अगस्त 2016
अंक - 17 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर

 

किसी कमज़ोर रिश्ते को कोई भी नाम मत देना
बहुत नाकारा है ये दिल इसे कुछ काम मत देना
 
नहीं फर्क-ए-वफ़ा या बेवफाई दौर-ए-हाज़िर में
जो टूटे दिल तुम्हारा प्यार में इलज़ाम मत देना
 
बहुत संजीदा होता है हर एक राज़ उल्फत का
कभी दुश्मन के हांथों में कोई पैगाम मत देना
 
मोहब्बत को जो न समझे मुरौवत में नफा ढूंढे
तुम ऐसे शख्स को दिल में कोई मक़ाम मत देना
 
शरीफों की शराफत रहती है हर में बाकी
किसी को तैश में आकर कभी दुश्नाम मत देना
 
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ज़रूरत ग़म न बन जाए कहीं खुद पर नज़र रखना
ज़माना किस तरफ को जा रहा है ये ख़बर रखना
 
रहे-दुश्वार में इक हौसला ही काम आता है
न जज़्बा सर्द हो मुश्किल में तुम ऐसा जिगर रखना
 
बड़ी माहिर है दुनिया बेबसों पर तंज करने में
हो बस्ती संगबाज़ों की खुला न अपना सर रखना
 
मक़ाम ऐसे भी आते हैं अक्ल फिर जाती है जिनपे
तुम अपने साथ में हिक़मत सदा इल्मो-हुनर रखना
 
नाकामी में छुपे होते हैं रस्ते कामयाबी के
हों कितनी मुश्किलें जारी मगर अपना सफ़र रखना
 
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आख़िर खिलाफ-ए-ज़ुल्म कोई इब्तदा तो हो
खामोशियाँ हैं कब से कहीं से सदा तो हो
 
कब तक जियें बता यूँ ही घुट-घुट के ज़िन्दगी
आख़िर हमारे सब्र की कोई इम्तेहाँ तो हो
 
हो क़ैद या रिहाई मुझे कुछ ग़रज़ नहीं
जो भी हो मेरे हक़ में कोई फैसला तो हो
 
मुश्किल सही राह भर बगैर रहनुमा
मंज़िल तो ढूंढ लेंगे मगर रास्ता तो हो
 
मिलजुल के सुलझ सकता है ये मसअले-हयात
क़ुर्बानियों का दिल में मगर हौसला तो हो
 
 

- शब्बू मालिक

रचनाकार परिचय
शब्बू मालिक

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