तो.......?"
"तुम इस बात की फिक्र मत करो। ऐसा कुछ हुआ तो......इशारा मिल जाएगा।"
"अच्छा तो आँखों ही आँखों में इशारा......समझने वाले......समझ जायेंगे.....ना समझे.....वो अनाड़ी.....।"
"आप मजाक अच्छी कर.....।"
"हूं.....पर इस वक्त तो मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है। तुम अपना मोबाइल दो, भाई से मंगवा लेता हूं। वो अभी पाँच मिनट में लेकर आ जाएगा।"
"तुम्हारा भाई कलम का सिपाही तो नहीं है ना।"
"नहीं.....नहीं वो तो बड़ा........।"
"कह तो यूं रहे हो, जैसे तुम्हारा भाई कुबेर का खजांची है। पर ये तो बता तुम्हारा भाई करता क्या है?"
"वो......वो.......इस इलाके का एस.पी. है।"
 
ये सुनते ही चित्रगुप्त का मुंह खुला का खुला ही रह गया। मेरे सभी पाप पुण्य में बदल गये। मेरा तीर अर्जुन के तीर की तरह सीधा चिड़ी की आँख में लगा।
अब कलम के सिपाही के आगे थाणे का सिपाही झुका, सलाम किया। मेरी फटीचर गाड़ी का दरवाजा खोलकर मुझे बिठाया। धक्का मारकर गाड़ी को स्टार्ट करवाया। मैंने मुड़कर देखा, वो मुस्कराकर बाय-बाय कर रहा था।
मैंने मन ही मन उस एस.पी. को धन्यवाद दिया, जिसे मैं जानता तक नहीं था। पर उसने मुझे भ्रष्टाचारी चित्रगुप्त से बचा लिया था।

- बसन्ती पवांर

रचनाकार परिचय
बसन्ती पवांर

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