प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

 
लोगों के सभी फ़लसफ़े झुठला तो गये हम
दिल जैसे भी समझा, चलो समझा तो गये हम
 
मायूस भला क्यों हैं ये दुनिया के मनाज़िर
अब आँखों में बीनाई लिए आ तो गये हम
 
किस बात पे रूठे दरो दीवार मकाँ हैं
कुछ देर से आये हैं मगर आ तो गये हम
 
ख़ुद राख हुए सुब्ह तलक सच है ये, लेकिन
ऐ रात! तेरे जिस्म को पिघला तो गये हम
 
रोये, हंसे, उजड़े, बसे, बिछड़े भी मिले भी
दिल सारे तमाशे तुझे दिखला तो गये हम
 
क्यों हाशिये पर आज भी रखती है कहानी
किरदार निभाने का हुनर पा तो गये हम
 
अब बढ़ के ज़रा ढूंढ लें मंज़िल के निशाँ भी
उकताए हुए रास्ते बहला तो गये हम
 
साबुन की तरह ख़ुद को गलाना पड़ा बेशक
पर लफ़्ज़े-मुहब्बत! तुझे चमका तो गये हम
 
********************************

ग़ज़ल-
 
दिल ही को ज़माने की चमक रास न आये
मैंने तो मियां इसमें कई शहर बसाये
 
अहसान मेरा है कि मैं बस्ती में रुका हूँ
सहरा तो मुझे आज भी आवाज़ लगाये
 
मैं खुद में कई रोज़ से पहुँचा ही नहीं हूँ
हालात मिरे दिल के मुझे कौन बताये
 
आ गर्दिशे-दौराँ तुझे ग़ज़लों में पिरोऊं
यूँ मेरे भी हिस्से में कोई काम तो आये
 
घर को नहीं भाती मेरी आवारा-मिज़ाजी
क्यूँ शब तू मुझे रोज़ यहाँ खींच के लाये
 
आ बैठ के पहलू में मेरे रात बिता दे
कब मैंने कहा मुझको तू सीने से लगाए
 
इस काम में कोई भी मददगार न होगा
छूना हो फ़लक जिसको, वो खुद हाथ बढ़ाए
 
दिल तुझसे जुदा हो के भी वीरान नहीं है
अब इसमें टहलते हैं तिरी याद के साये
 
आज़ाद मियाँ शायरी में ताज़गी लाओ
या चलते रहो मीर का दीवान उठाए
 
********************************
 
ग़ज़ल-
 
ख़िज़ाँ के होश किसी रोज़ मैं उड़ाता हुआ
तुम्हें दिखूंगा यक़ीनन बहार लाता हुआ
 
तमाम वार मेंरी रूह पर थे, लेकिन मैं
तमाम उम्र फिरा जिस्म को बचाता हुआ
 
ख़ुशी से करना रवाना मेरे मकाँ मुझको
मैं हार जाऊं अगर वहशतें हराता हुआ
 
बहुत उदास, अकेला, हमेशा लौटा क्यों
फ़लक़ पे जो भी दिखा मुझको जगमगाता हुआ
 
मुझे बुलाने मकाँ आ न जाये सहरा तक
मैं घर से आया तो हूँ नक़्शे-पा मिटाता हुआ
 
तुम्हारी याद है बिखरी पड़ी कई दिन से
लरज़ रहा हूँ मैं अपने ही घर में आता हुआ
 
है इक ग़रीब के बच्चे-सी ज़िन्दगी अपनी
ख़ुशी का पर्व भी गुज़रे जिसे रुलाता हुआ
 
ये तेरे लम्स का जादू है या वफ़ा मेरी
बदन से आ गया बाहर गले लगाता हुआ
 
********************************
 
ग़ज़ल-
 
मैं शजर हूँ और इक पत्ता है तू
मेरी ही तो शाख़ से टूटा है तू
 
शायरी में रोज़ तूफ़ाँ से लड़ा
क्या समंदर में कभी उतरा है तू
 
सुब्ह तक सहमी रहीं आँखे मेरी
ख़ाब! कैसी राह से गुज़रा है तू
 
क्या ख़बर कब साथ मेरा छोड़ दे
आँखों में ठहरा हुआ क़तरा है तू
 
कुछ कमी शायद तेरी मिट्टी में है
जब समेटा दिल तुझे, बिखरा है तू
 
वक़्ते-रुख़सत तो बुरा मत कह इसे
उम्र भर इस जिस्म में ठहरा है तू
 
बुज़दिली केवल मेरे अंदर है क्या
यूँ मुझे हैरत से क्यों तकता है तू
 
ये तेरी साज़िश है या फिर इत्तिफ़ाक़
मैं जहाँ डूबा वहीं उभरा है तू
 
जो अँधेरे में कहीं गुम हो गया
सोचता हूँ, क्या वही साया है तू
 
क्या ख़बर मुख़बिर हवा का हो वही
ऐ दिये! जिसके लिए जलता है तू

- इमरान हुसैन आज़ाद
 
रचनाकार परिचय
इमरान हुसैन आज़ाद

पत्रिका में आपका योगदान . . .
ग़ज़ल-गाँव (1)